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    यूपी की फैक्ट्री-जहां जानवरों की तरह 13 मजदूरों को रखा:पीठ पर भाले चुभोते; सिर और कान पर मारते ताकि सुनना-समझना बंद हो जाए

    15 hours ago

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    आज के दौर में जब देश मंगल ग्रह तक पहुंच चुका है, क्या किसी इंसान को बंधक बनाकर मजदूरी करवाई जा सकती है? जवाब होगा नहीं… बिल्कुल नहीं। लेकिन, आप हैरान होंगे कि यूपी के मुजफ्फरनगर में डेढ़ साल से ऐसा हो रहा था। मामला सिर्फ मजदूरी तक सीमित नहीं था, 13 मजदूरों के साथ जानवरों जैसा सलूक होता था। खाने के नाम पर चोकर की रोटियां और मिर्च जमीन पर फेंक दी जाती थी। अगर कोई मजदूर कहता कि घर जाना चाहता हूं, तो उसे भाले, पेचकस और बेल्ट से पीट-पीटकर अधमरा कर दिया जाता। बीती 22 जून को जब पुलिस ने इन मजदूरों को छुड़ाया, तो इनके शरीर की चोटें और चेहरे का खौफ यातनाओं के दौर को चीख-चीखकर बयां कर रहा था। वो मजदूर यकीन नहीं कर पा रहे थे कि जिंदा फैक्ट्री से बाहर निकल रहे हैं। फैक्ट्री में इन मजदूरों को कंट्रोल करने के लिए 3 हथियारबंद लोग और 2 पिटबुल डॉग रहते थे। पुलिस ने इन कुत्तों को भी अपने कब्जे में लिया, ये कुत्ते इन मजदूरों से ज्यादा तंदुरुस्त मिले। पुलिस ने फैक्ट्री मालिक अंकित बालियान, उसके पिता प्रमोद और सुपरवाइजर शिवा त्यागी के खिलाफ FIR दर्ज की है। प्रमोद और शिवा अरेस्ट हैं, जबकि अंकित फरार है। दैनिक भास्कर की संडे बिग स्टोरी में उन मजदूरों के फैक्ट्री में पहुंचने और फिर जुल्मों के दलदल में फंसने की कहानी पढ़िए… फैक्ट्री नहीं ‘प्राइवेट कैदखाना’ तैयार किया कहानी की शुरुआत करीब 2 साल पहले होती है। जब मुजफ्फरनगर के तितावी इलाके के मांडी गांव में अंकित बालियान ने फैक्ट्री लगाई। ये जगह जिला मुख्यालय से करीब 19 Km दूर थी। फैक्ट्री में दोना-पत्तल बनता था। फैक्ट्री का नाम 'किसान सरकार हाउस' रखा गया। 27 साल के अंकित के पिता प्रमोद के पास करीब 90 बीघा जमीन है। ये लोग गांव के दबंग बताए जाते हैं। प्रमोद के पिता राजबीर सिंह की 2010 में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। उसी साल राजबीर की पत्नी सुदेश बाबा गांव की प्रधान बनी थीं। हालांकि, इसके बाद 2 बार चुनाव हार गईं। इस साल ये लोग फिर से प्रधानी का चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे। अंकित ने बुढ़ाना के उकावली गांव के अपने साथी शिवा त्यागी को फैक्ट्री में सुपरवाइजर बनाया। सुरक्षा के लिए CCTV लगवाए, पिटबुल कुत्ते पाले। फैक्ट्री की सभी व्यवस्थाएं ऐसी की गईं, जैसे कोई प्राइवेट कैदखाना बनाया गया हो। दिल्ली से मजदूर लाते, 6 राज्यों के लोगों को काम पर रखा अब काम कराने के लिए मजदूरों की तलाश शुरू हुई। अंकित ने मुजफ्फरनगर के लोकल मजदूरों को अपनी फैक्ट्री में काम पर नहीं रखा। वो शिवा के साथ दिल्ली के रेलवे स्टेशन, बस अड्‌डे और लेबर अड्‌डों पर जाता। वहां लोगों से बातचीत करके ऐसे लोगों को खोजता जो परेशान हों, काम छूट गया हो। परिवार में उनकी फिक्र करने वाला कोई न हो। मजदूरों से कहते- तुम्हें रहने की जगह देंगे। महीने में 12 हजार सैलरी, दो वक्त का खाना और तीन बार चाय मिलेगी। सिर्फ दोना-पत्तल की फैक्ट्री में काम करना है। अंकित के इस झांसे में बिहार, हरियाणा, राजस्थान, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़ और यूपी जैसे राज्यों के लोग आते गए और फैक्ट्री में बंधक बनते गए। पुलिस ने फैक्ट्री से एक नेपाल के नागरिक को भी छुड़ाया। इन मजदूरों को ये नहीं पता था कि वो किस जिले में बंधक हैं। इसका जवाब भी हमने मजदूरों से जाना। वह कहते हैं कि गाड़ी में बैठाने के बाद अंकित ने हमें शराब पिलाई थी। इसके बाद हमें इतना भी होश नहीं रहा कि पता चल सके कि हम किस जिले के किस गांव में हैं? होश आने के बाद सीधे फैक्ट्री के अंदर ही खुद को पाया। अब यातनाओं की कहानियां… ‘11 महीने इतना पीटा कि कान फट गया’ सीतापुर के जगदीश कुमार को दिल्ली से 11 महीने पहले अंकित अपने साथ फैक्ट्री लेकर आया था। वह बताते हैं कि मुझे पहले दिन से काम पर लगा दिया गया। कहा था कि 8 घंटे का काम होगा, लेकिन यहां दिन-रात काम करना होता था। मैंने एक दिन कहा कि मेरा मन नहीं लग रहा, मैं काम नहीं करूंगा। तब इन लोगों ने मुझे बेल्ट से शरीर के हर हिस्से पर मारा। 11 महीने में मुझे इतना मारा कि मेरा एक कान तक फट गया। (जगदीश फटा हुआ कान दिखाते हुए रोने लगते हैं।) ‘भाले चुभो देते, खून बहता रहता’ उत्तराखंड के नैनीताल में रहने वाले रामू भी अंकित के चंगुल में फंस गए। 2 महीना 20 दिन तक फैक्ट्री में रहे। कहते हैं कि फैक्ट्री में आते ही आधार कार्ड और अन्य डॉक्यूमेंट जला दिए गए। मोबाइल छीन लिया। इन 80 दिनों में कभी सब्जी और दाल नहीं देखी। चोकर की रोटियां नमक और मिर्च के साथ दी जाती थीं। कभी काम करते-करते थक गए, तो नुकीले भाले चुभो दिए जाते थे। खून बहता रहता, लेकिन काम करते हुए हाथ नहीं रुकने देते थे। हम लोग दर्द में रोते थे, लेकिन काम करते रहते थे। ‘धमकाते- मारकर जंगल में फेंक देंगे’ आगरा के सोनू चौहान 12वीं पास हैं। उन्हें दिल्ली रेलवे स्टेशन के बाहर से अंकित 6 महीने पहले फैक्ट्री लेकर आया था। वे कहते हैं कि यहां 3 लोग निगरानी करते थे। सबके पास पिस्तौल या बंदूकें होती थीं। हमें धमकी देते थे कि काम नहीं करोगे तो मारकर जंगल में फेंक देंगे। लाश को चील-गिद्धों को खिला देंगे। दिमाग कमजोर करने के लिए सिर पर डंडे-हथौड़े मारते नेपाल के एक व्यक्ति इस फैक्ट्री में डेढ़ साल से काम कर रहे थे। वे बताते हैं कि कोई दिन ऐसा नहीं था, जब हम लोगों के साथ मारपीट न की जाती हो। ये लोग हमें जानवरों की तरह रखते थे। अमरोहा के दिलशाद बताते हैं कि ये लोग हाथ-पैर पर नहीं मारते थे। ऐसा करने पर काम रुक जाता। वे सिर, कान और पीठ पर मारते थे। हाथ में जो है उसी से मार देते थे। खून निकलने लगता और हम हाथ से रोकते तो और ज्यादा मारा जाता था। सिर पर इसलिए मारते थे, जिससे दिमाग कमजोर हो जाए और सब उनके गुलाम बन जाएं। हमारे साथ जितने भी लोग थे, सबको कान पर बहुत मारते थे। इसके चलते सबको कम सुनाई देता था। सबकी पीठ देख लीजिए, भाला चुभोने के निशान दिखते हैं। जानिए मजदूर भाग क्यों नहीं सके अपने ग्रुप के एक व्यक्ति को भगाया तब पुलिस पहुंची इस घटना को देखने-सुनने के बाद दिमाग में आता है कि आखिर ये 13 मजदूर वहां से भाग क्यों नहीं पाए? फैक्ट्री को देखने के बाद इसके 3 कारण समझ आए- पहला- अंकित, शिवा और प्रमोद 24 घंटे उसी फैक्ट्री में मौजूद रहते थे। इनके पास पिस्तौल होती थी। कुछ भी गड़बड़ होने पर गोली चला देते थे। दूसरा- फैक्ट्री के चारों तरफ जंगल और खेत थे। आसपास लोग नहीं रहते थे। बाउंड्री 8 फीट की थी, जिस पर 2 फीट के लोहे के तार लगे हुए थे। इनमें करंट दौड़ता था। तीसरा- इस फैक्ट्री में 3 गेट थे। 2 ही खोले जाते थे। इन दोनों गेटों पर पिटबुल डॉग का पहरा रहता था। ये खतरनाक कुत्ते खुले घूमते थे। मजदूरों को धमकाया जाता कि भागोगे तो ये कुत्ते तुम्हें चीर-फाड़कर खा जाएंगे। कोई भागने की हिम्मत इसलिए भी नहीं जुटा पा रहा था, क्योंकि मजदूरों को ये पता ही नहीं था कि इन्हें किस जिले में कहां पर रखा गया है? अब मजदूर के भागने की कहानी मजदूर तिरपाल खुद पर लपेटकर दीवार तक पहुंचा बंधक मजदूरों में जोधपुर (राजस्थान) का विक्रम भी शामिल था। रात को सोने के वक्त सन्नाटा होने पर इन मजदूरों ने सोचा कि ऐसे तो यहीं मर जाएंगे। हमारे परिवारों को पता तक नहीं चलेगा। इसलिए उन्होंने सोचा कि अगर 1 भी साथी, फैक्ट्री से बाहर निकलने में कामयाब हो गया तो हम सब बच जाएंगे। सवाल उठा कि गार्ड को चकमा कैसे देंगे? कुत्ते घूमते हैं, दीवार कैसे फांदेंगे। तय हुआ कि दीवार के पास लगे अशोक के पेड़ पर चढ़कर फांदा जा सकता है। इसके बाद सभी लोग मौके का इंतजार करने लगे। 21 जून की रात उन्होंने पाया कि अंकित और प्रमोद फैक्ट्री में नहीं थे। शाम के वक्त सुपरवाइजर शिवा त्यागी शराब पीने चला गया। अब जद्दोजहद थी कि कुत्तों से बचकर दीवार तक पहुंचने की। विक्रम ने खुद पर तिरपाल लपेट लिया। वह फैक्ट्री के अंदर से धीरे-धीरे दीवार की तरफ बढ़ने लगा। कुत्ते उसकी तरफ देखते, तो वह ठहर जाता। चूंकि तिरपाल लपेटा हुआ था, इसलिए कुत्तों को तिरपाल रखे होने का भ्रम हुआ। दीवार तक पहुंचने के बाद विक्रम अशोक के पेड़ पर चढ़ा और तिरपाल को ऊपर खींच लिया। तारों पर तिरपाल डाला, ताकि करंट न लगे और वह बाहर की तरफ कूद गया। फैक्ट्री के चारों तरफ CCTV लगे थे। इसका एक्सेस अंकित के मोबाइल में था, इसलिए विक्रम सीधे सामने के गन्ने के खेत में घुस गया। गन्ने के खेतों के रास्ते आगे बढ़ने लगा। तभी शिवा फैक्ट्री में वापस आ गया। उसने आने के बाद मजदूरों को गिना, तो एक कम मिला। वह चिल्लाता हुआ बाहर आया। अंकित और प्रमोद को फोन किया। कुछ देर में सभी लोग वहां पहुंच गए। विक्रम गन्ने के खेत में ही बैठा रहा। अब सब लोग टार्च की रोशनी में खेतों की खोजबीन में जुट गए। 2 तस्वीरों में वो स्पॉट देखिए, जहां से मजदूर फांदा- रातभर में 5 किमी का फासला रेंगते हुए तय किया इधर विक्रम को यह नहीं पता था कि थाना या चौकी किस तरफ है? कितनी दूर है? इसलिए वह एक दिशा में खेतों के बीच धीरे-धीरे रेंगते हुए आगे बढ़ता रहा। सुबह उजाला होते-होते उसने 5 किमी का फासला तय कर लिया था। वह तितावी थाने तक पहुंच गया। बदहवास से विक्रम ने उस फैक्ट्री की कहानी पुलिस को सुनाई, जिसमें उसको बंधक बनाया गया था। थाना प्रभारी प्रमोद कुमार चौंक गए। उन्होंने ASP संजय वर्मा को कॉल किया। ASP ने एसपी देहात अक्षय संजय महाडिक, फुगाना सीओ विश्वजीत सिंह, सहायक श्रम आयुक्त देवेश सिंह, तहसीलदार राधेश्याम गौड़ की एक टीम बना दी। 22 जून की शाम 6 बजे इस टीम ने फैक्ट्री पर छापेमारी की, तो अंदर की हालत देखकर दंग रह गए। कुत्तों को मांस-हडि्डयां, मजदूरों को सूखी रोटी भी नहीं देते थे फैक्ट्री के एक गंदे कोने में 12 मजदूरों को रखा गया था। गेट पर पिटबुल कुत्तों को भरपूर खाना दिया जा रहा था। इसमें मांस की बोटियां और हडि्डयां पड़ी दिखीं। लेकिन, मजदूरों को खाने को रोटी भी ठीक से नहीं मिल रही थी। सब बेहद कमजोर हो गए थे। कुछ पुलिस की मौजूदगी में भी घबरा रहे थे कि अंकित या शिवा आ जाएंगे, वो मार देंगे। पुलिसवालों ने किसी तरह उन्हें समझाया और सुरक्षित थाने लेकर आए। कुछ मजदूरों ने पुलिस से सबसे पहले यही पूछा कि ये जगह कौन-सी है? पुलिस ने फैक्ट्री से प्रमोद बालियान और शिवा त्यागी को गिरफ्तार कर लिया। अंकित वहां नहीं मिला। पुलिस ने सभी मजदूरों को रात में थाने पर रखा। जहां मजदूरों ने पुलिसवालों को उनके साथ हुई बर्बरता की कहानियां सुनाई। अगले दिन सुबह ASP संजय वर्मा थाने पहुंचे। पुलिस ने नहलाया, साफ कपड़े देकर अच्छा खाना खिलाया पुलिस का भी एक अलग ही रूप देखने को मिला। सभी मजदूरों को नहाने की जगह दी गई। नए कपड़े पहनने को दिए। मजदूरों ने बताया कि उन्होंने महीनों से अच्छा खाना नहीं खाया। ये सुनकर थाने में मेज-कुर्सी लगवाई गई। फिर हलवाई बुलाकर मजदूरों के लिए खीर, पूड़ी, आलू-छोले की सब्जी बनवाई गई। पुलिसवालों ने खुद मजदूरों को खाना परोसकर खिलाया। जब मजदूर थोड़ा रिलैक्स हुए, तब उन्हें कोर्ट में पेश किया गया। इस समय तक मजदूरों के परिवार भी मुजफ्फरनगर पहुंच चुके थे। केंद्र सरकार की बंधुआ मजदूर पुनर्वास योजना के तहत 30-30 हजार रुपए का चेक देकर मजदूरों को उनके घर भेजा गया। 3 मजदूर ‘गायब’, 1 की लाश मिली पुलिस ने मजदूरों से बात की, तब पता चला कि 3 मजदूर ‘गायब’ हैं। इसमें नेपाल का अर्जुन, आजमगढ़ का विशाल और सीतापुर के राजू का नाम सामने आया। हुलिया के आधार पर पुलिस ने माना कि 2025 में जिले की एक नहर में बोरे में लाश मिली थी, वो अर्जुन की थी। उस वक्त इसे लावारिस माना गया था। विशाल और राजू का अभी भी पता नहीं चल सका है। पुलिस ने इस मामले में तीनों आरोपियों के खिलाफ बंधुआ मजदूरी प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम, बाल श्रम अधिनियम, मानव तस्करी, अनुसूचित जाति/जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत केस दर्ज किया है। पूरे मामले की जांच के लिए स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम बनाई है। फरार अंकित को पकड़ने के लिए तीन टीमें बनी हैं, जो यूपी के अलावा दिल्ली, उत्तराखंड में छापेमारी कर रही हैं। ----------------------------- ये खबर भी पढ़ें - यूपी के अफसर ने लड़की पर लुटाए 25 लाख रुपए, डेटिंग एप पर मिले, फिर प्यार....शादी से इनकार पर केस किया कहते हैं प्यार अंधा होता है, लेकिन जब डेटिंग एप वाले प्यार में कोई आंख मूंदकर लाखों रुपए लुटाने लगे, तो अंजाम अदालत तक पहुंच जाता है। यूपी के मत्स्य विभाग में सहायक निदेशक पद पर तैनात दीपांशु के साथ कुछ ऐसा ही हुआ। डेटिंग एप पर उनकी मुलाकात 'सनलाइट' नाम की लड़की से हुई। दोस्ती धीरे-धीरे प्यार और फिर शादी के वादे में बदली। इसके बाद साहब ने दिल और तिजोरी दोनों खोल दीं। पढ़िए पूरी खबर...
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