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    सुरेंद्र कोली जिस फांसी से बरी हुआ...उसी पर लटका मिला:जहां दुकान खोली, वहां सदाराम बनकर रहा; 19 साल जेल में रहा

    13 hours ago

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    नोएडा के चर्चित निठारी कांड को लेकर नवंबर, 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था- शक कितना भी गहरा क्यों न हो, पुख्ता सबूत की जगह नहीं ले सकता। इस वाक्य के बाद 13 मामलों में फांसी की सजा पा चुके सुरेंद्र कोली को बरी कर दिया गया। 19 साल तक जेल में बंद रहा सुरेंद्र छूटने के बाद उत्तराखंड में अपने गांव गया। पहचान बदली और हरिद्वार में चाय की दुकान खोल ली। 18 सितंबर को अचानक एक खबर आई- निठारी कांड के आरोपी रहे सुरेंद्र कोली ने फंदे से लटककर जान दी। सवाल है कि आखिर उसने ऐसा क्यों किया? किस आधार पर उसे कोर्ट ने बरी किया था? जेल से छूटने के बाद वह क्या करता था? इनके जवाब आज की संडे बिग स्टोरी में जानते हैं… जेल से छूटा, तब तक परिवार बिखर चुका था सुप्रीम कोर्ट से बरी होने के फैसले के बाद 12 नवंबर, 2025 को सुरेंद्र कोली ग्रेटर नोएडा की लुक्सर जेल से बाहर निकला। यहां से निकलने के बाद वह दिल्ली में अपने भाइयों के पास गया। उसके बाद उत्तराखंड के अल्मोड़ा के मंगरुखाल गांव में अपने घर आ गया। 2006 के मुकाबले उसकी जिंदगी एकदम बदली हुई थी। मां की मौत हो चुकी थी। पत्नी शांति देवी ने 2015 में दूसरी शादी कर ली थी। एक बेटी थी, उसकी भी शादी हो चुकी है। कोली जिस वक्त जेल गयाथा, शांति प्रेग्नेंट थी। बाद में पत्नी ने बेटे को जन्म दिया था। इस बेटे को सुरेंद्र ने पहली बार जेल में ही देखा था। सुरेंद्र कोली का पुस्तैनी घर खंडहर बन चुका था, इसलिए वह अपने छोटे भाई आनंद कोली के घर में रहता था। अल्मोड़ा में कुछ दिन मजदूरी करने के बाद वह हरिद्वार के रोशनाबाद चला आया। यहीं कुछ दिन तक खाने का ठेला लगाया। लेकिन, दुकान मन मुताबिक नहीं चली। जून में सुरेंद्र ने अपने गांव में पूजा-पाठ करवाया। इस पूजा के कार्यक्रम में सुरेंद्र के बाकी के 3 भाई अपने परिवार के साथ शामिल हुए थे। सुरेंद्र का 19 साल का बेटा भी इस कार्यक्रम में अपने पिता के साथ था। जिसने मदद की, उसे नहीं पता कि ये सुरेंद्र कोली है हरिद्वार में सुरेंद्र को कोई स्थायी ठिकाना नहीं मिला था। खाने की दुकान भी नहीं चली। रोशनाबाद में उसकी मुलाकात जय कश्यप से हुई। सुरेंद्र ने जय को अपना नाम सदाराम बताया। कहा कि मेरे लिए काम और रहने के लिए एक कमरा दिलवा दो। जय ने कमरा दिलवा दिया। इसके बाद सुरेंद्र एक फैक्ट्री में गार्ड की नौकरी करने लगा। जिस कमरे में रहता था, उसके मालिक ने आधार कार्ड मांगा तो सुरेंद्र ने मना कर दिया। इसके बाद उसे कमरा छोड़ना पड़ा। एक अन्य परिचित धर्मेंद्र कौशिक से जरिए हरिद्वार में ही एक अपार्टमेंट में गार्ड की नौकरी करने लगा। इन जगहों पर वह सफल नहीं हो सका। शुगर का मरीज भी था, इसलिए लगातार परेशान रहता था। 5 दिन पहले यानी 15 सितंबर को ही उसने हरिद्वार में सप्तऋषि चौकी के पास एक छोटी दुकान किराए पर ली थी। इसका किराया 7 हजार रुपए महीना था। 2 महीने का एडवांस किराया देने के बाद उसने दुकान खोल ली। लेकिन, 4 दिन बाद ही उसने उसी दुकान में फांसी लगाकर जान दे दी। कहा गया कि हरिद्वार कुंभ की तैयारियों के चलते सुरेंद्र की दुकान अतिक्रमण एरिया में आ रही थी। इसलिए उसे हटाया जाना था। लेकिन, अब पता चल रहा कि ऐसी कोई बात नहीं थी। क्योंकि जिस दुकान को उसने किराए पर लिया था, वह पहले आंचल दूध का आउटलेट था। मानक के अनुसार था, इसलिए उसके हटने की संभावना नहीं थी। सुरेंद्र की कानूनी मदद करने वाले पूर्व जिला पंचायत सदस्य नारायण सिंह रावत कहते हैं- सुरेंद्र उस दुकान के मालिक से परेशान था, टॉर्चर करने का आरोप लगाया था। फोन करके कहा था कि दुकानदार परेशान कर रहा है। किराया बढ़ाने की बात कह रहा है। नारायण सिंह ने कहा कि सुरेंद्र आर्थिक रूप से कमजोर था। इसलिए पिछले दिनों हमने उसकी 25 हजार रुपए देकर मदद की थी। किस आधार पर सुरेंद्र कोली को कोर्ट ने बरी किया 2014 में सुरेंद्र कोली को पहले मामले में जिला अदालत, इलाहाबाद हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सजा सुना दी। उस वक्त राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के पास दया याचिका पहुंची, तो उन्होंने भी इसे खारिज कर दिया। 2 सितंबर, 2014 को कोली के नाम से डेथ वारंट जारी हो गया। 4 सितंबर को कोली को मेरठ की डासना जेल के उस बैरक में शिफ्ट कर दिया गया, जहां उसे 12 सितंबर को फांसी होनी थी। लेकिन, आखिरी वक्त में तय हुआ कि 8 सितंबर की सुबह फांसी होगी। जल्लाद भी तय हो गए। 7 सितंबर की रात इंदिरा जयसिंह सुप्रीम कोर्ट पहुंच गईं। रात 1 बजे कोर्ट खुला, उस वक्त के चीफ जस्टिस एचएल दत्तू ने मामले को देखा। इंदिरा जयसिंह की तरफ से कहा गया कि अगर पहले मामले में ही फांसी होगी, तो बाकी के 12 मामलों में न्याय कैसे होगा? कोर्ट ने फांसी की सजा को एक हफ्ते के लिए टाल दिया। जब कोर्ट ने फांसी की सजा को उम्रकैद में बदला 2015 में इसी मामले में नया मोड़ तब आया, जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उसकी दया याचिका पर अत्यधिक देरी का हवाला देते हुए फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया। हालांकि, इसके बाद भी उसे अलग-अलग 11 मामलों में फांसी की सजा सुनाई गई। जब सारे मामलों में सजा सुना दी गई, तब 2023 में इलाहाबाद हाईकोर्ट की एक टिप्पणी आई। कोर्ट ने कहा- इस मामले में कई जगहों पर ऐसे सबूत नहीं मिले, जो बहुत भरोसेमंद हो। उसने 17 साल सजा काट ली है, इसलिए बरी किया जाता है। पीड़ित परिवारों ने इस फैसले पर आपत्ति जताई। सीबीआई के जरिए सुप्रीम कोर्ट में इस फैसले को चैलेंज किया। कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा- निठारी में जो हुआ, वह गंभीर था। लेकिन, आपराधिक कानून में सिर्फ शक या अनुमान के आधार पर दोष सिद्धि नहीं हो सकती। अपराध सिद्ध करने के लिए स्वीकार्य और विश्वसनीय सबूत चाहिए। शक कितना भी गहरा हो, वह पुख्ता सबूत की जगह नहीं ले सकता। तो क्या लापरवाही और देरी ने पूरी जांच को कमजोर कर दिया कोर्ट में सुरेंद्र कोली की तरफ से वकील पारस नाथ सिंह ने कहा- इस केस में परिस्थितिजन्य सबूत नहीं मिले थे। कोली के जो भी कबूलनामे सीबाआई ने दर्ज किया था, उसे कोर्ट ने भरोसे के लायक नहीं माना था। कानून के मुताबिक, कबूलनामा किसी डर या दबाव में नहीं, बल्कि खुद से होना चाहिए। 308 पन्ने के आदेश में पेज नंबर- 47 पर लिखा है- कोली 60 दिन तक पुलिस कस्टडी में रहे, लेकिन इन 60 दिनों में कभी मेडिकल जांच नहीं हुई। इससे शारीरिक प्रताड़ना जैसी संभावनाओं पर संशय बरकरार रहता है। केवल 2007 में एक मेडिकल सर्टिफिकेट लाया गया, जिसकी विश्वसनीयता के लिए संबंधित डॉक्टर को पेश नहीं किया गया। कोर्ट ने कहा- जो चीज स्पॉट पर मिली, उन सबके लिए शुरुआत में मोनिंदर सिंह पंढेर और सुरेंद्र कोली को जिम्मेदार माना गया। लेकिन, समय के साथ सारी चीजों के लिए कोली को ही दोषी ठहराया जाने लगा। कोर्ट में जो गवाह आए, वो भी लगातार बदलते रहे। आखिर में कोली का कबूलनामा ही आधार रह गया। जिसकी विश्वसनीयता पहले से ही सवालों के घेरे में थी। 11 नवंबर, 2025 को चीफ जस्टिस बीआर गवई ने कोली के खिलाफ लंबित आखिरी मामले में फैसला सुनाया। कहा- जिन सबूतों को कोर्ट ने अपर्याप्त और अविश्वसनीय बताते हुए कोली को पहले 12 मामले में बरी कर दिया था, उन्हीं सबूत के आधार पर 1 मामले में दोषी बनाए रखना संवैधानिक रूप से सही नहीं है। चीफ जस्टिस गवई ने फैसले में पुलिस और एजेंसियों की जांच प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए। कहा- जांच समय पर, पेशेवर तरीके और संविधान के नियमों के मुताबिक हो, तो सबसे मुश्किल मामलों में भी सच सामने लाया जा सकता है। लेकिन, निठारी मामले में ऐसा नहीं हुआ था। लापरवाही और देरी ने पूरी जांच को कमजोर कर दिया। उन रास्तों को बंद कर दिया, जहां से असली अपराधी तक पहुंचा जा सकता था। ---------------------------- यह खबर भी पढ़ें - नाजिया को 6 बार जान से मारने की धमकी क्यों?, सऊदी, बांग्लादेश, पाकिस्तान से फोन आए भाजपा नेता नाजिया इलाही को ‘सिर तन से जुदा’ की धमकी मिल रही हैं। ऐसा पहली बार नहीं हुआ। उन्हें 10 महीने में 6 बार धमकियां मिल चुकी हैं। वो भी 3 देशों से- सऊदी अरब, बांग्लादेश और पाकिस्तान। भारत के अलग-अलग राज्यों में उनके पोस्टर जलाए गए। प्रदर्शन में नाजिया के खिलाफ मुस्लिम समुदाय का खुलकर गुस्सा फूटा। ये सब कुछ उनके पैगंबर मोहम्मद साहब पर टिप्पणी के बाद हुआ। पढ़िए पूरी खबर…
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