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    मदरसा शिक्षकों का 26 महीने बाद मानदेय बहाल:आर्थिक तंगी से जूझ रहे परिवारों को मिली राहत, बच्चों की पढ़ाई तक छूट गई थी

    4 hours ago

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    मदरसा आधुनिकीकरण योजना बंद होने के बाद पिछले 26 महीनों से आर्थिक तंगी और अनिश्चितता झेल रहे मदरसा शिक्षकों की बदहाली अब खुलकर सामने आ रही है। हजारों शिक्षकों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया था, लेकिन अब बहाली की खबर से उनके जीवन में फिर से उम्मीद की किरण जगी है। करीब सवा दो साल पहले अचानक मानदेय बंद होने से मदरसा शिक्षकों की आर्थिक रीढ़ ही टूट गई थी। जिन परिवारों की पूरी जिम्मेदारी इस आय पर निर्भर थी, वे कर्ज, समझौते और मुश्किल हालात में जीने को मजबूर हो गए। मुजफ्फरनगर के भोकरहेड़ी के मदरसा हिजारुल उलूम में 2003 से पढ़ा रहे शादाब के लिए ये 26 महीने किसी दुःस्वप्न से कम नहीं रहे। पोस्ट ग्रेजुएट होने के बावजूद जब उनका मानदेय बंद हुआ, तो घर का खर्च चलाना मुश्किल हो गया। शादाब बताते हैं कि हालात इतने खराब हो गए कि उन्हें अपने बच्चों को निजी स्कूल से निकालकर सरकारी स्कूल में दाखिला दिलाना पड़ा। वे कहते हैं, “बिना किसी सूचना के तनख्वाह बंद हो गई, हम समझ ही नहीं पाए क्या करें। बहुत मुश्किल दौर से गुजरे हैं। अब सरकार ने दोबारा सोचा है तो उम्मीद जगी है।” कुकड़ा के मदरसा पैगामे शरीयत में 2007 से पढ़ा रहीं रीता रानी की कहानी संघर्ष और समर्पण की मिसाल है। मानदेय बंद होने के बावजूद उन्होंने बच्चों को पढ़ाना नहीं छोड़ा। रीता बताती हैं कि वे आज भी बिना वेतन के ही बच्चों को पढ़ा रही हैं। “मेरे पढ़ाए बच्चे आज शिक्षक, डॉक्टर और वकील बने हैं। लेकिन खुद की हालत ऐसी हो गई कि जैसे-तैसे गुजारा कर रही हूं। फिर भी बच्चों की पढ़ाई नहीं रोकी,” उन्होंने भावुक होकर कहा। इन 26 महीनों में कई शिक्षक आर्थिक, मानसिक और सामाजिक दबाव से जूझते रहे, लेकिन उन्होंने शिक्षा का दीप बुझने नहीं दिया। अब सरकार द्वारा बहाली और समायोजन के संकेत मिलने के बाद उनके चेहरों पर फिर से उम्मीद दिखने लगी है।
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