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    International Borders of India | क्या Act East Policy पटरी से उतर रही है? |Teh Tak Part 4

    20 hours ago

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    आज की कहानी एक ऐसे देश की है जहां डेमोक्रेसी को गोलियों से उड़ा दिया गया। जहां सिविलियंस प्रोटेस्ट करते रहे और मिलिट्री उन्हें टैंक से कुचलती रही। ये देश है म्यांमार। लेकिन यह सिर्फ एक इंटरनल फाइट नहीं है। इसके पीछे छुपी है एक डेंजरस ग्लोबल पावर गेम। अमेरिका, चीन, रूस, भारत और बांग्लादेश। सबका अपना-अपना एजेंडा है। आज हम सिर्फ म्यांमार के बारे में नहीं पूरी साउथ एशिया की जिओपॉलिटिक्स को डिकोड करेंगे।म्यांमार जिसको पहले बर्मा कहते थे। साउथ ईस्ट एशिया में इंडिया का एक इंपॉर्टेंट बॉर्डरिंग कंट्री है। यह देश 100 से ज्यादा एथनिक ग्रुप से भरा हुआ है। डिकेड्स तक मिलिट्री रूल था। फिर 2015 में लोगों ने डेमोक्रेसी का टेस्ट चखा। आंग सांगस सुकी की पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी जीती। उम्मीद थी की बदलानव आएगा। लेकिन 2021 में जब उनकी पार्टी फिर से जीती तो मिलिट्री ने रिजल्ट को झूठा बता दिया और तख्तापलट कर दिया जिसमें यह माना जा रहा है कि चीन ने इसको सपोर्ट किया है। आंग सु की को जेल भेज दिया गया और पूरे देश में सिविल वॉर फूट पड़ा। तब से ले आज तक म्यांमार में सिविल वॉर चल रहा है। म्यांमार में जो कुछ आज हो रहा है वो नया नहीं है। उसका इतिहास पुराना है। और यह सब म्यांमार के ब्रिटिश से इंडिपेंडेंट होने के साथ शुरू होता है। जब म्यांमार को आजादी मिली थी 4 जनवरी 1948 को तब देश एक नहीं था बल्कि 100 से ज्यादा एथेनिक ग्रुप्स का संघ था। मेजॉरिटी थी बर्मन या बामर कम्युनिटी की। लेकिन करेन, शान, कचिन, चिन जैसे ग्रुप्स भी अपने लिए हक मांग रहे थे। यह ग्रुप्स चाहते थे कि उनको अपना एरिया मैनेज करने का अधिकार मिले। अपनी लैंग्वेज, अपना कल्चर, अपना गवर्नेंस। लेकिन सेंट्रल गवर्नमेंट ने सारा पावर बर्मन लेड सिस्टम के पास रख दिया और इस तरह से सिविल वॉर की शुरुआत हो गई। अब देखते हैं 1962 का टाइम। 1962 में पहला मिलिट्री को होता है। जनरल नेविन ने बोला कि डेमोक्रेसी बर्बादी है। देश को बचाना होगा और 1962 में मिलिट्री ने कंट्रोल अपने हाथ में ले लिया। जैसा कि हर तानाशाह करता है।मणिपुर संकट और सीमामणिपुर में पिछले कुछ वर्षों में जो हिंसा और अस्थिरता देखने को मिली, उसने एक बार फिर भारत-म्यांमार सीमा की संवेदनशीलता को चर्चा के केंद्र में ला दिया। मणिपुर की लगभग 400 किलोमीटर लंबी सीमा म्यांमार से लगती है, जहां 2021 के सैन्य तख्तापलट के बाद गृहयुद्ध जैसी स्थिति बनी हुई है। इसी कारण बड़ी संख्या में शरणार्थी, हथियार और उग्रवादी गतिविधियों की आशंकाएं बढ़ीं। भारत और म्यांमार के बीच लंबे समय तक Free Movement Regime (FMR) लागू था, जिसके तहत सीमा के दोनों ओर रहने वाले समुदाय बिना वीजा सीमित दूरी तक आ-जा सकते थे। लेकिन सुरक्षा चिंताओं के चलते भारत ने इस व्यवस्था की समीक्षा शुरू की और सीमा पर फेंसिंग की योजना को आगे बढ़ाया। मणिपुर संकट ने यह सवाल भी खड़ा किया कि क्या सीमा पार की अस्थिरता भारत के आंतरिक सामाजिक और सुरक्षा समीकरणों को प्रभावित कर सकती है। म्यांमार में सक्रिय कई सशस्त्र समूहों, ड्रग्स तस्करी और हथियारों के नेटवर्क को लेकर सुरक्षा एजेंसियां लगातार सतर्क रही हैं।फ्री मूवमेंट रिजीम क्या हैभारत और म्यांमार के बीच एक विशेष व्यवस्था थी, जिसके तहत सीमा के दोनों ओर रहने वाले पारंपरिक जनजातीय समुदाय बिना वीजा एक निश्चित दूरी तक एक-दूसरे के क्षेत्र में आ-जा सकते थे। भारत-म्यांमार सीमा को ब्रिटिश काल में खींचा गया था। इससे कई जनजातियां जैसे नागा, कुकी, चिन, मिजो आदि दो देशों में बंट गईं। उनके पारिवारिक, सांस्कृतिक और व्यापारिक संबंध बने रहे। इन्हीं रिश्तों को ध्यान में रखकर FMR लागू किया गया था। 2024 में भारत सरकार ने FMR को समाप्त/कड़ा करने और भारत-म्यांमार सीमा पर फेंसिंग (बाड़) लगाने की घोषणा की, ताकि अवैध घुसपैठ और सुरक्षा चुनौतियों पर नियंत्रण किया जा सके।इसके तहत क्या सुविधा थी?सीमा पार रहने वाले लोग बिना वीजा यात्रा कर सकते थे।पहले लगभग 16 किमी तक आने-जाने की अनुमति थी।सीमावर्ती समुदाय पारिवारिक, सामाजिक और व्यापारिक गतिविधियां कर सकते थे।भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी पर असरभारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी का उद्देश्य पूर्वोत्तर भारत को दक्षिण-पूर्व एशिया से जोड़ना और ASEAN देशों के साथ व्यापार, कनेक्टिविटी तथा रणनीतिक संबंधों को मजबूत करना है। लेकिन म्यांमार में जारी अस्थिरता और मणिपुर संकट ने इस नीति के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। भारत की कई महत्वपूर्ण परियोजनाएं, जैसे India-Myanmar-Thailand Trilateral Highway और Kaladan Multi-Modal Transit Transport Project, म्यांमार से होकर गुजरती हैं। म्यांमार में गृहयुद्ध, सैन्य संघर्ष और सुरक्षा संकट के कारण इन परियोजनाओं की गति प्रभावित हुई है। दूसरी ओर, मणिपुर और अन्य पूर्वोत्तर राज्यों में बढ़ती सुरक्षा चिंताओं ने सीमा पार व्यापार और लोगों की आवाजाही को भी प्रभावित किया है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भारत अपनी Act East Policy को उसी गति से आगे बढ़ा पाएगा, जैसी उसने कल्पना की थी?
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