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    दीनदयाल उपाध्याय की इतिहास दृष्टि:'इतिहास सिर्फ राजाओं की वंशावली नहीं, राष्ट्र की आत्मा की अभिव्यक्ति है'

    2 hours ago

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    छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय (CSJMU) के दीनदयाल सभागार में आयोजित एक विशेष व्याख्यान में पंडित दीनदयाल उपाध्याय के इतिहास चिंतन पर मंथन किया गया। इतिहास संकलन समिति, दीनदयाल शोध संस्थान और विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में हुए इस कार्यक्रम में विद्वानों ने साफ कहा कि भारत का असली इतिहास वह है जो आम आदमी के उत्थान और उसकी सांस्कृतिक पहचान को आवाज दे। इतिहास का मतलब सिर्फ बीता हुआ कल नहीं विश्वविद्यालय के प्रति कुलपति प्रो. सुधीर कुमार अवस्थी ने चर्चा की शुरुआत करते हुए कहा कि दीनदयाल उपाध्याय जी के लिए इतिहास केवल पुरानी घटनाओं को याद करना भर नहीं था। उनका उद्देश्य इतिहास के जरिए भविष्य के लिए एक 'धर्मराज्य' की नींव रखना था। यहां धर्म का मतलब किसी विशेष संप्रदाय से नहीं, बल्कि उन शाश्वत नियमों से है जो पूरे समाज को एक सूत्र में पिरोकर रखते हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि वास्तविक इतिहास वही है जो सामान्य व्यक्ति के जीवन में सुधार लाए और उसे अपनी जड़ों से जोड़े। राष्ट्र की आत्मा यानी 'चित्ति' को समझना जरूरी मुख्य वक्ता के रूप में नई दिल्ली से आए डॉ. बालमुकुंद पाण्डेय ने दीनदयाल जी के विचारों को विस्तार से रखा। उन्होंने कहा कि दीनदयाल जी का मानना था कि हर राष्ट्र की एक अपनी आत्मा होती है, जिसे उन्होंने 'चित्ति' का नाम दिया। भारत का इतिहास इसी चित्ति की अभिव्यक्ति है। उन्होंने इतिहासकारों और शिक्षकों से अपील की कि वर्तमान समय में दीनदयाल जी के उन विचारों का संकलन करना बहुत जरूरी है जो सूत्रों के रूप में बिखरे हुए हैं। इतिहास को राजाओं के युद्धों और वंशावलियों से बाहर निकलकर राष्ट्र की आत्मा के नजरिए से देखा जाना चाहिए। अपनी जड़ों की ओर लौटने का संदेश कार्यक्रम में मौजूद विशेषज्ञों ने साझा किया कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय की दृष्टि हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने और आत्मविश्वास के साथ भविष्य की ओर बढ़ने का साहस देती है। इतिहास का असली मकसद केवल तथ्यों को रटना नहीं, बल्कि अपनी 'भारतीयता' को पहचानना है। प्रो. अनिल कुमार मिश्र ने एकात्म मानववाद की वर्तमान समय में प्रासंगिकता पर बात की और बताया कि कैसे उनके विचार आज भी समाज की समस्याओं का समाधान दे सकते हैं। इस व्याख्यान के दौरान इतिहास संकलन समिति के पदाधिकारियों के साथ विश्वविद्यालय के शिक्षक, शोधार्थी और बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं मौजूद रहे। सभी ने इस बात पर सहमति जताई कि इतिहास लेखन में भारतीय संस्कृति और परंपरा को केंद्र में रखना ही राष्ट्र के प्रति सच्ची सेवा होगी।
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