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    पश्चिमी बंगाल के चुनाव परिणाम पर संतों ने जताई खुशी:स्वामी नरेंद्रानंद बोले- घुसपैठ पर लगेगा लगाम,केन्द्र और राज्य सरकार सीमाओं पर बढ़ाए मुस्तैदी

    4 hours ago

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    पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणामों को लेकर देशभर में राजनीतिक चर्चा तेज हो गई है। इस संदर्भ में सुमेरू पीठाधीश्वर शंकराचार्य नरेंद्रानंद सरस्वती ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए चुनाव परिणामों को जनता की जागरूकता और लोकतांत्रिक भागीदारी का परिणाम बताया। उन्होंने कहा कि आज के डिजिटल युग में मतदाता अधिक जागरूक हो चुका है और स्वतंत्र रूप से अपने मताधिकार का उपयोग कर रहा है। उनके अनुसार, उच्च मतदान प्रतिशत यह दर्शाता है कि जनता में लोकतंत्र के प्रति विश्वास और उत्साह बढ़ा है। उन्होंने यह भी कहा कि पहले के समय में मतदान प्रक्रिया पर दबाव और अनियमितताओं के आरोप लगते रहे हैं, लेकिन इस बार चुनाव आयोग और सुरक्षा बलों की सक्रियता से लोगों को निर्भय होकर मतदान करने का अवसर मिला। सीमा से हो रहे घुसपैठ रोकना जरूरी विपक्ष द्वारा लगाए जा रहे आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा कि चुनाव परिणामों को “साम, दाम, दंड, भेद” जैसी रणनीतियों से जोड़ना उचित नहीं है। उनके अनुसार, जीत और हार लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है, और हार के बाद आरोप लगाना विपक्ष की पुरानी प्रवृत्ति रही है। सीमा सुरक्षा और अवैध घुसपैठ के मुद्दे पर भी उन्होंने अपनी राय रखी। उन्होंने दावा किया कि बंगाल के रास्ते अवैध प्रवासन एक गंभीर समस्या रही है और इस पर सख्त नियंत्रण आवश्यक है। उनके अनुसार, इससे स्थानीय संसाधनों पर दबाव पड़ता है और गरीब वर्ग के अधिकार प्रभावित होते हैं। उन्होंने केंद्र सरकार द्वारा सीमा पर बाड़ लगाने के प्रयासों का समर्थन किया और राज्य सरकार पर सहयोग न करने का आरोप लगाया। ब्राह्मण समाज को जोड़ने का काम करता है आलोचना ठीक नही नरेंद्रानंद ने कहा - जब समाज संगठित होता है तो सकारात्मक परिवर्तन संभव होता है। उन्होंने यह भी कहा कि जो शक्तियां धर्म या परंपरा के विरुद्ध कार्य करती हैं, वे अंततः स्वयं कमजोर हो जाती हैं। तमिलनाडु की राजनीति का उल्लेख करते हुए उन्होंने एम.के. स्टालिन के कुछ पुराने बयानों की आलोचना की और कहा कि धर्म के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण समाज में विभाजन पैदा कर सकता है। ब्राह्मण समाज से जुड़े मुद्दों पर उन्होंने कहा कि इतिहास में कई बार इस वर्ग का विरोध हुआ है, लेकिन उन्होंने इसे एक “विचारधारा” बताते हुए कहा कि इसका मूल उद्देश्य समाज का कल्याण है, न कि किसी विशेष जाति या वर्ग का हित।
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