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    'जज के साथ अन्याय हो तो वह कहां जाए':यूपी में फांसी की 23 सजा सुनाने वाले जज का दर्द, पहले कहा था- मरना पसंद, डरना नहीं

    5 hours ago

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    एक जज का काम न्याय करना होता है, लेकिन अगर उसी के साथ अन्याय हो तो वह कहां जाए? क्या जिला जज के प्रशासनिक नियंत्रण में काम कर रहा एक जज उनके ऐसे आदेशों को मानने के लिए भी बाध्य है, जो कानून के खिलाफ हों? यह टिप्पणी मुजफ्फरनगर के जज रवि कुमार दिवाकर ने गुरुवार (17 सितंबर) को 10 साल पुराने एनडीपीएस (NDPS) एक्ट के एक मामले में फैसला सुनाते हुए की। मामले में लंबे समय से कोर्ट के चक्कर काट रहे आरोपी को उन्होंने बरी कर दिया। फैसले के दौरान जज ने अपनी कोर्ट से 97 मुकदमों को वापस लेकर दूसरी अदालतों में ट्रांसफर करने के तत्कालीन जिला जज के फैसले पर नाराजगी जताई। दरअसल, अपनी 17 साल की न्यायिक सेवा में जज रवि कुमार दिवाकर 36 दोषियों को फांसी की सजा सुना चुके हैं। मुजफ्फरनगर में अपने 5 महीने के कार्यकाल के दौरान ही उन्होंने 23 दोषियों को मृत्युदंड दिया है। अपने फैसले में जज रवि कुमार दिवाकर ने लिखा- भारत में कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं है। देश संविधान और विधि के शासन से चलेगा। किसी लोक सेवक के मनमाने व्यवहार से नहीं। कोई भी लोक सेवक राजाओं की तरह आचरण नहीं कर सकता। उसे अपने हर प्रशासनिक आदेश का कानूनी कारण बताना होगा। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या 18 अगस्त को अपने रिटायरमेंट से 13 दिन पहले बिना कारण बताए मुकदमों को रिकॉल करने का तत्कालीन जिला जज का फैसला उचित था? 10 दिन पहले जज रवि कुमार दिवाकर ने शाहपुर शहजादी हत्याकांड में आरोपी को फांसी की सजा सुनाते हुए फैसले में लिखा था कि मैं मरना पसंद करूंगा, डरपोक जज कहलवाना नहीं। जब तक मैं अपने सिद्धांतों पर चल सकता हूं। तब तक सर्विस करूंगा, वरना इस्तीफा दे दूंगा। एनडीपीएस मामले के फैसले में पिछले एक महीने की घटनाओं पर टिप्पणी गुरुवार को एनडीपीएस एक्ट के करीब 10 साल पुराने एक मामले में फैसला सुनाते हुए जज ने पिछले एक महीने से चल रहे घटनाक्रम का उल्लेख किया। उन्होंने अपने 35 पेज के आदेश में लिखा कि जिला जज ने बिना कोई कारण बताए एक जैसे नौ आदेश पारित कर उनकी अदालत से पत्रावलियां वापस मंगा लीं। आदेशों में केवल 'रिकॉल' शब्द का इस्तेमाल किए जाने और इसके पीछे कोई कारण नहीं बताए जाने पर भी जजने सवाल उठाया। उन्होंने इसे स्पीकिंग ऑर्डर नहीं बताया। धारा 409 का हवाला देकर बताया कि ट्रायल शुरू होने के बाद केस वापस लेने पर रोक जज ने अपने आदेश में दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) 1973 की धारा 409 का हवाला दिया। उन्होंने लिखा कि यह धारा जिला जज को किसी मामले को वापस लेने की शक्ति देती है, लेकिन धारा 409(2) में इस शक्ति पर रोक का प्रावधान है। आदेश के मुताबिक, यदि किसी मामले में ट्रायल शुरू हो चुका है यानी वह पार्ट हर्ड (part heard) केस है, तो सेशन जज उसे वापस नहीं ले सकते। इसी आधार पर जज ने अपनी अदालत से लंबित पत्रावलियों को बिना कारण बताए वापस मंगाने को विधि-विपरीत बताया। केस ट्रांसफर की शक्ति है, लेकिन मनमाने तरीके से इस्तेमाल नहीं होनी चाहिए जज ने धारा 408(1) का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि सेशन जज को अपनी डिवीजन के भीतर किसी मामले को दूसरी अदालत में ट्रांसफर करने की शक्ति प्राप्त है। विचारण शुरू होने के बाद भी उचित परिस्थितियों में केस ट्रांसफर किया जा सकता है। बोले- लोक सेवक को सही को सही और गलत को गलत कहना चाहिए जजने अपने आदेश में लोक सेवकों की जिम्मेदारी पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि एक लोक सेवक में सही को सही और गलत को गलत कहने की क्षमता होनी चाहिए। वह जिस संस्था का प्रतिनिधित्व करता है, उसकी विश्वसनीयता भी उसके आचरण से जुड़ी होती है। उनके मुताबिक, व्यवस्था तभी लंबे समय तक चल सकती है, जब लोक सेवक सही और गलत के बीच अंतर करने की क्षमता रखे। ऐसा नहीं होने पर संस्था लोगों का विश्वास खोने लगती है। जज ने पूछा- अविधिपूर्ण प्रशासनिक आदेश मानना जरूरी है? जजने अपने आदेश में एक सवाल भी उठाया कि यदि किसी सेशन जज ने अविधिपूर्ण प्रशासनिक आदेश पारित किया है, तो क्या संबंधित अधिकारी कानूनन उस आदेश को मानने के लिए बाध्य है। उन्होंने सवाल किया कि यदि कोई प्रशासनिक आदेश कानून के निर्देशों के खिलाफ है तो क्या संबंधित अधिकारी उसे मानने से इनकार कर सकता है? 10 साल पुराने एनडीपीएस केस में आरोपी दोषमुक्त इसी मामले में अदालत ने करीब 10 साल पुराने एनडीपीएस एक्ट के केस में अशोक भारती को साक्ष्य के अभाव में दोषमुक्त कर दिया। नई मंडी थाने के एसआई बचन सिंह ने 21 अक्टूबर 2015 को रजबहा रोड से अशोक भारती को 150 ग्राम चरस के साथ पकड़े जाने का दावा किया था। इसके बाद आरोपी के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई। अभियोजन की ओर से अदालत में चार गवाह पेश किए गए। गुरुवार को साक्ष्यों के अभाव में अदालत ने अशोक भारती को दोषमुक्त कर दिया। बोले- बेगुनाही साबित करने में 10 साल लगना दुर्भाग्यपूर्ण अदालत ने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि किसी व्यक्ति को अपनी बेगुनाही साबित करने में 10 साल लग गए। लंबे समय तक कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटना अपने आप में एक तरह का दंड है। न्यायिक व्यवस्था की धीमी गति से निर्दोष व्यक्ति को मानसिक आघात होता है। ज्ञानवापी मामले के फैसले से भी चर्चा में रहे हैं दिवाकर जजरवि कुमार दिवाकर पिछले साल 29 नवंबर को बरेली से स्थानांतरित होकर मुजफ्फरनगर आए थे। वे ज्ञानवापी प्रकरण में दिए गए फैसले को लेकर भी चर्चा में रहे हैं। उन्होंने पुलिस-प्रशासन के अधिकारियों को पत्र भेजकर कई बार खुद को खतरा होने की बात कही है। 7 सितंबर को दिए गए एक आदेश में भी उन्होंने कहा था कि वह मरना पसंद करेंगे, लेकिन डरपोक जज कहलाना नहीं। ---------------------------------------- ये खबर भी पढ़ेंः- यूपी में जज ने लिखा-मरना पसंद, डरपोक कहलाना नहीं:अब तक 36 को फांसी की सजा दी; जिला जज ने उनकी कोर्ट से 100 केस हटाए थे मैं मरना पसंद करूंगा, डरपोक जज कहलवाना नहीं। जब तक मैं अपने सिद्धांतों पर चल सकता हूं। तब तक सर्विस करूंगा, वरना इस्तीफा दे दूंगा। जब तक मैं जज की कुर्सी पर हूं, तो फैसला लेने का अधिकार भी एकमात्र मेरा ही होगा। यह टिप्पणी सोमवार को मुजफ्फरनगर में जज रवि कुमार दिवाकर ने शाहपुर शहजादी हत्याकांड में पति नदीम को फांसी की सजा सुनाते हुए अपने फैसले में लिखी। कोर्ट ने नदीम पर 1 लाख जुर्माना भी लगाया। पूरी खबर पढ़ें...
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