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    जब एक 'हवन' ने बदल दी मजदूरों की तकदीर:कानपुर में ₹14 मजदूरी और 9 घंटे की शिफ्ट से शुरू हुआ था हक का संघर्ष

    3 hours ago

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    औद्योगिक नगरी कानपुर आज भले ही अपनी बदली हुई पहचान के लिए जानी जाती हो, लेकिन इस शहर की रगों में मजदूरों के संघर्ष का इतिहास दौड़ता है। वह दौर जब मिल मालिकों की मनमानी चरम पर थी और मामूली गलती पर नौकरी चली जाती थी, तब कानपुर के भैरवघाट से इंकलाब की पहली गूँज उठी थी। कानपुर इतिहास समिति के महासचिव अनूप कुमार शुक्ल ने शहर के उस गौरवशाली और संघर्षपूर्ण श्रमिक आंदोलन की परतों को खोला है। 21 लोगों की वह पहली सभा और नौकरी से हाथ धोता एक 'विद्यार्थी' प्रथम विश्व युद्ध के दौरान कानपुर की मिलों में हालात बदतर थे। मजदूरों के वेतन से जबरन कटौती होती थी और उनका आत्मसम्मान पैरों तले रौंदा जाता था। साल 1918 में एल्गिन मिल नंबर-1 के एक निडर कर्मचारी, जिन्हें 'विद्यार्थी' के नाम से जाना जाता था, उन्होंने इस अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई। उन्होंने भैरवघाट पर पहली सभा की, जिसमें केवल 21 लोग जुटे थे। नतीजा यह हुआ कि मिल प्रबंधन ने उन्हें नौकरी से निकाल दिया, लेकिन उन्होंने संघर्ष का जो बीज बोया, वह जल्द ही वटवृक्ष बनने वाला था। पेड़ के नीचे 'हवन' और अधिकारों का प्रवचन संघर्ष की इस कहानी में पंडित कामदत्त का किरदार बेहद दिलचस्प है। वे एल्गिन मिल में काम करते थे और वहीं एक पेड़ के नीचे हवन-पूजन और प्रवचन किया करते थे। लेकिन उनके प्रवचन केवल धार्मिक नहीं थे; वे मजदूरों को उनके अधिकारों के प्रति जगा रहे थे। उनकी प्रेरणा का असर ऐसा हुआ कि नवंबर 1919 में मजदूरों ने एल्गिन मिल में काम बंद कर दिया। भैरवघाट पर हुई दूसरी सभा में शहर की सभी 12 मिलों में हड़ताल का ऐलान कर दिया गया। 26 हजार मजदूर और 9 दिनों की ऐतिहासिक हड़ताल 24 नवंबर से 2 दिसंबर 1919 तक कानपुर ने वह मंजर देखा जो इतिहास बन गया। शहर की 12 मिलों के 26,919 मजदूर सड़कों पर थे। इस एकता ने मिल मालिकों को हिलाकर रख दिया। इसी आंदोलन से 'मजदूर सभा' का जन्म हुआ, जिसके पहले अध्यक्ष पंडित कामदत्त और महामंत्री लाला देवीदयाल बने। इस समिति में गणेशशंकर विद्यार्थी जैसे महान व्यक्तित्व भी शामिल थे। 1939 का दौर,14 की मजदूरी और 9 घंटे काम अनूप शुक्ल ने बताया कि,आज के दौर में भले ही ये आंकड़े हैरान करें, लेकिन 1939-40 की कानपुर मजदूर जांच कमेटी की रिपोर्ट बताती है, कि उस समय एक कुली की औसत मजदूरी मात्र 14 रुपये थी। बुनाई कारीगरों को करीब 32 से 38 रुपये मिलते थे। काम के घंटे तय नहीं थे, लेकिन ज्यादातर मिलों में 9 घंटे की शिफ्ट चलती थी। कमेटी की सिफारिश के बाद ही मजदूरों को 'रोटेशन शिफ्ट' मिली, जिससे उन्हें रात में सोने का मौका मिलने लगा। जनवरी 1940 में पहली बार मजदूरों को 'महंगाई भत्ता' देने की शुरुआत हुई। शहर की वे 11 यूनियन, जो बनीं मजदूरों की ढाल
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