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    हाथरस में मानव तस्करी के 5 दोषी करार:10-10 साल की कैद और जुर्माना, कोर्ट की टिप्पणी- संवेदनशीलता से नहीं की गई जांच

    3 hours ago

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    हाथरस में मानव तस्करी के एक मामले में न्यायालय ने पांच आरोपियों को 10-10 साल के कठोर कारावास और 20-20 हजार रुपये के अर्थदंड की सजा सुनाई है। यह फैसला एडीजे एफटीसी प्रथम महेंद्र कुमार रावत के न्यायालय ने सुनाया। अभियोजन पक्ष के अनुसार, यह मामला राजेश गोस्वामी निवासी मोहल्ला जागेश्वर, हाथरस द्वारा कोतवाली सदर में दर्ज कराई गई शिकायत से जुड़ा है। उन्होंने बताया था कि 9 मई 2025 को उनका 4 वर्षीय नाती कविश खेलते हुए अचानक गायब हो गया था। पुलिस ने गुमशुदगी का मुकदमा दर्ज कर छानबीन शुरू की, जिसमें यह मामला मानव तस्करी का निकला। पुलिस ने बच्चे को सकुशल बरामद कर लिया था। इस मामले में पुलिस ने मोनू पाठक, उसकी पत्नी नेहा पाठक (निवासी जागेश्वर कॉलोनी, हाथरस), मेद्दीपाटला राघवेन्द्र, सुब्बालक्ष्मी (पत्नी मेद्दी पाटला सत्यनारायण, निवासी सन्त कॉलोनी अर्जुनपुरम, कडप्पा, आंध्र प्रदेश), बोडेडा मल्लिकार्जुन राव (निवासी कास्ता गली, विशाखापत्तनम, आंध्र प्रदेश), राजेश गुप्ता (निवासी सरदार कॉलोनी, रोहिणी, दिल्ली), मधुरानी शर्मा (निवासी गोला डेयरी, कुतुब बिहार, दिल्ली) और सोनिया मिश्रा (निवासी कोटला गांव, मयूर विहार फेस-1, दिल्ली) के खिलाफ आरोपपत्र न्यायालय में दाखिल किया था। न्यायालय ने मोनू पाठक, नेहा पाठक, मेद्दीपाटला राघवेन्द्र, बोडेडा मल्लिकार्जुन राव और सुब्बालक्ष्मी को दोषी करार दिया। इन्हें 10-10 वर्ष के कठोर कारावास के साथ 20-20 हजार रुपये का अर्थदंड भी लगाया गया है। अर्थदंड जमा न करने की स्थिति में प्रत्येक दोषी को एक-एक वर्ष का अतिरिक्त साधारण कारावास भोगना होगा। इस मामले में तीन अन्य आरोपियों को कोर्ट ने बरी कर दिया। अभियोजन पक्ष की ओर से एडीजीसी गोविंद वशिष्ठ ने पैरवी की। न्यायालय ने इस मामले में अपने आदेश में विवेचक की कार्यप्रणाली पर भी कड़ी टिप्पणी की है। न्यायालय ने कहा कि बच्चों की खरीद-फरोख्त जैसे गंभीर अपराध, जो वर्तमान समय में बड़े पैमाने पर किए जाने के आरोपों से जुड़े हैं, उनकी विवेचना अपेक्षित संवेदनशीलता के साथ नहीं की गई। इसके बजाय विवेचक ने केवल आरोपपत्र दाखिल करने पर ध्यान केंद्रित किया, जो एक निरीक्षक स्तर के पुलिस अधिकारी से अपेक्षित नहीं है। न्यायालय ने यह भी कहा कि या तो विवेचक इस प्रकरण में अधिक जानकारी जुटाना नहीं चाहते थे और जल्द से जल्द विवेचना समाप्त कर आरोपपत्र दाखिल करना चाहते थे, या फिर जानबूझकर अभियुक्तों के बयानों में सामने आए मानव तस्करी के बड़े रैकेट को नजरअंदाज किया गया। इससे प्रतीत होता है कि आरोपियों को बचाने के उद्देश्य से विवेचना समुचित तरीके से नहीं की गई। न्यायालय के अनुसार, विवेचक की जल्दबाजी के कारण उन अन्य आरोपियों के संबंध में कोई ठोस खुलासा नहीं हो सका, जो बच्चों की खरीद-फरोख्त और मानव तस्करी में शामिल हो सकते थे। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में असफल रहा है कि आरोपियों द्वारा एक से अधिक बच्चों की खरीद-फरोख्त कर मानव तस्करी की जा रही थी। पूरी विवेचना में केवल बालक कविश की ही बरामदगी दिखाई गई, जबकि अन्य बच्चों के संबंध में मानव तस्करी के कोई ठोस साक्ष्य एकत्र नहीं किए गए।
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