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    'हम एक-बाबरी का दर्द नहीं भूले, आप 6-की तैयारी में':लंगड़े हाफिज मस्जिद को नजूल लैंड बताने पर दालमंडी के लोगों का फूटा गुस्सा

    2 hours ago

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    ‘दालमंडी में 6 मस्जिदें हैं। एक बाबरी का दर्द हम भूल नहीं पाए हैं। आप-6 बाबरी का दर्द देना की तैयारी कर रहे हैं। जिसको हम लोग बर्दाश्त नहीं करेंगे। कम से कम इस लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में दालमंडी के लोगों और दुकानदारों का हक न छीना जाए। जो मस्जिद आजादी के पहले बनी 200 साल पुरानी वो नुजूल लैंड पर कैसे?’ ये कहना है दालमंडी के रहने वाले इमरान अहमद बबलू का; बबलू दालमंडी ध्वस्तीकरण के दौरान 10 नवंबर 2025 को विरोध करने में गिरफ्तार हुए थे और 92 दिन बाद जेल से रिहा हुए हैं। बबलू ने एक बार फिर दालमंडी के लोगों की आवाज उठानी शुरू की है। इमरान ने आगे कहा - माननीय उच्चतम न्यायालय इसमें स्वतः संज्ञान ले और लोकतंत्र की हत्या होने से बचाए दालमंडी के लोगों को उनका हक दिलाए। बता दें की साल 2025 में राज्य सरकार ने दालमंडी प्रोजेक्ट लांच किया था। जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उद्घाटित किया था। 205 करोड़ के इस प्रोजेक्ट में 181 मकान और 6 मस्जिदें चिह्नित हैं। जिसमें सबसे पहली मस्जिद खुदा बक्श या लंगड़े हाफिज है। अब नगर निगम और राजस्व विभाग ने संयुक्त सत्यापन के बाद इसके कुछ हिस्से को नुजूल लैंड बताया है। जिसके बाद एक बार फिर दालमंडी के लोगों में अक्रोश है। ऐसे में दैनिक भास्कर ने दालमंडी के लोगों से बात किया और जाना की असलियत में मस्जिद लंगड़े हाफिज कब बनी है और अब लोगों में आक्रोश क्यों है। पढ़िए ग्राउंड रिपोर्ट… सबसे पहले देखिये दालमंडी से जुडी पांच तस्वीरें… जानिए राजस्व विभाग और नगर निगम ने कितने हिस्से को बताया नुजूल लैंड … वाराणसी के नई सड़क से दालमंडी का प्रवेश द्वार है। जिसपर नई सड़क कपड़ा मार्केट बाजार है और इसी के दाहिने तरफ मस्जिद लंगड़े हाफिज है। जिसे खुदा बक्श जायसी ने बनवाया था। वो एक पैर से लंगड़े थे। इसलिए इसका नाम लंगड़े हाफिज की मस्जिद पड़ा। इसी मस्जिद के अंदर चांद कमेटी का कार्यालय भी है और इसकी देखरेख अंजुमन इंतेजामिया मसाजिद कमेटी करती है। इसके सचिव सैयद मोहम्मद यासीन के अनुसार इस मस्जिद को जमीन खरीदकर बनवाया गया था। जिसका कागज हमारे पास है। नगर निगम और राजस्व विभाग ने लगाईं संयुक्त रिपोर्ट हाल ही में नगर निगम और राजस्व विभाग की संयुक्त टीम ने सत्यापन किया तो पाया की लंगड़े हाफिज मस्जिद का कुछ हिस्सा नुजूल लैंड पर है। जिला प्रशासन की पहल पर नगर निगम ने इसे खाली करने की नोटिस भेजने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इस खबर के आनेके बाद से दालमंडी के लोगों में आक्रोश की लहर है। चौड़ीकरण में 20 फिट जद में चौड़ीकरण की जद में मस्जिद लंगड़े हाफिज का 20 फीट का हिस्सा है जिसपर लाल निशान पीडब्ल्यूडी ने लगाया है। मुआवजे के लिए राजस्व विभाग ने दस्तावेज खगाले तो इसमें से कुछ हिस्सा नुजूल लैंड पर बना पाया गया। ऐसे में राजस्व और नगर निगम ने कागजों का सत्यापन शुरू कर दिया है। जल्द ही मस्जिद के जिम्मेदारों से भी कागज मंगवाकर सत्यापित किया जाएगा अब जानिए क्या बोले दालमंडी के लोग ? क्यों कहा की नहीं भूले हैं बाबरी का दर्द ?… आजादी के पहले की मस्जिद तो नुजूल लैंड कैसे दालमंडी के रहने वाले इमरान अहमद बबलू ने बताया - यह गलत खबर है। पहली बात की लंगड़े हाफिज की जो मस्जिद है। वह 250 साल पुरानी मस्जिद है। हाल ही में माननीय न्यायालय का एक फैसला आय था वक्फ बाई यूजर। इसका मतलब है कि यदि कोई व्यक्ति किसी मस्जिद का 200 साल से इस्तेमाल करता आ रहा है तो उसका कागज आप नहीं मांग सकते। ऐसी ही लंगड़े हाफिज मस्जिद है। उसका कागज नहीं मांगा जा सकता है। इमरान ने कहा लंगड़े हाफिज मस्जिद भी 200 साल पुरानी है और सभी महकमें आजादी के बाद बने तो आप कैसे कह सकते हैं नुजूल लैंड? एक बाबरी का दर्द नहीं भूले,आप 6 का देने की तैयारी में हैं इमरान ने प्रधानमंत्री से निवेदन करते हुए कहा - कम से कम दालमंडी में रहने वाले और यहां दुकान चलाने वालों के साथ इंसाफ किया जाए। माननीय उच्चतम न्यायालय से हम निवेदन करना चाहते हैं कि दालमंडी के लोगों की पीड़ा समझें और स्वतः संज्ञान लें। इमरान ने कहा दालमंडी में 6 मस्जिदें हैं। एक बाबरी का दर्द हम भूल नहीं पाए हैं। सात बाबरी का दर्द देना की ये तैयारी कर रहे हैं। जिसको हम लोग बर्दाश्त नहीं करेंगे। क्या दालमंडी के अलावा शहर में कहीं जर्जर मकान नहीं? इमरान ने आगे बताया - दालमंडी में जिस तरह से चौड़ीकरण की आड़ में दुकानदारों और मकान मालिकों के मौलिक अधिकारों का हैं किया जा रहा है। जो मकान जर्जर नहीं है उसपर जर्जर की नोटिस या वीडीए की नोटिस लगा दी जा रही है। जो मकान नहीं बेच रहा है उसके यहां नोटिस जा रही है। हाल ही में 65 मकानों पर वीडीए ने नोटिस दी है। क्या दालमंडी के अलावा शहर में कहीं जर्जर मकान नहीं है। मत छीनिये हमारा लोकतान्त्रिक अधिकार इमरान ने प्रधानमंत्री और न्यायालय से निवेदन करते हुए कहा - कम से कम इस लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में दालमंडी के लोगों और दुकानदारों का हक न छीना जाए। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में एक पीआईएल दायर हुई है जिसमें चार सप्ताह में राज्य सरकार को जवाब देना है। वहीं वक्फ की बात करें तो कोई मुतवल्ली वक्फ की प्रॉपर्टी का मालिक नहीं होता। जब तक की वक्फ ट्रिब्यूनल नहीं बेचता। अचानक से कैसे आया नुजूल लैंड स्थानीय निवासी शमशाद खान ने बताया - बचपन से इस मस्जिद को हम लोग देख रहे हैं। इसे प्रशासन नुजूल लैंड बता रहा है। प्रशासन यहां कुछ और करना चाहत है लेकिन उसपर वह फेल हो रहा है। अब उसने मस्जिद के कुछ हिस्से को नुजूल लैंड बता दिया। इनको जितना चाहिए वो नुजूल में आ रही और जो नहीं चाहिए वो नुजूल में नहीं है। वक्फ बोर्ड आजादी के बाद बना है। हमारे बजुर्गों ने अल्लाह की राह में यह प्रॉपर्टी दी है। ये किसी मुतवल्ली या वक्फ बोर्ड का हक नहीं है कि इसे किसी को बेच दे। 6 लेन सड़क नहीं ये दालमंडी है शमशाद ने कहा - सरकार कह रही विकास का काम है और तोड़ा जा रहा है। विकास के नाम पर कहीं 6 लेन सड़क बन रही है तो वहां अगर मस्जिद-मंदिर बीच में आ रहा है तो उसे हटाया जा सकता है। बात समझ में आती है, लेकिन दालमंडी जहां मुस्लिम रहते हैं। यहां 6 मस्जिदें हैं। सड़क पर तीन इमामबाड़े हैं। एक अन्य वक्फ की प्रॉपर्टी है। उसको तोड़कर अगर आप विकास की बात कर रहे हैं। तो यह गलत है। माहौल खराब करने की कोशिश की जा रही है शमशाद खान ने आरोप लगाते हुए कहा - बार बार कह रहे हैं सुगम रास्ता बनाया जा रहा है। विश्वनाथ मंदिर जाने के लिए; तो क्या मुस्लिम समाज इस जगह को छोड़कर कहीं चला जाए। यहां जो हमारी इबादतगाहें हैं उन्हें छोड़ दें। प्रशासन और पुलिस चाहती है की कैसे भी मुस्लिम समाज को डैमेज करें। साथ ही यहां का माहौल खराब कर दिया जाए। शमशाद ने कहा हम लोग चाहते हैं कि हमारी जो इबादतगाह है वो वैसे ही रहे। इसके अलावा जो इंतेजामिया हैं और जो रजिस्ट्री कर रहे हैं। उनसे कहना चाहता हूं की आप के बाप की जमीन नहीं है। जो आप रजिस्ट्री कर रहे हैं। VDA के पहले की बिल्डिंग को नक्शा पास न होने की नोटिस कपड़ा मार्केट व्यापार मंडल अध्यक्ष फारुख खान ने बताया - सरकार की मंशा मुआवजा देने की नहीं है। इसलिए अब नोटिस दी जा रही है। जब साल भर पहले चिह्णहीकरण हुआ तो उस समय किसी का मकान जर्जर नहीं था और न ही वीडीए की नोटिस नहीं थी। आज मुआवजा देना है तो अब उसे जर्जर बताया जा रहा है। अब वीडीए ने नोटिस लगा दी है। इसके पहले भी इन्होने नोटिस दी थी। जिन मकानों पर इन्होने नोटिस दी है कह रहे की वो सभी एक सप्ताह और महीने बनी है। उन्होंने कहा वीडीए 1972 में आया उसके पहले की कई बिल्डिंग है जिसे नोटिस दी गई है। दालमंडी के साथ हो रहा गलत व्यवहार फारुख खान ने बताया - सरकारी मकहमा अब दालमंडी के साथ गलत व्यवहार कर रहा है। नियत साफ नहीं है जिसे पूरा देश देख रहा है। फारुख ने कहा हाल ही में दालमंडी में एक मकान बेचा गया था। जिसे एक लाख 60 हजार स्क्वायर मीटर के हिसाब से बेची गई। लेकिन आप मुआवजा आज 44 हजार स्क्वैर मीटर दे रहे हैं। ऐसा क्यों? गोदौलिया पर आप एक लाख 60 स्क्वायर मीटर का मुआवजा दिया है। नाजायज करेंगे तो जनता उसका जवाबी देगी और सही मुआवजा नहीं मिलेगा तो लोग कोर्ट में जाएंगे। अब जानिए दालमंडी में कितनी मस्जिदें टूटेंगी ? और लंगड़े हाफिज मस्जिद का इतिहास… एक बार में 5 हजार से ज्यादा नमाजी करते हैं इबादत नई सड़क के कपड़ा मार्केट में लंगड़े हाफिज मस्जिद बनी है। इसमें चांद कमेटी का कार्यालय भी है। मस्जिद की देखभाल ज्ञानवापी मस्जिद की देख-रेख करने वाली अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी ही करती है। कमेटी के जॉइंट सेक्रेटरी एसएम यासीन ने बताया- यह मस्जिद आजादी के पहले की है। इसमें जुमे, ईद और बकरीद की नमाज सबसे आखिर में होती है। एक बार में 5 से साढ़े 5 हजार लोग इबादत करते हैं। हमारी खरीदी हुई जमीन पर है मस्जिद एसएम यासीन ने बताया- यह मस्जिद हमारी खरीदी हुई जमीन पर है। किसी सरकारी जमीन पर नहीं है। जिस जगह यह मस्जिद है, वहां चौड़ीकरण के लिए पर्याप्त सड़क है। कुछ हिस्सा ही जद में आएगा। यह मस्जिद खुदा बक्श जायसी ने बनवाई थी, जो पैर से दिव्यांग थे। ये पांच और मस्जिद भी हैं जद में निसारन की मस्जिद लंगड़े हाफिज की मस्जिद से 100 मीटर दूर निसारन की मस्जिद है। मस्जिद के मुतवल्ली मोहम्मद आजम हमें मस्जिद में ऊपर ले गए, क्योंकि नीचे दुकानें बनी हैं। उन्होंने बताया- यह मस्जिद 1826 में हमारे पुरखों ने तामीर (बनवाई) कराई थी। साल 1929 में इसे सरकारी अभिलेख में दर्ज करवा दिया गया। इसमें एक बार में 250 लोग नमाज पढ़ सकते हैं। रंगीले शाह शाही मस्जिद चौड़ीकरण के जद में आने वाली तीसरी मस्जिद नई सड़क से तकरीबन 150 मीटर दूर बंशीधर कटरे के ठीक सामने मस्जिद रंगीले शाह है। यह शाही मस्जिद है। इसके मुतवल्ली बेलाल अहमद हैं। मस्जिद सड़क पर 60 से 65 फिट चौड़ी है। वहीं गहराई करीब 70 फिट है। इसमें एक वक्त में 500 नमाजी नमाज पढ़ते हैं। यह जुमा मस्जिद है। यहां ईद और बकरीद की नमाज भी होती है। इसका का भी 20 से 26 फिट का हिस्सा चौडीकरण की जद में जाएगा अली रजा मस्जिद नई सड़क पर स्थित दालमंडी गली के मोड़ से 200 मीटर की दूरी पर मस्जिद अली रजा मौजूद है। यह 200 साल पुरानी है। मस्जिद के मुतवल्लियों की कमेटी के सदस्य और मुतवल्ली सेराज अहमद ने बात की और बताया - सड़क पर मस्जिद की लंबाई 60 फीट है। गहराई करीब 26 फीट है। यदि दोनों तरफ मिलाकर सड़क चौड़ीकरण में 17.5 मीटर लिया गया, तो इस मस्जिद का सिर्फ 3 फीट का हिस्सा बचेगा। पूरी मस्जिद खत्म हो जाएगी। संगमरमर वाली मस्जिद दालमंडी गली के मोड़ से करीब 350 मीटर दूर घुघरानी गली के पहले संगमरमर वाली मस्जिद है। मस्जिद के मुतवल्ली मोहम्मद साजिद हैं। मस्जिद 200 साल पुरानी है। इसका आगे का हिस्सा जर्जर था, जिसे 1935 में दोबारा निर्माण कराया गया है। यह जामा मस्जिद नहीं है। इसमें एक बार में 100 लोग नमाज पढ़ सकते हैं। नमाजियों के साथ ही साथ मार्केट के लोग भी इस मस्जिद का पानी पीने के लिए इस्तेमाल करते हैं। जिसमें हिंदू-मुस्लिम सभी हैं। इसकी लंबाई सड़क पर 70 फीट और गहराई 60 फीट है, जो पीछे जाकर पतली हो गई है। मस्जिद करीमुल्लाह बेग मस्जिद करीमुल्लाह बेग की देखभाल मिर्जा सैफ करते हैं। मस्जिद उनके खानदान की है। इसमें एक मजार भी है। चौड़ीकरण की जद में इसका ज्यादातर हिस्सा चला जाएगा। यह मस्जिद दालमंडी के दूसरे छोर चौक पर स्थित है। इसी मस्जिद से गली शुरू होती है। मुतवल्ली के अनुसार यह मस्जिद 1811 में बनवाई गई थी। मस्जिद में स्थित मजार का उर्स पर जायरीनों की भीड़ उमड़ती है। इस मस्जिद में जुमा नहीं होता । एक वक्त में 250-300 लोग नमाज पढ़ते हैं। रमजान में तराबीह की नमाज होती है। इसकी सड़क पर चौड़ाई 60 फिट और गहराई 40 फिट है।
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