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    Europe Heatwave: क्लाइमेट चेंज का जानलेवा असर, फ्रांस से जर्मनी तक क्यों उबल रही है धरती?

    17 hours ago

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    यूरोप में चिलचिलाती धूप के कारण तापमान के सारे रिकॉर्ड टूट रहे हैं और पूरा महाद्वीप भीषण गर्मी का सामना कर रहा है। मंगलवार और बुधवार को फ्रांस में इतिहास के सबसे गर्म दिन दर्ज किये गए। देश के पश्चिमी हिस्सों में अधिकतम तापमान 39 से 43 डिग्री सेल्सियस के बीच पहुंच गया। बुधवार ब्रिटेन के इतिहास में जून का सबसे गर्म दिन रहा, जहां तापमान 36.1 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया। शुरुआती आंकड़ों के अनुसार, स्पेन, जर्मनी, ऑस्ट्रिया, नीदरलैंड और स्विट्जरलैंड में भी कई स्थानों पर जून के तापमान के रिकॉर्ड टूट गए हैं। और यह सिलसिला अभी थमा नहीं है। इस बीच, लोगों की जान भी गई है, इनमें वे दर्जनों लोग भी शामिल हैं जो पिछले हफ्ते फ्रांस में भीषण गर्मी से राहत पाने की कोशिश में डूब गए। वहीं, समुद्र की सतह का वैश्विक तापमान एक बार फिर रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। इस बीच, ऑस्ट्रेलिया के मौसम विभाग ने आधिकारिक तौर पर अलनीनो की स्थिति बनने की बात कही है, जिससे ऑस्ट्रेलिया, एशिया और दक्षिण प्रशांत क्षेत्र में इस वर्ष सामान्य से अधिक गर्म और शुष्क मौसम रहने के आसार हैं। वहीं, भारत और पाकिस्तान भी भीषण गर्मी का सामना कर रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि इस भीषण गर्मी की आखिर वजह क्या है और यह इतनी गंभीर क्यों है? असामान्य गर्मी: जब किसी क्षेत्र में लगातार तीन या उससे अधिक दिन तक सामान्य से कहीं अधिक तापमान दर्ज होता है, तो उसे ‘हीटवेव’ (भीषण गर्मी) कहा जाता है। इसका आकलन उसी स्थान के पिछले वर्षों के मौसम संबंधी आंकड़ों के आधार पर किया जाता है। लेकिन मौजूदा समय में यूरोप में भीषण गर्मी ने वैज्ञानिकों की चिंता दो प्रमुख कारणों से बढ़ा दी है। पहला कि यूरोप में, साल का सबसे गर्म समय जुलाई के मध्य से लेकर आखिर तक होता है। लेकिन हालिया शोध बताते हैं कि अब भीषण गर्मी जून में ही पड़ने लगा है। वर्ष 1950 के बाद यह केवल दूसरी भीषण गर्मी है, जो यूरोप में गर्मियों के चरम मौसम से कई सप्ताह पहले शुरू हुई है। वैज्ञानिकों के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के कारण भीषण गर्मी पहले की तुलना में अधिक समय तक पड़ रही है। एक अध्ययन में, जून 2025 में दक्षिण-पूर्वी इंग्लैंड में पड़ी भीषण गर्मी का विश्लेषण किया गया। इसमें पाया गया कि यदि मानव गतिविधियों से होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का प्रभाव न होता, तो ऐसी भीषण गर्मी लगभग 50 वर्षों में केवल एक बार आती। लेकिन मानव-जनित जलवायु परिवर्तन के कारण वैश्विक तापमान में हुई 1.3 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि को ध्यान में रखते हुए पाया गया कि ऐसी भीषण गर्मी की स्थिति अब 50 वर्ष में एक बार नहीं, बल्कि कम से कम हर पांच वर्ष में एक बार देखने को मिल रही है। दूसरा कि यदि जलवायु परिवर्तन नहीं हुआ होता, तो वर्ष के इस शुरुआती दौर में इतनी भीषण गर्मी संभवत: नहीं होती। इतना ही नहीं, तापमान भी इतने बड़े अंतर से पुराने रिकॉर्ड नहीं तोड़ता। मंगलवार और बुधवार फ्रांस के लिए 1947 से रिकॉर्ड शुरू होने के बाद सबसे गर्म दिन रहे। पूरे देश का औसत तापमान 29.9 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। सिर्फ मंगलवार को ही फ्रांस के 147 शहरों में जून का अब तक का सबसे अधिक तापमान दर्ज किया गया, जबकि 41 मौसम केंद्रों पर तापमान 43 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच गया। मंगलवार और बुधवार की रात भी फ्रांस के इतिहास की सबसे गर्म रात रही। पूरे देश का औसत रात्रि तापमान 21.6 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। हालात इतने गंभीर थे कि कुछ नदियों का पानी भी असामान्य रूप से गर्म हो गया, जिससे उसका इस्तेमाल परमाणु ऊर्जा संयंत्रों में शीतलन के लिए नहीं किया जा सका। इसी सप्ताह स्पेन में भी दिन और रात के तापमान के कई रिकॉर्ड टूटे। एक स्थान पर लगातार तीन रात तक तापमान 30 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक बना रहा, जबकि देश के कुछ हिस्सों में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच गया। पश्चिमी यूरोप में, यह भीषण गर्मी सप्ताह के मध्य में चरम पर पहुंचने के बाद महाद्वीप के पूर्वी हिस्से का रूख कर सकती है। अनुमान है कि सप्ताहांत में पोलैंड और जर्मनी सबसे अधिक प्रभावित होंगे। भीषण गर्मी की वजह क्या है? स्थानीय स्तर पर ‘हीटवेव’ की स्थिति तब उत्पन्न होती है, जब किसी क्षेत्र के ऊपर उच्च वायुदाब का मजबूत क्षेत्र लंबे समय तक बना रहता है। ये उच्च वायुदाब प्रणालियां ‘वायुमंडलीय परत’ की तरह काम करती हैं, जो गर्म हवा को नीचे की सतह के पास रोके रखती हैं। साथ ही बादलों को हटाकर धूप को धरती तक पहुंचने देती हैं, जिससे तापमान और बढ़ जाता है। वृहद स्तर पर तेल, कोयला और गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों के उपयोग से हो रहा जलवायु परिवर्तन भीषण गर्मी और उसकी अवधि, दोनों को प्रभावित कर रहा है। वायुमंडल में बढ़ती अतिरिक्त गर्मी बड़े पैमाने के मौसमीय पैटर्न को भी बदल रही है। इससे धीमी गति से आगे बढ़ने वाली उच्च वायुदाब प्रणालियां अधिक बनने लगी हैं, जिससे भीषण गर्मी का खतरा बढ़ जाता है। शोध से पता चलता है कि 1950 से 1999 के बीच यूरोप में भीषण गर्मी के केवल पांच दौर देखने को मिले थे। लेकिन 2000 से 2021 के बीच ऐसे 18 दौर देखने को मिले। यदि 2022, 2023 और 2025 की भीषण गर्मी को भी जोड़ दिया जाए, तो केवल 25 वर्षों में ऐसे गंभीर भीषण गर्मी के दौर की संख्या 20 से अधिक रही। यह स्पष्ट संकेत है कि यूरोप में भीषण गर्मी की स्थिति अब अक्सर देखने को मिल रही है। किस तरह प्रभावित कर रही यह भीषण गर्मी? फ्रांस में इस भीषण गर्मी के कारण अब तक कई लोगों की जान जा चुकी है। ‘यूरोपियन क्लाइमेट रिस्क असेसमेंट’ के अनुसार, दक्षिणी यूरोप में भीषण गर्मी पहले ही जनस्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन चुकी है। आने वाले वर्षों में दक्षिणी और पश्चिम-मध्य यूरोप के लोगों में गर्मी संबंधी बीमारियों का खतरा अधिक रहेगा। जलवायु परिवर्तन के कारण अब किसी भी वर्ष अत्यधिक गर्मी पड़ने का खतरा पहले की तुलना में काफी बढ़ गया है। यदि इसके साथ अलनीनो का प्रभाव भी जुड़ जाता है, तो 2026 और 2027 में वैश्विक औसत तापमान रिकॉर्ड स्तर के करीब रहने के प्रबल आसार हैं। बदलती जलवायु के इस दौर में अत्यधिक गर्मी अब किसी एक देश या महाद्वीप की समस्या नहीं रह गई है। यह पूरी दुनिया के सामने उभरता हुआ एक वैश्विक संकट है, जिसका असर मानव स्वास्थ्य, पर्यावरण और अर्थव्यवस्था - तीनों पर पड़ रहा है।
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