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    CSJMU की स्टडी में खुलासा:सिर्फ डिग्री के लिए हो रही रिसर्च, ग्राउंड रियलिटी और लोकल समस्याओं से दूरी

    2 hours ago

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    छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय (CSJMU) के शिक्षा संकाय में हुए एक ताजा अध्ययन ने विश्वविद्यालयों में हो रहे शोध कार्यों की पोल खोल दी है। शोधार्थी देश दीपक द्वारा डॉ. रश्मि गोरे के निर्देशन में किए गए इस अध्ययन से पता चला है कि आज के दौर में भी शिक्षा क्षेत्र के शोध पुराने और पारंपरिक तरीकों के इर्द-गिर्द ही सिमटे हुए हैं। आधुनिक और नवाचारी पद्धतियों को अपनाने में शोधार्थी अब भी पीछे हैं। ​पुराने तरीकों का दबदबा, नवाचार की कमी अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि शिक्षा के क्षेत्र में शोध करने के लिए अभी भी उन्हीं घिसे-पिटे पारंपरिक तरीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है जो दशकों पहले प्रचलित थे। मिश्रित पद्धतियों और नए प्रयोगों का अभाव साफ तौर पर देखा गया है। शोध की यह स्थिति बताती है कि जब तक पद्धतिगत बदलाव नहीं होगा, तब तक रिसर्च को समकालीन और प्रभावी बनाना मुश्किल है। ​तकनीक और स्थानीय समस्याओं पर ध्यान नहीं इस शोध में सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि शोधार्थियों का ध्यान स्थानीय शैक्षिक समस्याओं और तकनीकी उपयोग जैसे गंभीर विषयों पर बहुत कम है। क्षेत्रीय असमानताओं जैसे अहम मुद्दों पर भी पर्याप्त काम नहीं हुआ है। अधिकतर शोध कार्य उन विषयों पर केंद्रित हैं जिन पर पहले ही काफी कुछ लिखा जा चुका है, जबकि समाज की वर्तमान जरूरतों और जमीनी हकीकत से जुड़े विषयों को नजरअंदाज किया जा रहा है। ​भविष्य के लिए सुधार की गुंजाइश अध्ययन ने यह साफ संकेत दिया है कि अगर भविष्य के शोधार्थी नए और प्रासंगिक क्षेत्रों पर काम करें, तो न केवल शिक्षा की गुणवत्ता सुधरेगी बल्कि शिक्षा व्यवस्था भी अधिक व्यावहारिक बन सकेगी। नए विषयों पर शोध करने से इसे समाज के लिए अधिक उपयोगी बनाया जा सकता है। नीति निर्धारण में मिलेगी मदद विशेषज्ञों का मानना है, कि यह अध्ययन आने वाले समय में नीति-निर्माण और पाठ्यक्रम विकास के लिए एक साक्ष्य के रूप में काम करेगा। भविष्य के शोध को सार्थक और नवाचारी बनाने के लिए यह रिपोर्ट एक गाइड की भूमिका निभा सकती है। इससे शिक्षण पद्धतियों को मजबूत करने और समाज की वास्तविक आवश्यकताओं के अनुरूप शोध कार्य को दिशा मिलने की उम्मीद है।
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