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    आर्टेमिस II मिशन- चंद्रमा का चक्कर लगाकर लौटे 4 एस्ट्रोनॉट:सुबह 5.37 बजे प्रशांत महासागर में लैंडिंग; 11.17 लाख किमी का सफर तय किया

    7 hours ago

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    नासा के आर्टेमिस II मिशन के चार अंतरिक्ष यात्री चंद्रमा की दहलीज को छूकर धरती पर वापस लौट आए हैं। आज 11 अप्रैल को सुबह 5:37 बजे (IST) उनका ओरियन कैप्सूल अमेरिका के सैन डिएगो के तट के पास प्रशांत महासागर में 'स्प्लैशडाउन' हुआ। ये मिशन 2 अप्रैल को लॉन्च हुआ था। 1972 के बाद यह पहली बार है, जब इंसान चंद्रमा के इतने करीब पहुंचा है। आर्टेमिस II के अंतरिक्ष यात्रियों ने 6 अप्रैल को पृथ्वी से सबसे ज्यादा दूरी तक यात्रा करके किसी भी इंसानी अंतरिक्ष मिशन का रिकॉर्ड तोड़ा था। उन्होंने चांद के अंधेरे हिस्से की फोटोग्राफी भी की थी। इस मिशन का मकसद स्पेसक्राफ्ट के 'लाइफ सपोर्ट सिस्टम' की जांच करना था। नासा देखना चाहता था कि अंतरिक्ष में इंसानों के रहने के लिए यह कितना सुरक्षित है। यान अभी चंद्रमा की सतह पर नहीं उतरा, लेकिन भविष्य में चंद्रमा पर इंसानों के बसने का रास्ता आसान बनाएगा। 3000 डिग्री तापमान और 6 मिनट का ब्लैकआउट वापसी में 42 हजार किमी प्रति घंटा थी रफ्तार धरती के वायुमंडल में प्रवेश करते समय ओरियन स्पेसक्राफ्ट की रफ्तार 40,000 से 42,000 किमी प्रति घंटा थी। यह इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) से लौटने वाले यानों की तुलना में बहुत ज्यादा है। अधिक रफ्तार और गुरुत्वाकर्षण के कारण पैदा होने वाले भारी दबाव और गर्मी को सहने के लिए इस यान को खास तौर पर मजबूत बनाया गया था। 5 दशक बाद चांद के इतने करीब पहुंचे इंसान इस मिशन में अमेरिका के रीड वाइसमैन, विक्टर ग्लोवर, क्रिस्टीना कोच और कनाडा के जेरेमी हेंसन शामिल थे। ये चारों एस्ट्रोनॉट्स 50 साल से भी ज्यादा समय के बाद चंद्रमा के करीब जाने वाले पहले इंसान बन गए हैं। हालांकि, इन्होंने चांद पर लैंडिंग नहीं की, लेकिन इनका स्पेसक्राफ्ट धरती से 4,06,778 किमी की दूरी तक गया। यह दूरी 1970 के मशहूर अपोलो-13 मिशन द्वारा तय की गई दूरी से भी करीब 6,606 किमी ज्यादा है। चांद के अंधेरे हिस्से की फोटोग्राफी अब 2028 में चांद पर उतरने की तैयारी आर्टेमिस-2 की इस सफलता ने साल 2028 में होने वाली मानव लैंडिंग का रास्ता साफ कर दिया है। नासा का लक्ष्य केवल चांद पर फिर से जाना ही नहीं, बल्कि वहां इंसानों के रहने के लिए एक परमानेंट बेस बनाना भी है। इस सफलता के बाद अब चांद का इस्तेमाल भविष्य में मंगल और अन्य ग्रहों की यात्रा के लिए एक लॉन्चपैड के रूप में किया जा सकेगा। अपोलो और आर्टेमिस प्रोग्राम में बड़ा अंतर 70 के दशक में हुए अपोलो मिशन का मुख्य उद्देश्य सोवियत संघ के साथ चल रही 'स्पेस रेस' में खुद को बेहतर साबित करना था। आर्टेमिस प्रोग्राम पूरी तरह से भविष्य की तैयारी है। नासा इस बार चांद पर एक स्थायी बेस बनाना चाहता है, ताकि इंसान वहां रहकर काम करना सीख सके। यह अनुभव भविष्य में मंगल पर जाने के सपने को पूरा करने में मदद करेगा। नॉलेज पार्ट: इस मिशन से पहले केवल 24 लोग ही चांद के पास या उसकी सतह तक पहुंच पाए हैं। वे सभी अमेरिकी एस्ट्रोनॉट्स थे। सभी 1968 से 1972 के बीच चले अपोलो मिशन का हिस्सा थे। नासा के 'अपोलो प्रोग्राम' में क्रू और बिना क्रू वाले मिलाकर कुल 17 मिशन हुए। अगर सिर्फ उन मुख्य मिशनों की बात करें जिनमें अंतरिक्ष यात्री शामिल थे, तो ये 11 थे।
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