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    काशी के जगन्नाथ कॉरिडोर का 3D वीडियो हुआ जारी:एक लाख वर्गफीट में तैयार होगा प्रांगण, 2029 में कार्य पूरा करने का रखा गया लक्ष्य

    3 hours ago

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    काशी के दक्षिणी छोर पर जगन्नाथ कॉरिडोर का निर्माण शुरू हो गया है। अस्सी स्थित प्राचीन जगन्नाथ मंदिर को अब काशी कॉरिडोर के तर्ज पर विकसित किया जाएगा। नया जगन्नाथ कॉरिडोर कैसा होगा इसका फर्स्ट लुक भी सामने आ गया है। राजस्थान के धौलपुर के पत्थरों से इस कॉरिडोर का निर्माण होगा। मंदिर ट्रस्ट ने इसके लिए लाखों घन फुट पत्थर मंगाए है। धौलपुर के पत्थरों की खास बात यह है कि यह लाल,गुलाबी और सफेद रंग में उपलब्ध है। दीवारों पर खूबसूरत नक्काशी,फर्श और दीवारों के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता है। 3 साल में पूरा करने का लक्ष्य 1 मई को जगन्नाथ कॉरिडोर का शिलान्यास हो चुका है। मंदिर ट्रस्ट ने शिलान्यास के बाद 3 साल के भीतर इसके निर्माण काम को पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। माना जा रहा है साल 2029 के दिसम्बर महीने तक जगन्नाथ कॉरिडोर बनकर तैयार हो जाएगा। फिलहाल पहले फेज में ट्रस्ट इसके निर्माण पर 30 करोड़ रुपये खर्च करेगा‌। हालांकि इसके लिए ट्रस्ट राम मंदिर के तर्ज पर लोगों के चंदा भी इक्कठा करेगी। एक लाख वर्गफीट में होगा प्रभु जगन्नाथ का प्रांगण अस्सी घाट के समीप स्थित जगन्नाथ मंदिर का पुनर्निर्माण धौलपुर के शिल्पकार गिरिराज सैनी करेंगे। तीन वर्ष की अनुमानित अवधि में तैयार होने वाले मंदिर की कुल लागत 50 करोड़ रुपये तक आएगी। जनसहयोग से इसमें 30 करोड़ रुपये जुटाए लिए गए हैं। मंदिर के निर्माण के लिए पत्थर भी धौलपुर से ही आएंगे। ट्रस्ट से मिली जानकारी के अनुसार एक लाख वर्गफीट में मंदिर का मुख्य प्रासाद, शिखर, यज्ञ मंडप और वेदाध्ययन कक्ष भी बनाए जाएंगे। मंदिर का शिल्प जगन्नाथपुरी जैसा होगा मगर इसमें वर्तमान मंदिर का प्रतिबिंब भी होगा। नागर शैली में बन रहे दो शिखर वाले मंदिर में प्रथम तल का निर्माण भी होगा। शिखर पर परंपरागत रूप से जगन्नाथ महाप्रभु की पताका भी फहराई जाएगी। मंदिर के तीनों विग्रह यथावत रहेंगे। अब जानिए मंदिर का इतिहास महादेव की नगरी काशी में शैव-वैष्णव मतैक्य के प्रतीक अस्सी स्थित जगन्नाथ मंदिर की नींव 17वीं सदी में एक निर्वासित अनन्य भक्त की आस्था से पड़ी थी। यह कहानी परंपराओं के साथ ही भक्त और भगवान के मानस बंधन का भी बखान करती है। 17वीं सदी में जगन्नाथपुरी के सेवक और रथयात्रा महोत्सव के प्रबंधक ब्रह्मचारी जी किसी बात पर पुरी नरेश से नाराज होकर वहां से काशी की ओर चल दिए। तब पुरी नरेश ने भी उन्हें नहीं रोका। ब्रह्मचारी जी संकल्पबद्ध होकर केवल जगन्नाथ महाप्रभु का प्रसाद ही ग्रहण करते थे। नरेश को इस संकल्प का स्मरण आया तो उन्होंने हर रोज पुरी से काशी महाप्रसाद भेजने की व्यवस्था की। उस काल में सड़कें या साधन नहीं होते थे और पुरी से कांवर पर प्रसाद लेकर हरकारे काशी आते थे। मौसम या अन्य कारणों से कई बार प्रसाद पहुंचने में हफ्तों की देरी हो जाती थी और ब्रह्मचारी जी भूखे रह जाते थे। काशी के वर्णित इतिहास के मुताबिक 1790 में ऐसे ही लंबा उपवास काट रहे अपने भक्त के स्वप्न में स्वयं जगन्नाथ महाप्रभु आए और उन्हें काशी में प्रतिष्ठापित करने का आदेश दिया। ब्रह्मचारी जी ने इस स्वप्नादेश की चर्चा भोसला स्टेट के पंडित बेनीराम और दीवान विश्वंभरनाथ से की। उनके प्रयासों से अस्सी क्षेत्र में जगन्नाथ महाप्रभु को सकुटुंब स्थापित किया गया और वर्ष-1802 में रथयात्रा मेले की नींव पड़ी।
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