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    कानून का 'Merger' या BJP का Operation Lotus? Goa Case का फैसला बदलेगा दलबदल का पूरा खेल

    14 hours ago

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    बंगाल में ममता बनर्जी के हाथ से तृणमूल कांग्रेस (TMC) का कंट्रोल निकलना, महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की शिवसेना (UBT) के नौ में से छह सांसदों का एकनाथ शिंदे की शिवसेना में शामिल होना, दिल्ली और पंजाब में आप के सात सांसदों का बीजेपी में जाना  भारत के लगभग सभी इलाकों में एक साथ दल-बदल हो रहा है। दल-बदल विरोधी कानून से कौन बचता है, यह तय करने वाला सबसे अहम मामला गोवा का है, जो देश की सबसे बड़ी अदालत में पेंडिंग है। विपक्षी पार्टियों में हो रही इन उथल-पुथल और नेताओं के पाला बदलकर PM नरेंद्र मोदी की BJP के नेतृत्व वाले NDA में शामिल होने के साथ ही संवैधानिक कानून से जुड़ा एक ही सवाल उठता है। वह यह है कि संविधान की दसवीं अनुसूची में दिए गए दलबदल विरोधी कानून में क्या अपवाद हैं?इसे भी पढ़ें: स्पीकर से मुलाक़ात के बाद अभिषेक ने कहा- सिर्फ़ सांसद किसी दूसरी पार्टी में विलय नहीं कर सकतेअप्रैल में राघव चड्ढा के नेतृत्व में आप के दस में से सात राज्यसभा सांसदों ने BJP का दामन थाम लिया। मई में आए चुनाव नतीजों से पश्चिम बंगाल में बीजेपी की पहली सरकार बनी, और अब हारी हुई टीएमसी के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 ने BJP से बातचीत के बाद 'नेशनलिस्ट सिटिज़न्स पार्टी ऑफ़ इंडिया' (NCPI) नाम की एक कम जानी-पहचानी पार्टी में विलय का ऐलान किया है। इसी दौरान, शिवसेना (UBT) के नौ लोकसभा सांसदों में से छह ने पाला बदलकर शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल होने का फैसला किया है। इसे भी पढ़ें: Mamata Banerjee को TMC में सीधी चुनौती! बागी गुट ने बनाई नई National Committee, Abhishek की कुर्सी भी छिनीभारत का दल-बदल विरोधी कानून 1985 में लाया गया था। यह कानून किसी भी ऐसे विधायक या सांसद को अयोग्य ठहराता है जो अपनी मर्ज़ी से पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है या पार्टी के व्हिप (निर्देश) का पालन नहीं करता है। शुरुआत में इसमें दो तरह की छूट दी गई थी: विभाजन (split) और "विलय" (merger)। विभाजन वाली छूट का बार-बार गलत इस्तेमाल होने के कारण 2003 में इसे हटा दिया गया। अब दसवीं अनुसूची के पैरा 4 के तहत सिर्फ़ विलय की छूट बची है। इस पैरा के दो हिस्से हैं। (उप) पैरा 4(1) उस विधायक या सांसद को सुरक्षा देता है जहाँ मूल राजनीतिक पार्टी... किसी दूसरी राजनीतिक पार्टी में विलय कर लेती है। (उप) पैरा 4(2) कहता है, इस पैरा के उप-पैरा (1) के मकसद से, सदन के किसी सदस्य की मूल राजनीतिक पार्टी का विलय तभी माना जाएगा, जब संबंधित लेजिस्लेचर पार्टी (विधायक दल) के कम से कम दो-तिहाई सदस्य ऐसे विलय के लिए सहमत हों।इसे भी पढ़ें: Anti-Party Activities पर TMC का एक्शन, Mamata Banerjee ने Firhad Hakim समेत 8 नेताओं को पार्टी से निकालाअसली लड़ाई इस बात को लेकर है कि इन दोनों हिस्सों को एक साथ पढ़ा जाए या अलग-अलग। अगर दोनों को मिलाकर पढ़ा जाए, तो मूल राजनीतिक पार्टी को पहले किसी दूसरी पार्टी में विलय करना होगा, और लेजिस्लेचर पार्टी (यानी MLA या MP) के दो-तिहाई सदस्यों को बस इसकी पुष्टि करनी होगी। अगर अलग-अलग पढ़ा जाए, तो विलय के लिए MP के दो-तिहाई वोट ही काफ़ी हैं; इसके लिए मूल पार्टी के किसी फ़ैसले की ज़रूरत नहीं है। 
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