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    डिप्टी सीएमओ पर अवैध अस्पताल चलाने का आरोप:देवरिया में 23 दिन बाद भी कार्रवाई नहीं, अपर निदेश के आदेश की अवहेलना

    4 hours ago

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    देवरिया जिले में तैनात डिप्टी सीएमओ डॉ. अश्वनी पांडेय पर अवैध निजी अस्पताल चलाने का गंभीर आरोप है। इस आरोप के सामने आने के 23 दिन बाद भी उन पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। अपर निदेशक स्वास्थ्य गोरखपुर डॉ. जयंत कुमार ने 7 अप्रैल को डॉ. पांडेय को तत्काल नोडल प्रभार से हटाकर उनके मूल स्थान पर भेजने का निर्देश दिया था, लेकिन सीएमओ डॉ. अनिल गुप्ता ने अब तक इस आदेश का पालन नहीं किया है। इससे स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। जानकारी के अनुसार, डॉ. अश्वनी पांडेय को जिले में अस्पताल पंजीकरण, पीसीपीएनडीटी पंजीकरण और अवैध अस्पतालों पर कार्रवाई की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। ऐसे में उन्हीं पर "यूनिवर्सल हॉस्पिटल" नामक एक अपंजीकृत अस्पताल से जुड़े होने का आरोप सामने आना पूरे विभाग के लिए एक गंभीर मामला माना जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक, डॉ. अश्वनी पांडेय को अस्पतालों के पंजीकरण का नोडल अधिकारी भी बनाया गया था। जिन पर अवैध अस्पतालों को बंद कराने की जिम्मेदारी थी, वही खुद नियमों की अनदेखी करते पाए गए हैं। इससे विभागीय पारदर्शिता और जवाबदेही पर भी प्रश्नचिह्न लग गया है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि कार्रवाई के स्पष्ट आदेश के बावजूद डॉ. पांडेय को अब तक उनके मूल स्थान पर क्यों नहीं भेजा गया है। स्वास्थ्य विभाग में इस मामले को लेकर लगातार चर्चा बनी हुई है। मुख्यमंत्री पोर्टल पर शिकायत के बाद खुला मामला यह पूरा मामला मुख्यमंत्री पोर्टल पर की गई शिकायत के बाद सामने आया। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि देवरिया शहर में “यूनिवर्सल चिकित्सालय” नाम से एक अवैध अस्पताल संचालित किया जा रहा है, जिसमें डिप्टी सीएमओ डॉ. अश्वनी पांडेय की संलिप्तता है। शिकायत के बाद मुख्यमंत्री कार्यालय हरकत में आया और मंडलायुक्त से रिपोर्ट तलब की गई। इसके बाद अपर निदेशक स्वास्थ्य गोरखपुर डॉ. जयंत कुमार ने मामले की गोपनीय जांच के लिए टीम गठित की। जांच टीम को मौके पर भेजा गया, ताकि वास्तविक स्थिति स्पष्ट की जा सके। 18 मार्च को जांच टीम यूनिवर्सल अस्पताल पहुंची। वहां अस्पताल संचालित मिलता पाया गया। टीम ने देखा कि अस्पताल में मरीजों का इलाज चल रहा था और डॉ. अरविंद कुमार पांडेय मरीज देख रहे थे। वह दंत रोग विशेषज्ञ बताए गए। हालांकि अस्पताल प्रशासन के पास पंजीकरण से संबंधित कोई वैध दस्तावेज नहीं मिले। यही नहीं, अस्पताल परिसर में लगे बोर्ड पर डॉ. अश्वनी पांडेय और डॉ. मंजरी मिश्रा का नाम भी दर्ज पाया गया। इससे जांच और गंभीर हो गई। जांच में प्रारंभिक साक्ष्य मिलने पर एडी हेल्थ ने दिया हटाने का आदेश अपर निदेशक स्वास्थ्य डॉ. जयंत कुमार की जांच में डॉ. अश्वनी पांडेय की लापरवाही और संलिप्तता के प्रारंभिक साक्ष्य सामने आए। इसके बाद उन्हें आरोपों पर जवाब देने के लिए सात दिन का समय दिया गया। लेकिन निर्धारित अवधि पूरी होने के बाद भी डॉ. अश्वनी पांडेय की ओर से कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया। इसे गंभीर मानते हुए अपर निदेशक स्वास्थ्य ने 7 अप्रैल को सीएमओ देवरिया को पत्र भेजा। पत्र में स्पष्ट निर्देश दिया गया कि डॉ. अश्वनी पांडेय को तीन दिन के भीतर अस्पताल पंजीकरण और पीसीपीएनडीटी के नोडल प्रभार से हटाया जाए और यह जिम्मेदारी किसी अन्य अधिकारी को सौंपी जाए। साथ ही उन्हें कार्यमुक्त कर मूल तैनाती स्थल भेजने के निर्देश भी दिए गए। अपर निदेशक ने इसे बेहद गंभीर मामला बताते हुए कहा कि जिस अधिकारी पर अवैध अस्पतालों के खिलाफ कार्रवाई की जिम्मेदारी हो, उसी पर अपंजीकृत अस्पताल संचालन में संलिप्तता का आरोप स्वास्थ्य व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सीधा सवाल है। आदेश के बाद छुट्टी पर चले गए डॉ. अश्वनी पांडेय सूत्रों के अनुसार, जांच रिपोर्ट और कार्रवाई की भनक लगते ही डॉ. अश्वनी पांडेय अवकाश पर चले गए। इससे मामला और अधिक चर्चाओं में आ गया। विभागीय हलकों में इसे कार्रवाई से बचने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है। वहीं दूसरी ओर, सीएमओ डॉ. अनिल गुप्ता की चुप्पी ने विवाद को और गहरा कर दिया है। आदेश जारी होने के 23 दिन बाद भी न तो नोडल प्रभार बदला गया और न ही डॉ. अश्वनी पांडेय को मूल स्थान भेजा गया। स्वास्थ्य विभाग के भीतर भी यह सवाल उठ रहा है कि आखिर इतने गंभीर मामले में आदेश का पालन क्यों नहीं हो रहा। अगर अपर निदेशक स्वास्थ्य के स्पष्ट निर्देशों के बाद भी कार्रवाई नहीं होती, तो इससे शासन-प्रशासन की गंभीरता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। कई कर्मचारी और स्थानीय लोग इसे विभागीय संरक्षण का मामला मान रहे हैं। CMO की निष्क्रियता अब चर्चा का मुख्य विषय बन गई है। स्वास्थ्य विभाग की कार्यशैली कटघरे में, जवाब का इंतजार इस पूरे प्रकरण ने देवरिया के स्वास्थ्य विभाग की कार्यशैली को कटघरे में खड़ा कर दिया है। एक ओर सरकार अवैध अस्पतालों के खिलाफ अभियान चला रही है, वहीं दूसरी ओर जिम्मेदार पद पर बैठा अधिकारी खुद ऐसे आरोपों में घिरा हुआ है। डॉ. अश्वनी पांडेय पर लगे आरोपों ने यह भी साबित किया है कि निगरानी व्यवस्था कितनी कमजोर है। यदि मुख्यमंत्री पोर्टल पर शिकायत न होती, तो यह मामला शायद सामने ही नहीं आता। स्थानीय स्तर पर लोग पूछ रहे हैं कि आखिर डॉ. अश्वनी पांडेय पर इतनी मेहरबानी क्यों दिखाई जा रही है। क्या उन्हें बचाने की कोशिश हो रही है? क्या विभागीय दबाव के कारण कार्रवाई रोकी गई है? अब सभी की नजर सीएमओ कार्यालय पर टिकी है। देखना यह होगा कि स्वास्थ्य विभाग इस मामले में पारदर्शी कार्रवाई करता है या मामला फाइलों में दबकर रह जाता है। फिलहाल, सवाल बहुत हैं, लेकिन जवाब अभी तक नहीं मिला है।
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