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    बाबा नीब करौली बोले- हमारा साथ पिछले 83 जन्मों का:कष्ट मिटाऊंगा तो फिर जन्म लेना पड़ेगा; पानी को घी बनाने की लीला दिखाई

    15 hours ago

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    कैंची धाम में केवल मंदिर और आश्रम की ही नहीं, बल्कि बाबा नीब करौली के अनन्य भक्तों से जुड़ी कई अलौकिक कथाएं भी प्रचलित हैं। ऐसी ही एक कहानी बरेली निवासी किशनचंद तिवारी (केसी तिवारी) की है, जिन्हें महाराज-जी अपना 83 जन्मों का साथी बताते थे। विजय छाबरिया और डॉ. दीपक पटवर्धन की किताब 'दिव्य अनुभूति' में संस्मरण के अनुसार, केसी तिवारी एक प्रकांड विद्वान, विनम्र योगाभ्यासी और विद्यालय के प्रधानाचार्य थे। उच्च शिक्षित होने के बावजूद उनका मन सदैव अध्यात्म में रमता था। उनका मानना था कि आत्मिक उन्नति के लिए मन और इंद्रियों पर विजय आवश्यक है। इसी कारण उन्होंने अपने जीवन में कठोर अनुशासन अपनाया। उन्होंने अनाज का त्याग कर अल्प एवं सात्विक भोजन को अपनाया था, जिसे उनके ओजस्वी जीवन का आधार माना जाता था। मंत्रोच्चार के बीच छलक पड़ते थे आंसू तिवारी जी की शिवभक्ति भी चर्चा का विषय थी। महाशिवरात्रि पर वे तीन-तीन घंटे की चार अखंड पूजाएं करते थे। महाराज जी द्वारा दी गई जपमाला से घंटों नाम-जप और प्राणायाम करना उनकी नित्य साधना थी। मंत्रोच्चार और स्तोत्र पाठ के दौरान वे इतने भाव-विभोर हो जाते कि उनकी आंखों से अश्रुधारा बहने लगती थी। नीब करौली बाबा को तिवारी जी के ज्ञान पर गहरा विश्वास था। जब भी कोई भक्त आध्यात्मिक शंका लेकर आता, बाबा अक्सर उसका समाधान तिवारीजी से करवाते थे। ध्यान योग सीखने के लिए विदेशी भक्तों को भी बाबा उनके पास भेजते थे। कई बार बाबा स्वयं उनके ध्यान और समाधि की अवस्था का प्रदर्शन करते थे। कहा जाता है कि एक स्पर्श से बाबा उन्हें गहन समाधि में पहुंचा देते थे। एक बार एक चिकित्सक से उनकी जांच करवाई गई। डॉक्टर ने बताया कि तिवारीजी का शरीर बाहरी संसार से पूरी तरह कट चुका है और वे गहरी समाधि में हैं। बाद में स्वयं बाबा ने उन्हें उस अवस्था से बाहर निकाला। बीमारी पर पूछा- मेरा कष्ट क्यों नहीं दूर करते तिवारीजी लंबे समय तक फेफड़ों की बीमारी से पीड़ित रहे। असहनीय दर्द के दौरान उन्होंने एक दिन महाराज-जी से पूछा, आप मेरा यह कष्ट दूर क्यों नहीं कर देते? इस पर बाबा ने जवाब दिया, अरे किशन! मैं यह कष्ट अभी समाप्त कर सकता हूं, लेकिन यदि तुम्हारे प्रारब्ध भोग इस जन्म में नहीं कटे, तो उन्हें पूरा करने के लिए तुम्हें फिर जन्म लेना पड़ेगा। क्या तुम दोबारा जन्म-मृत्यु के चक्र में पड़ना चाहते हो? इसके बाद बाबा ने उनकी बीमारी की तीव्रता कम कर दी और उन्हें धैर्यपूर्वक अपना प्रारब्ध पूरा करने की सीख दी। एक बार तिवारीजी नैनीताल से कैंची धाम पहुंचे और कुछ नाराज होकर बोले, आप मुझे यहां क्यों खींच लाए? तब बाबा ने मुस्कुराते हुए कहा, मैं किसी को खींचकर नहीं लाता। हमारा यह संबंध आज का नहीं, पिछले 83 जन्मों का है। संस्मरण में इसे गुरु और शिष्य के बीच जन्मों-जन्मों के आध्यात्मिक संबंध का प्रतीक बताया गया है। शादी नहीं करना चाहते थे किशनचंद तिवारी का बचपन संघर्षों में बीता था। कम उम्र में ही माता-पिता का निधन हो गया। बाद में उनका पालन-पोषण करने वाली चाची भी नहीं रहीं। इन परिस्थितियों के कारण उन्होंने जीवनभर अविवाहित रहने का निर्णय ले लिया था, लेकिन एक बार बाबा उन्हें हल्द्वानी के एक परिवार में ले गए। वहां की एक युवती की सेवा-भावना देखकर बाबा ने तय कर लिया कि वही किशनजी की जीवनसंगिनी बनेगी। तिवारीजी ने विवाह से साफ इनकार कर दिया। इस पर बाबा ने कहा, जब तक तुम हां नहीं कहोगे, मैं यहां से नहीं जाऊंगा। अंततः तिवारीजी ने शर्त रखी कि बाबा लिखित रूप में उनके परिवार और गृहस्थ जीवन की जिम्मेदारी लें। जिसके बाद, बाबा ने कागज पर लिखकर दिया- तुम्हारे संसार का उत्तरदायित्व मेरा है। इसके बाद उन्होंने विवाह के लिए सहमति दे दी। एक बार लखनऊ के एक हनुमान मंदिर में बाबा ने तिवारीजी से शिव पूजा करने को कहा। तिवारीजी ने हंसते हुए जवाब दिया, मैं चार घंटे पूजा करूंगा और आप बीच में कहीं चले जाएंगे। जब उन्हें भरोसा नहीं हुआ तो बाबा ने अपने कान पकड़कर वचन दिया कि पूजा पूरी होने तक वह वहां से नहीं उठेंगे। कहा जाता है कि इसके बाद वे पूरे चार घंटे तक एक स्थान पर बैठे रहे। जहां लोग जाने से डरते थे, वहां बना मंदिर संस्मरण के अनुसार, वर्ष 1961 में महाराजजी इलाहाबाद में दादा मुखर्जी के घर ठहरे हुए थे। एक रात करीब 11 बजे अचानक उनके कमरे का दरवाजा खुला। बाहर आए दादा मुखर्जी ने जो दृश्य देखा, उसने उन्हें जीवनभर के लिए स्तब्ध और विस्मित कर दिया। बाबा का शरीर सामान्य से कहीं अधिक विशाल दिखाई दे रहा था। उनकी भुजाएं घुटनों तक पहुंच रही थीं और उनका स्वरूप हनुमानजी जैसा प्रतीत हो रहा था। बाद में उन्होंने अपनी पत्नी कमला दीदी को भी बुलाया। तिवारीजी के अनुसार, जिस पहाड़ी पर आज नैनीताल की प्रसिद्ध हनुमानगढ़ी स्थित है, वहां कभी बच्चों का श्मशान हुआ करता था। स्थानीय लोगों में उस स्थान को लेकर भय था। बाबा ने वहां संकटमोचन हनुमान की प्रतिमा स्थापित कर उस भय को भक्ति में बदल दिया। बाद में उनके मार्गदर्शन में हनुमानगढ़ी मंदिर का निर्माण हुआ, जो आज प्रमुख धार्मिक स्थलों में गिना जाता है। जब भंडारे में पत्तल खत्म हो गईं हनुमानगढ़ी मंदिर के उद्घाटन के समय विशाल भंडारे की तैयारी की गई थी। सभी इंतजाम पूरे हो चुके थे, लेकिन आखिरी समय में पता चला कि भोजन परोसने के लिए पत्तलों की व्यवस्था ही नहीं हुई है। सभी परेशान हो गए। तभी बाबा ने सड़क की ओर इशारा किया। कुछ देर बाद गधों पर हजारों पत्तलें लादे व्यापारियों का एक समूह वहां पहुंच गया। वे बाजार जाने के लिए उसी रास्ते से गुजर रहे थे। इस घटना को भक्त आज भी बाबा की लीला के रूप में याद करते हैं। भंडारे के दौरान एक और घटना हुई। रात में आयोजकों ने बताया कि घी समाप्त हो गया है। संस्मरण के अनुसार, बाबा ने सभी को वहां से हटाया और तिवारीजी को चुपचाप दो डिब्बे पानी सड़क पर रखने को कहा। सुबह जब वे डिब्बे खोले गए तो उनमें घी भरा हुआ था। बाद में बाबा ने मुस्कुराते हुए कहा, तुम लोगों का ध्यान ही नहीं रहता, घी तो यहीं रखा था। महाराजजी के प्रसिद्ध अमेरिकी भक्त कृष्णदास को तिवारीजी अपना ज्येष्ठ पुत्र मानते थे। कहा जाता है कि स्वयं बाबा ने उन्हें 'कृष्णदास' नाम दिया था। तिवारीजी और उनकी पत्नी ने उन्हें अपने पुत्र की तरह स्नेह दिया। बाद में कृष्णदास ने अपनी पुस्तक "Chants of a Lifetime" में लिखा कि यदि उन्हें तिवारी परिवार का साथ नहीं मिला होता, तो शायद वह जीवित भी नहीं होते। जपमाला हाथ में लेकर कहा- बच्चा नहीं मरेगा जीवन के अंतिम दिनों में तिवारीजी अस्पताल में भर्ती थे। उसी दौरान उनका पौत्र गंभीर हादसे के बाद कोमा में चला गया। तिवारीजी ने जपमाला हाथ में लेकर कहा, जब मैं अनन्य भाव से महाराज-जी से प्रार्थना करता हूं, तो वे मेरी पुकार सुनते हैं। वह बालक नहीं मरेगा। परिजनों के अनुसार, तीन दिन बाद बच्चे को होश आ गया। स्वास्थ्य लाभ के लिए बेटी के घर रह रहे तिवारीजी एक दिन ब्रह्ममुहूर्त में गिर पड़े और कोमा में चले गए। तीन दिन बाद उन्हें होश आया। उन्होंने अपनी पुत्री से केवल तीन शब्द कहे - मैं ठीक हूं। इसके कुछ ही क्षण बाद उन्होंने शांतिपूर्वक देह त्याग दी। उनके निधन के बाद उनकी पत्नी ने वह जपमाला कृष्णदास को सौंप दी, जो स्वयं महाराजजी ने तिवारीजी को दी थी। इसी के साथ नाम-स्मरण की वह परंपरा आगे बढ़ती रही। 1960 में शिप्रा नदी किनारे स्थापित हुआ था धाम कैंची धाम उत्तराखंड के नैनीताल जिले में भवाली के पास स्थित है। बाबा नीब करौली महाराज ने 1960 के दशक में शिप्रा नदी के किनारे इस आश्रम और हनुमान मंदिर की स्थापना की थी। यह स्थान अपनी आध्यात्मिक शांति और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए देश-विदेश में प्रसिद्ध है। ---------------- कैंची धाम पार्ट-1 की ये खबर भी पढ़ें : जब कैंची धाम पहुंचे कंबल वाले बाबा, चुनी तपोभूमि: बोले- यहां मंदिर बनाना है, फूल से धुनी खोजी; चौधरी चरण सिंह से कहा- PM बनोगे आज जिस कैंची धाम में देश-दुनिया से लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं, उसकी स्थापना और मंदिर निर्माण की कहानी भी किसी दिव्य संस्मरण से कम नहीं है। यह कहानी उस दिन से शुरू होती है, जब नीब करौली बाबा पहली बार कैंची पहुंचे और पूर्णानंद तिवारी से उनकी ऐतिहासिक मुलाकात हुई। आगे चलकर यही मुलाकात कैंची धाम आश्रम की नींव बनी। पढ़ें पूरी खबर…
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