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हाल ही में हमारे देश के पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय मोरारजीभाई देसाई की जन्म जयंती जतिन ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज (यानी जतिन इंडस्ट्रीज, शाम इंडस्ट्रीज और फ्लोस्टर इंजीनियर्स प्रा. लि.), GIDC, वटवा, अहमदाबाद द्वारा मनाई गई। इस अवसर पर जतिन ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मगनभाई पटेल और कंपनी के ऑफिस स्टाफ ने स्वर्गीय मोरारजीभाई देसाई को उनकी जन्म जयंती पर श्रद्धासुमन अर्पित किए।स्वर्गीय मोरारजीभाई देसाई का जन्म 29 फरवरी, 1896 को हुआ था। लीप वर्ष के कारण तारीख के अनुसार उनका जन्मदिन हर चार साल में एक बार आता है, इसलिए यह निर्णय लिया गया कि हर साल 28 फरवरी के बाद अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार 1 मार्च को या हिंदू तिथि के अनुसार विक्रम संवत फाल्गुन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा (एकम) यानी धुलेंडी के दिन उनका जन्मदिन होने की वजह से इस दिन मना सकते है।इस कार्यक्रम में स्वर्गीय मोरारजीभाई देसाई की गुजरात यात्रा के दौरान, वलसाड जिले के उस समय के DSP पी.के. बंसल साहब द्वारा उनकी सुरक्षा में तैनात किए गए एक पुलिस इंस्पेक्टर (जो वर्तमान में सेवानिवृत्त DYSP हैं) भी उपस्थित थे। उन्होंने स्वर्गीय मोरारजीभाई देसाई के साथ अपने अनुभवों को साझा किया, जिन्हें हम आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं। देश के एक महान प्रधानमंत्री, एक महान राष्ट्रनेता और राजधर्म के जीवंत उदाहरण स्वर्गीय मोरारजीभाई देसाई के जीवन के ये दिलचस्प किस्से आनेवाली पीढ़ी के लिए निश्चित रूप से प्रेरणादायक साबित होंगे।मगनभाई पटेल ने स्वर्गीय मोरारजीभाई देसाई के सादगीपूर्ण और अनुशासित जीवन के बारे में रोचक जानकारी देते हुए बताया कि स्वर्गीय मोरारजीभाई देसाई का जन्म 29 फरवरी, 1896 को वलसाड जिले के भादेली गांव में एक श्रीमंत गुजराती अनावील ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम रणछोड़जी नागरजी देसाई और माता का नाम वजियाबेन देसाई था। वे आठ बच्चों में सबसे बड़े थे। उनके पिता स्कूल के शिक्षक थे और कड़े अनुशासनप्रिय थे। उन्होंने बचपन से ही अपने पिता से हर परिस्थिति में कड़ी मेहनत और सत्यवादिता का मूल्य सीखा था। देसाई ने अपनी प्राथमिक शिक्षा सावरकुंडला की कुंडला स्कूल (जो अब मोदी स्कूल के रूप में जानी जाती है) में प्राप्त की और बाद में वलसाड की बाई आवा हाईस्कूल में दाखिला लिया। उन्होंने 1917 में मुंबई के प्रसिद्ध विल्सन कॉलेज से स्नातक (Graduate) की डिग्री प्राप्त की।स्वर्गीय मोरारजी देसाई भारत के पहले गुजराती प्रधानमंत्री थे, लेकिन राजनीति में आने से पहले स्नातक होने के बाद उन्होंने एक सनद अधिकारी (सिविल सर्विस) के रूप में सरकारी सेवा में अपना करियर बनाया था।उन्होंने वर्ष 1918 से 1930 तक गोधरा (जिला पंचमहल, गुजरात) के डिप्टी कलेक्टर के रूप में 12 वर्षों तक सेवा दी। हालांकि, 1930 में ब्रिटिश शासन की अन्यायपूर्ण नीतियों के विरोध में उन्होंने सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया और गांधीजी के विचारों से प्रेरित होकर उनके साथ स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हो गए। इस प्रकार,मोरारजी देसाई का करियर सरकारी नौकरी से शुरू हुआ और देश के सर्वोच्च पद तक पहुंचा।आज की युवा पीढ़ी स्वर्गीय मोरारजीभाई देसाई के जीवन से प्रेरणा ले सके, इसके लिए मगनभाई पटेल ने अपने संबोधन में बताया कि उनका जीवन कड़ी मेहनत, सख्त अनुशासन, नैतिकता और ईमानदारी जैसे आदर्श मूल्यों से भरा था। वे रोज सुबह 5 बजे उठ जाते थे और रात 10 बजे, चाहे कितना भी काम क्यों न हो, सो जाते थे; वे अपने टाइम मैनेजमेंट का बखूबी पालन करते थे। 40 वर्ष की आयु के बाद उन्होंने भोजन में अनाज लेना बंद कर दिया था और इसके बदले सुबह-शाम 5 बादाम, 2 अखरोट, 2 पिस्ता और एक गिलास गाय के दूध पर रहते थे। दोपहर के खाने में भी थोड़े से ड्रायफ्रूट और एक ग्लास गाय का दूध लेते थे। रात्रि के भोजन में भी वे थोड़ा फल और एक गिलास गाय का दूध लेते थे। वे स्वमूत्र चिकित्सा यानी 'शिवाम्बु' के प्रखर आग्रही थे। आयुर्वेद में 'शिवाम्बु' (Shivambu) एक प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धति है, जिसमें माना जाता है कि व्यक्ति के मूत्र में रोग प्रतिरोधक क्षमता और शरीर को पुनर्जीवित एवं ऊर्जावान बनाने के गुण होते हैं।भारतीय औषधि शास्त्र में जिस तरह गोमूत्र को औषधि माना जाता है,उसी तरह स्वमूत्र को भी औषधि माना गया है। मानवीय मूत्र में लगभग 95% पानी और शेष 5% में जटिल कार्बनिक यौगिक और खनिज होते हैं। पुराने समय में शरीर पर चोट या घाव होने पर उस पर स्वयं का मूत्र डाला जाता था, क्योंकि इसमें इंसुलिन, ग्रोथ हार्मोन्स और मेलाटोनिन जैसे महत्वपूर्ण तत्वों के साथ-साथ सोडियम, पोटेशियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम, फास्फोरस और आयरन जैसे खनिज तथा यूरिया, यूरिक एसिड, अमीनो एसिड और क्रिएटिनिन जैसे कार्बनिक पदार्थ होते हैं। इसके अलावा इसमें 'यूरोकाइनेज' (Urokinase) भी होता है, जो रक्त वाहिकाओं में रक्त के थक्कों (Clots) को घोलने में सहायक हो सकता है।मगनभाई पटेल ने स्वर्गीय मोरारजीभाई देसाई के सादगीपूर्ण जीवन के किस्से सुनाते हुए आगे बताया कि वे देश के प्रधानमंत्री होने के बावजूद एक सामान्य नागरिक की तरह जीवन व्यतीत करते थे। वे 2 कमरे और 1 रसोईघरवाले एक साधारण घर में रहते थे। देश के प्रधानमंत्री होने के बाद भी उनकी केवल एक या दो सुरक्षाकर्मी उनकी सुरक्षा में तैनात रहते थे। उनके घर में आधुनिक फर्नीचर या भौतिक सुख-सुविधावाली कोई विलासी वस्तु नहीं थी। घर में चार-पांच पतरे की कुर्सियां, लकड़ी के पाटवाला एक झूला और एक पलंग के अलावा और कोई साज-सामान नहीं था।मगनभाई पटेल ने स्वर्गीय मोरारजीभाई देसाई की राष्ट्रनिष्ठा को दर्शाते हुए एक किस्सा सुनाया। दिसंबर,1978 की बात है, गुजरात के वलसाड जिले मे 'डॉ.मंगाभाई मेमोरियल हॉल' का शिलान्यास कार्यक्रम था,उस समय के DSP पी.के. बंसल को मोरारजीभाई की सुरक्षा की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। मोरारजीभाई वलसाड जिले के भादेली गांव स्थित उनके मूल निवास्थान पर इस शिलान्यास कार्यक्रम हेतु 2 दिन रहने आये हुए थे। कार्यक्रम के लिए सुबह 7 बजे उनके घर से निकलना था। DSP बंसल साहबने अपने एक चुनिंदा पुलिस इंस्पेक्टर को इस ड्यूटी पर तैनात किया था। निर्देशानुसार, पुलिस इंस्पेक्टर समय पर मोरारजीभाई के निवास स्थान पर पहुंच गए। मोरारजीभाई नियत समय से 30 मिनट पहले बाहर आ गए। उन्होंने पुलिस इंस्पेक्टर को बैठने के लिए कुर्सी दी और कहा, 'यहां थोड़ी देर बैठिए, तब तक मैं अखबार पढ़ लेता हूं।' पुलिस इंस्पेक्टर उनकी सादगी देखकर चकित रह गए और बैठने में संकोच होने लगा, लेकिन देसाई साहब के आग्रह पर वे उनके बगल में एक पतरे की कुर्सी पर बैठ गए। थोड़ी देर बाद सुरक्षा जांच के लिए DSP बंसલ साहब वहां पहुंचे और मोरारजीभाई से कहा, 'साहब, कांग्रेस कार्यकर्ता काले झंडे दिखाकर विरोध प्रदर्शन करने वाले हैं। आप कहें तो उन्हें हटा दें?' तब मोरारજીभाई ने कहा, 'भाई बंसल, लोकतंत्र में विरोध करना विपक्ष का अधिकार है, आप उन्हें रोक नहीं सकते,आप केवल कानून व्यवस्था बनी रहे इसका ध्यान रखे।' इतना कहकर वे कार्यक्रम के लिए रवाना हो गए। शिलान्यास स्थल पर आयोजकोंने मिट्टी खोदने के लिए चांदी की कुदाल बनवाई थी। पूजा और शिलान्यास की औपचारिक विधि संपन्न होने के बाद, ट्रस्टियोंने वह चांदी की कुदाल मोरारजीभाई को भेंट करते हुए कहा,'साहब,यह आपके लिए है,आप इसे रख लीजिए।तब मोरारजीभाईने उसे लेने से साफ इनकार कर दिया और कहा, “मैं इसे नहीं ले सकता, यह कुदाल ट्रस्ट को दे दीजिए।'मगनभाई पटेल ने एक और धार्मिक प्रसंग का वर्णन करते हुए बताया कि एकबार स्वर्गीय मोरारजीभाई देसाई का गुजरात के बनासकांठा स्थित अंबाजी मंदिर में दर्शन का कार्यक्रम था। चैत्री नवरात्रि का समय होने के कारण मंदिर परिसर में मेहसाणा की कई भजन मंडलियां माताजी के भजन-कीर्तन करती हुई आई थीं। ये मंडलियां 24 घंटे अखंड धुन और आरती कर रही थीं। व्यवस्था ऐसी थी कि एक मंडली की 4 घंटे की धुन पूरी होते ही दूसरी मंडली आ जाती थी।देश के प्रधानमंत्री के आगमन के कारण सुरक्षा कारणों से इन भजन मंडलियों को मंदिर परिसर से थोड़ा दूर रखा जा रहा था। यह देख मोरारजीभाईने कहा, 'इन भजन मंडलियों को अपना काम करने दें,इन्हें कोई परेशानी न दें,मुझे दर्शन करने में कोई दिक्कत नहीं है।' देश के प्रधानमंत्री की सादगी देखकर हर कोई चकित रह गया। इसके बाद मोरारजीभाईने माताजी के दर्शन किए और मंदिर में आई भजन मंडलियों से पूछा, 'आप कहां से आए हैं?' उन्होंने कहा,'साहब,हम गुजरात के मेहसाणा जिले से आए हैं।' मोरारजीभाई ने कहा, 'बहुत सुंदर।' देश के प्रधानमंत्री का एक सामान्य व्यक्ति जैसा व्यवहार देखकर वहां उपस्थित भजन मंडलियां और दर्शनार्थी भावविभोर हो गए। उनकी सुरक्षा में केवल 1 अंगरक्षक और 3 पुलिस इंस्पेक्टर स्तर के अधिकारी ही तैनात थे।स्वर्गीय मोरारजी देसाई का राजनीतिक करियरवर्ष 1930 में जब भारत महात्मा गांधी द्वारा शुरू किए गए स्वतंत्रता संग्राम के बीच में था, तब देसाईने ब्रिटिश न्याय की भावना से अपना विश्वास खो दिया था। उस समय उन्होंने सरकारी सेवा छोड़ने और संघर्ष में कूदने का निर्णय ले लिया था। यह निर्णय लेना कठिन था, लेकिन देसाई को लगा कि 'जब देश की स्वतंत्रता का प्रश्न हो, तो परिवार से जुड़ी समस्याएं गौण हो जाती हैं।इसके बाद देसाई महात्मा गांधी के नेतृत्व में स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हुए और भारत में ब्रिटिश शासन के खिलाफ नागरिक अवज्ञा (Civil Disobedience) आंदोलन से जुड़ गए। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान देसाई को तीन बार जेल भेजा गया। वे 1931 में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य बने और 1937 तक गुजरात प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सचिव रहे। अपनी कुशाग्र नेतृत्व क्षमता और दृढ़ भावना के कारण, वे गुजरात क्षेत्र के स्वतंत्रता सेनानियों में लोकप्रिय हो गए और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक महत्वपूर्ण नेता के रूप में उभरे।1937 में जब प्रांतीय चुनाव आयोजित हुए, तब देसाई निर्वाचित हुए और उन्होंने बॉम्बे प्रेसीडेंसी के राजस्व मंत्री (Revenue Minister) और गृहमंत्री के रूप में अपनी सेवाएं दीं।महात्मा गांधी द्वारा शुरू किए गए व्यक्तिगत सत्याग्रह के दौरान देसाई को अक्टूबर 1941 में रिहा किया गया, लेकिन अगस्त 1942 में 'भारत छोड़ो आंदोलन' के दौरान उन्हें फिर से हिरासत में ले लिया गया। 1945 में उन्हें जेल से मुक्त किया गया। 1946 में राज्य विधानसभा चुनावों के बाद, वे बॉम्बे में गृह और राजस्व मंत्री बने। अपने कार्यकाल के दौरान,देसाई ने 'खेती करनेवाले की जमीन' (Land to the Tiller) प्रस्ताव की दिशा में कदम बढ़ाते हुए किरायेदारों को सुरक्षा और अधिकार प्रदान किए, जिससे भूमि राजस्व में कई दूरगामी सुधार हुए।पुलिस प्रशासन में उन्होंने जनता और पुलिस के बीच की बाधाओं को दूर किया और प्रशासन को जान-माल की रक्षा के लिए लोगों की जरूरतों के प्रति अधिक जवाबदेह बनाया। 1952 में, वे द्विभाषी राज्य (गुजरात और महाराष्ट्र) के मुख्यमंत्री बने, जिसका सचिवालय 'मुंबई' में था। यह वह समय था जब भाषाई राज्यों के लिए आंदोलन बढ़ रहे थे, विशेष रूप से दक्षिण भारत में। मुंबई एक द्विभाषी राज्य बन गया था, जिसमें गुजराती और मराठी भाषी लोग रहते थे। 1956 से संयुक्त महाराष्ट्र समिति ने मराठी भाषी महाराष्ट्र राज्य के लिए आंदोलन का नेतृत्व किया।मोरारजीभाई देसाई ऐसे आंदोलनों के विरोधी थे,जिनमें इंदुलाल याज्ञिक के नेतृत्ववाला महागुजरात आंदोलन भी शामिल था, जिसमें गुजरात के नए राज्य की मांग की गई थी। देसाईने महानगर मुंबई को केंद्र शासित प्रदेश बनाने का प्रस्ताव रखा था। उनका तर्क था कि एक अलग विकास क्षेत्र शहर के वैश्विक स्वभाव के अनुरूप होगा, जिसमें विभिन्न भाषाई, सांस्कृतिक और धार्मिक पृष्ठभूमि के नागरिक पीढ़ियों से रह रहे हैं।इस आंदोलन के कारण शहर और राज्य में हिंसा हुई और देसाईने फ्लोरा फाउंटेन पर एकत्र हुए संयुक्त महाराष्ट्र समिति के प्रदर्शनकारियों को हटाने का पुलिस को आदेश दिया। प्रदर्शनकारियों का नेतृत्व सेनापति बापट कर रहे थे। यह मुद्दा और गहरा गया और माना जाता है कि केंद्र सरकार को भाषा के आधार पर दो अलग राज्यों के लिए सहमत होने को मजबूर होना पड़ा। वर्तमान महाराष्ट्र राज्य के गठन के बाद, बॉम्बे (अब मुंबई) उसकी राज्य की राजधानी बनी। गोलीबारी में मारे गए लोगों के सम्मान में फ्लोरा फाउंटेन का नाम बदलकर 'हुतात्मा चौक' रखा गया,बाद में देसाई को दिल्ली बुलाया गया और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के मंत्रिमंडल में वित्त मंत्री के रूप में शामिल किया गया। देसाई के अनुसार, जब तक गांवों और शहरों में रहनेवाले गरीब और वंचित लोग उचित जीवन स्तर का आनंद नहीं लेते, तब तक समाजवाद की बात का कोई अर्थ नहीं रहेगा।देसाईने किसानों और किरायेदारों की मुश्किलों को दूर करने के लिए प्रगतिशील कानून बनाकर उनकी चिंताओं को ठोस रूप से व्यक्त किया। इस मामले में, देसाई की सरकार देश के किसी भी अन्य राज्य की तुलना में काफी आगे थी। इसके अतिरिक्त, उन्होंने कानून को निष्ठापूर्वक लागू किया और मुंबई में अपने प्रशासन के लिए व्यापक प्रतिष्ठा प्राप्त की।राज्यों के पुनर्गठन के बाद, देसाई 14 नवंबर, 1956 को वाणिज्य और उद्योगमंत्री के रूप में केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल हुए। इसके बाद, उन्होंने 22 मार्च, 1958 को वित्त मंत्रालय का कार्यभार संभाला।देसाईने आर्थिक नियोजन और राजकोषीय प्रशासन के क्षेत्र में अपने विचारों को लागू किया। रक्षा और विकास की जरूरतों को पूरा करने के लिए, उन्होंने बड़ा राजस्व एकत्रित किया, व्यर्थ के खर्चों को कम किया और प्रशासन पर सरकारी खर्च में मितव्ययिता (करकसर) का उपयोग किया। उन्होंने वित्तीय अनुशासन लागू करके घाटे के वित्तपोषण (Deficit Financing) को बहुत कम रखा। उन्होंने समाज के विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग के विलासी जीवन पर नियंत्रण लगाए।1963 में, उन्होंने 'कामराज योजना' के तहत केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया। पंडित नेहरू के बाद प्रधानमंत्री बने लाल बहादुर शास्त्रीने उन्हें प्रशासनिक व्यवस्था के पुनर्गठन के लिए 'प्रशासनिक सुधार आयोग' (Administrative Reforms Commission) का अध्यक्ष बनने के लिए प्रेरित किया। सार्वजनिक जीवन के उनके लंबे और विविध अनुभवने उन्हें उनके कार्य में बहुत सहायता प्रदान की।1967 में, देसाई श्रीमती इंदिरा गांधी के मंत्रिमंडल में उप-प्रधानमंत्री और वित्त प्रभारीमंत्री के रूप में शामिल हुए। जुलाई 1969 में, श्रीमती गांधीने उनसे वित्त विभाग वापस ले लिया। देसाईने स्वीकार किया कि प्रधानमंत्री को अपने सहयोगियों के विभागों में परिवर्तन करने का अधिकार है, लेकिन श्रीमती गांधी द्वारा उनके साथ परामर्श करने के सामान्य शिष्टाचार की कमी के कारण उनके आत्म-सम्मान को ठेस पहुंची। इसलिए उन्हें लगा कि उनके पास भारत के उप-प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।1969 में जब कांग्रेस पार्टी का विभाजन हुआ, तब देसाई संगठन कांग्रेस में रहे। उन्होंने विपक्ष में अग्रणी भूमिका निभाना जारी रखा। 1971 में वे फिर से संसद के लिए चुने गए। 1975 में, उन्होंने गुजरात विधानसभा के चुनाव आयोजित कराने के प्रश्न पर अनिश्चितकालीन उपवास किया, जिसे भंग कर दिया गया था। उनके उपवास के परिणामस्वरूप, जून 1975 में चुनाव हुए। चार विपक्षी दलों और उनके समर्थित निर्दलीयों द्वारा गठित 'जनता मोर्चा' को नए सदन में पूर्ण बहुमत प्राप्त हुआ।प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु के बाद, देसाई प्रधानमंत्री पद के लिए एक मजबूत दावेदार थे, लेकिन 1966 में इंदिरा गांधी द्वारा वे पराजित हुए। 26 जून, 1975 को आपातकाल (Emergency) की घोषणा के साथ ही देसाई को गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें हिरासत में ले लिया गया। उन्हें एकांत कारावास में रखा गया था और 18 जनवरी, 1977 को लोकसभा चुनाव कराने के निर्णय की घोषणा से कुछ समय पहले ही उन्हें रिहा किया गया। उन्होंने देश के कोने-कोने में ज़ोर-शोर से प्रचार किया और छठी लोकसभा के लिए मार्च, 1977 में आयोजित सामान्य चुनावों में जनता पार्टी की शानदार जीत हासिल करने में मुख्य भूमिका निभाई। देसाई स्वयं गुजरात के सूरत निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा के लिए चुने गए थे। बाद में उन्हें सर्वसम्मति से संसद में जनता पार्टी का नेता चुना गया और 24 मार्च, 1977 को उन्होंने भारत के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। वे उन्नीसवीं सदी में जन्मे दूसरे और अंतिम भारतीय प्रधानमंत्री थे।प्रधानमंत्री के रूप में, देसाई चाहते थे कि भारत के लोगों को इस हद तक निडर बनाया जाए कि यदि देश का सर्वोच्च व्यक्ति भी कुछ गलत करे, तो एक सामान्य नागरिक उसे बता सके। उनका मानना था कि 'कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं होना चाहिए, प्रधानमंत्री भी नहीं।' उनके लिए सत्य श्रद्धा का विषय था, सुविधा का नहीं। उन्होंने शायद ही कभी अपने सिद्धांतों को परिस्थितियों की आवश्यकताओं के अधीन होने दिया। कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी वे अपनी मान्यताओं पर अडिग रहे। जैसा कि उन्होंने स्वयं कहा था, 'व्यक्ति को जीवन में सत्य और श्रद्धा के अनुसार कार्य करना चाहिए।'देसाई को एक शांति कार्यकर्ता के रूप में जाना जाता था और उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच शांति स्थापित करने के निरंतर प्रयास किए। 1974 में भारत के पहले परमाणु परीक्षण के बाद, देसाईने चीन और पाकिस्तान के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों को बहाल करने में मदद की और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध जैसे सशस्त्र संघर्षों को टालने की प्रतिज्ञा ली।देसाई एक सच्चे गांधीवादी अनुयायी, सामाजिक कार्यकर्ता, संस्था निर्माता और महान सुधारक थे। वे गुजरात विद्यापीठ के कुलाधिपति (Chancellor) थे। प्रधानमंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान भी वे हर अक्टूबर में विद्यापीठ का दौरा करते थे। वे अत्यंत सादगी से रहते थे और प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए भी स्वयं पोस्टकार्ड लिखा करते थे। सरदार पटेल ने उन्हें खेड़ा (कैरा) जिले में किसानों की सभाएं करने के लिए नियुक्त किया था, जिसके फलस्वरूप अंततः अमूल (Amul) सहकारी आंदोलन की स्थापना हुई। उनके शासनकाल के दौरान, उन्होंने सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सरकारी हस्तक्षेप को कम किया, जिससे बाजार में सस्ती चीनी और तेल उपलब्ध हुआ और राशन की दुकानों की निर्भरता लगभग समाप्त हो गई।स्व.मोरारजी देसाई का जीवन अनुशासन, सिद्धांतों और कुछ अत्यंत अनोखे किस्सों से भरा था। उनके जीवन के कुछ दिलचस्प प्रसंग इस प्रकार हैंप्रथम 'सत्याग्रह' और नेतृत्व: स्कूल के समय में एक शिक्षक ने अपने प्रिय विद्यार्थी की परीक्षा में मदद की थी। इस अन्याय के खिलाफ कम उम्र के मोरारजी ने आवाज उठाई और पूरी कक्षा के साथ बाहर निकल गए। शिक्षक द्वारा अपनी गलती स्वीकार करने के बाद ही वे वापस लौटे थे।क्रिकेट का शौक: बहुत कम लोग जानते हैं कि मोरारजीभाई को क्रिकेट में बहुत रुचि थी। अपने कॉलेज के दिनों में मुंबई में होनेवाले मैचों को देखने के लिए वे अक्सर चौकीदारों की नजर बचाकर स्टेडियम में घुस जाते थे।हर चार साल में जन्मदिन: उनका जन्म 29 फरवरी, 1896 (लीप वर्ष) को हुआ था। इस कारण कैलेंडर के अनुसार उनका जन्मदिन हर चार साल में एक ही बार आता था। हालांकि, वे स्वयं अपना जन्मदिन हर साल हिंदू कैलेंडर के अनुसार धुलेंडी (फाल्गुन शुक्ल प्रतिपदा) के दिन मनाते थे।डिप्टी कलेक्टर पद से इस्तीफा: राजनीति में आने से पहले वे ब्रिटिश शासन में डिप्टी कलेक्टर थे। 1930 में जब गांधीजी ने स्वतंत्रता संग्राम शुरू किया, तब उन्होंने देश की आजादी को परिवार से अधिक महत्व देते हुए अपनी आरामदायक सरकारी नौकरी छोड़ दी थी।विमान दुर्घटना में बचाव: 1977 में प्रधानमंत्री के रूप में असम की यात्रा के दौरान उनका विमान दुर्घटनाग्रस्त (Crash) हो गया था। इस हादसे में पांच क्रू मेंबर्स की मौत हो गई थी, लेकिन मोरारजीभाई चमत्कारिक रूप से बच गए थे।एक बार जवाहरलाल नेहरू के एक मंत्री एमु.मथाई अपने दोस्तों के साथ कुतुब मीनार घूमने गए थे। वहां उनके दोस्तों ने मथाई से एक दिलचस्प सवाल पूछा, 'यह मोरारजी देसाई किस तरह के व्यक्ति हैं?' मथाई का जवाब भी उतना ही हैरान करने वाला था। उन्होंने कहा, 'वह लोहे का खंभा देख रहे हो? बस उसे गांधी टोपी पहना दो, आपके सामने मोरारजी देसाई हाजिर हो जाएंगे।' उनके कहने का तात्पर्य यह था कि स्वर्गीय मोरारजी देसाई राष्ट्र और जनता के हित में इतने अडिग थे कि उनका व्यक्तित्व उस लौह स्तंभ की तरह मजबूत था, जिसे कोई हिला नहीं सकता था। यह सुनकर उनके सभी दोस्त स्तब्ध रह गए।पंडित जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद, प्रसिद्ध पत्रकार कुलदीप नैयर मोरारजी देसाई से मिले और उन्हें लाल बहादुर शास्त्री का संदेश दिया। शास्त्री जी का संदेश था कि 'यदि आप जयप्रकाश नारायण या इंदिरा गांधी दोनों में से किसी एक नाम पर सहमत हो जाएं, तो मैं प्रधानमंत्री पद का चुनाव नहीं लड़ूंगा।' जब नैयर ने मोरारजी को यह संदेश सुनाया, तो उन्होंने तुरंत कहा कि 'जयप्रकाश नारायण एक भ्रमित व्यक्ति हैं।' मोरारजी देसाई के पुत्र कांति देसाईने भी नैयर से कह दिया, 'अपने शास्त्रीजी से कह देना कि वे पीछे हट जाएं, वे मोरारजी देसाई को हरा नहीं पाएंगे।मोरारजी देसाई शराबबंदी के प्रबल समर्थक थे। 1978 में जब उन्होंने फ्रांस की यात्रा की, तब वे भारतीय राजदूत आर.डी. साठे के घर रुके थे। भारतीय खुफिया एजेंसी RAW के पूर्व अधिकारी बी. रमन ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि 'मोरारजी देसाई जैसा राष्ट्रहित के प्रति समर्पित व्यक्तित्व मैंने अपने जीवन में कहीं नहीं देखा।1968 में जब वे वित्त मंत्री थे और एक सम्मेलन में भाग लेने कनाडा गए थे, तब भी एक दिलचस्प किस्सा हुआ था। उनके साथ अर्थशास्त्री लक्ष्मीकांत झा भी थे, जिनसे उनकी अच्छी बनती थी। उस समय कनाडा में भारत के उच्चायुक्त (High Commissioner) ICS अधिकारी वेंकटाचार्य थे। जॉर्ज वर्गीसने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि एक दिन काम जल्दी खत्म हो जाने पर लक्ष्मीकांत झा और वेंकटाचार्य ने मोरारजीभाई देसाई को नाइट क्लब ले जाने की कोशिश की। दोनों ने देसाई से कहा कि 'आप जिस चीज का विरोध करते हैं, उसे एक बार अपनी आंखों से देख तो लीजिए।' अंततः वे तीनों उस नाइट क्लब में गए, लेकिन गांधीवादी विचारधारावाले देसाई वहां से तुरंत बाहर निकल गए।स्वर्गीय मोरारजीभाई देसाई भारतीय राजनीति के इतिहास में 81 वर्ष की आयु में प्रधानमंत्री पद संभालनेवाले सबसे उम्रदराज व्यक्ति थे। वे प्रधानमंत्री बननेवाले पहले पूर्व उप-प्रधानमंत्री भी थे।स्वर्गीय मोरारजी देसाई अपने व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन में भले ही चर्चाओं और विवादों में रहे हों, फिर भी उन्हें भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से नवाजा गया है। साथ ही, 19 मई, 1990 को उन्हें पाकिस्तान के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार 'निशान-ए-पाकिस्तान' से भी सम्मानित किया गया। इस प्रकार, वे ये दोनों सर्वोच्च सम्मान पानेवाले पहले भारतीय हैं। उनकी ईमानदारी और संयम को कई लोग पसंद करते थे, हालांकि कई लोगों की नजर में वे एक ऐसे रूढ़िवादी व्यक्ति थे जिनके राजनीतिक जीवन में लचीलापन कम था।आज भी मात्र दो रुपये और बीस पैसे में चीनी तथा सस्ते दाम पर राशन उपलब्ध करानेवाले देश के एकमात्र प्रधानमंत्री के रूप में लोग मोरारजी देसाई को कभी नहीं भूल पाएंगे। इसके अलावा, कट्टर सिद्धांतवादी और फलाहार जैसे प्राकृतिक उपचारों के माध्यम से स्वस्थ शरीर बनाए रखनेवाले मोरारजीभाई को लोग आज भी याद करते हैं।राजनीतिक संन्यास के बाद, मोरारजीभाईने मुंबई में अपने परिवार के साथ जीवन व्यतीत किया। अक्टूबर 1987 तक (92 वर्ष की आयु तक), उन्होंने गुजरात विद्यापीठ के दीक्षांत समारोह में भाग लेने का अपना क्रम जारी रखा। 10 अप्रैल, 1995 को मस्तिष्क में रक्त का थक्का (Blood Clot) जमने के कारण मुंबई में उनका निधन हो गया। 12 अप्रैल की शाम को गुजरात के अहमदाबाद में साबरमती आश्रम के पास स्थित गौशाला की भूमि पर पूर्ण राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया। गुजरात के अहमदाबाद में यह स्थल आज 'अभय घाट' के नाम से जाना जाता है।