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    AAP में मचे सियासी भूचाल पर Kumar Vishwas ने किया जोरदार कटाक्ष, Anna Hazare भी बोले- ये तो होना ही था

    3 hours from now

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    अप्रैल का महीना आम आदमी पार्टी के लिए गहरे सियासी संकट का प्रतीक बन गया है। पार्टी के प्रमुख नेता अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व पर सवाल उस समय और तेज हो गए जब उनके सबसे भरोसेमंद माने जाने वाले राघव चड्ढा ने पंद्रह वर्ष पुराने संबंध तोड़कर भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया। वैसे यह घटना अकेली नहीं है, बल्कि उन नेताओं की लंबी श्रृंखला का हिस्सा है जो समय समय पर मतभेदों के कारण पार्टी से अलग होते गए। किरण बेदी ने पार्टी की कार्यशैली से असहमति जताते हुए पहले ही दूरी बना ली थी। प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव जैसे संस्थापक सदस्यों ने आंतरिक लोकतंत्र और व्यक्ति पूजा पर सवाल उठाए, जिसके बाद उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया गया। कुमार विश्वास, जो कभी पार्टी की पहचान माने जाते थे, राज्यसभा टिकट और वैचारिक मतभेदों के कारण धीरे धीरे अलग हो गए। इसी तरह शाजिया इल्मी, कपिल मिश्रा, अल्का लांबा, आशुतोष और आशीष खेतान जैसे कई चेहरे भी समय के साथ पार्टी से दूर हो गए।इन घटनाओं की कड़ी में सबसे बड़ा झटका तब लगा जब चौबीस अप्रैल को सात राज्यसभा सदस्यों ने एक साथ पार्टी छोड़ दी। यह स्थिति पार्टी के अस्तित्व पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है और संकेत देती है कि अंदरूनी असंतोष लंबे समय से पनप रहा था।इसे भी पढ़ें: AAP में 'बगावत' पर Anna Hazare का तंज, 'पार्टी सही होती तो Raghav Chadha नहीं छोड़ते'इसी बीच, कुमार विश्वास का एक वीडियो सियासी गलियारों में चर्चा का केंद्र बन गया। उन्होंने अपनी प्रस्तुति में रामधारी सिंह दिनकर की काव्य रचना के प्रसंग का उपयोग करते हुए परोक्ष रूप से पार्टी नेतृत्व पर प्रहार किया। “अभी ही शत्रु का संहार कर दे” जैसी पंक्तियों के माध्यम से उन्होंने यह संकेत दिया कि यह समय निर्णायक है और जो घटनाएं घट रही हैं वे पूर्व कर्मों का परिणाम हैं। उनके इस काव्य पाठ को कई लोग राजनीतिक संदेश के रूप में देख रहे हैं। हम आपको बता दें कि कुमार विश्वास लंबे समय से केजरीवाल पर तानाशाही और साथियों के साथ विश्वासघात के आरोप लगाते रहे हैं। उनके अनुसार जब नेतृत्व अहंकारी हो जाता है तो समय स्वयं उसके पतन का मार्ग तैयार करता है। कुमार विश्वास के कथनों में धर्म और अधर्म के द्वंद्व का उल्लेख भी महत्वपूर्ण है। उन्होंने संकेत दिया कि जब सिद्धांतों से समझौता होता है तो संगठन कमजोर हो जाता है और उसके अपने ही लोग उससे दूरी बना लेते हैं। इस दृष्टिकोण ने पूरे घटनाक्रम को वैचारिक बहस का रूप दे दिया है।दूसरी ओर, सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने भी इस घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने स्पष्ट कहा कि यदि पार्टी सही मार्ग पर चलती तो राघव चड्ढा और अन्य नेता उसे छोड़कर नहीं जाते। हजारे के अनुसार लोकतंत्र में हर व्यक्ति को अपनी राय रखने का अधिकार है, लेकिन इतने बड़े पैमाने पर नेताओं का जाना यह दर्शाता है कि भीतर कुछ गंभीर समस्याएं रही होंगी। उन्होंने इसे नेतृत्व की गलती बताते हुए कहा कि यदि संगठन ने सही दिशा अपनाई होती तो यह स्थिति उत्पन्न नहीं होती।
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