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    यूपी सरकार के 4 वर्ष पूरे, चुनावी साल शुरू:जनवरी, 2027 में लगेगी आचार संहिता, मार्च में तय होगा किसकी सरकार बनेगी

    1 hour ago

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    यूपी में चुनावी साल शुरू हो चुका है। योगी सरकार दूसरे कार्यकाल के 4 साल पूरे कर चुकी है। पिछले चुनाव के ट्रेंड बताते हैं कि 2027 विधानसभा चुनाव के लिए जनवरी में आचार संहिता लागू हो जाएगी। विधानसभा चुनाव की वोटिंग 7 चरण में हो सकती है। अगले साल मार्च के दूसरे सप्ताह तक क्लियर हो जाएगा कि यूपी में BJP जीत की हैट्रिक लगाएगी या सत्ता बदलेगी। भाजपा की योगी सरकार का कार्यकाल 22 मई, 2027 तक है। इससे पहले चुनाव कराने होंगे। भाजपा की चुनाव को लेकर क्या रणनीति है? चुनावी साल के चैलेंज से कैसे निपटेगी? सपा, बसपा और कांग्रेस के सामने क्या चुनौतियां हैं? इस रिपोर्ट में पढ़ते हैं… 2022 चुनाव- BJP को 52 सीट का नुकसान हुआ था विधानसभा चुनाव 2022 के बाद भाजपा और सहयोगी दलों के 273 विधायक जीते थे। भाजपा का वोट शेयर 41% रहा था। 2017 में BJP ने 325 सीटें जीती थीं। इस हिसाब से 2022 के चुनाव में उसको 52 सीटों का नुकसान हुआ था। वहीं, विपक्ष में सपा पहले से मजबूत हो गई थी। 32% वोट शेयर के साथ सपा के विधायक 47 से बढ़कर 111 हो गए थे। बसपा को 12.88% वोट तो मिले, लेकिन विधानसभा में सिर्फ 1 विधायक पहुंच सका था। कांग्रेस के सिर्फ 2 विधायक जीते थे। पूरी गणित में छोटी पार्टियों ने मिलकर भाजपा सरकार को स्थिरता दिलाने में अहम भूमिका अदा की। किंगमेकर रोल में अपना दल (एस) और निषाद पार्टी दिखे। अपना दल (एस) के 12 विधायक, जबकि निषाद पार्टी के 6 विधायक जीते थे। 2027 चुनाव- डेवलपमेंट के साथ हिंदुत्व कार्ड खेलेगी BJP भाजपा के एक पदाधिकारी बताते हैं- SIR की आखिरी वोटर लिस्ट जारी होने के बाद पार्टी चुनावी तैयारियों में जुट जाएगी। 15 हजार से ज्यादा नए बूथों पर कमेटियां बनाई जाएंगी। एक छोर पर सीएम योगी विकास और हिंदुत्व के जरिए माहौल बनाएंगे। दूसरे छोर पर भाजपा संगठन बूथ से लेकर प्रदेश तक चुनावी तैयारियां करेगी। अगड़ों की नाराजगी दूर करने का चैलेंज अब बात यूपी उपचुनाव के फेरबदल की सपा के गढ़ जीती, लेकिन घोसी हार गई सपा घटी, भाजपा बढ़ी उपचुनाव में मिली जीत के बूते विधानसभा में भाजपा के विधायक 255 से बढ़कर 257 हो गए। भाजपा के सहयोगी अपना दल के विधायकों की संख्या 12 से बढ़कर 13 हो गई। रालोद की 8 से बढ़कर 9 हो गई। अभी फरीदपुर से भाजपा विधायक का निधन होने के कारण एक सीट खाली है। वहीं, सपा के 111 विधायक से घटकर 102 रह गए हैं। सपा के 3 विधायकों ने बगावत कर दी है। घोसी और दुद्धी में सपा विधायक के निधन से सीट खाली है। एक्सपर्ट बोले- योगी ने लॉ एंड ऑर्डर में माइलस्टोन सेट किए सीनियर जर्नलिस्ट वीरेंद्रनाथ भट्‌ट कहते हैं- 2017 से पहले कल्याण सिंह, राजनाथ सिंह और रामप्रकाश गुप्ता की सरकारें रहीं। लेकिन, वो इतनी मजबूत स्थिति में नहीं रहे कि कुछ बड़ा कर पाते। योगी सरकार ने लॉ एंड ऑर्डर पर माइलस्टोन सेट किए हैं। पॉलिटिकल अस्थिरता को दूर कर दिया। इसके बावजूद 2027 में BJP को जाति आधारित राजनीति से लड़ना होगा। योगी ने यूपी की सियासत में बिजली, गन्ना, किसान और कृषि का मुद्दा खत्म कर दिया। वो विकास और विरासत को साथ लेकर चल रहे हैं। मसलन एक एक छोर पर जेवर एयरपोर्ट और गंगा एक्सप्रेस-वे बनकर तैयार हैं, वहीं अयोध्या में राममंदिर का निर्माण पूरा हो गया है। 5 मौके, जब सरकार मुश्किल में आई पीडीए को धार देने में जुटी है सपा सपा ने 2024 में पीडीए को धरातल पर उतारकर लोकसभा में भाजपा गठबंधन को पीछे ढकेल दिया। लोकसभा चुनाव में सपा-कांग्रेस गठबंधन ने 43 सीटों पर जीत दर्ज की थी। अगर इसको विधानसभा सीटों के हिसाब से देखें तो इंडिया गठबंधन को 217 विधानसभा सीटों पर बढ़त मिली थी। इसमें सपा को 178 और कांग्रेस को 39 विधानसभा सीटों पर बढ़त मिली थी। वहीं, एनडीए गठबंधन सिर्फ 180 सीटों पर ही बढ़त ले पाया था। सपा ने पिछड़ों में कुर्मी और निषाद वोटबैंक में बड़ी सेंध लगाई थी। मौजूदा वक्त में सपा के पास यादव के अलावा मुस्लिम, दलित, कुर्मी जाति से जुड़े कई कद्दावर नेता अलग-अलग जिलों में हैं। सपा इसी पीडीए को धार देने में जुटी है। चैलेंज- सपा के साथ कांग्रेस के अलावा कोई मजबूत दल नहीं पीडीए के नारे पर आगे बढ़ चुकी सपा से अगड़े वोटबैंक पूरी तरह से कट चुके हैं। नेता प्रतिपक्ष माता प्रसाद पांडे को छोड़ दें, तो उसके पास कोई अगड़ा बड़ा चेहरा तक नहीं है। वहीं, भाजपा ने कुर्मी पंकज चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष की कमान सौंपकर उसके इस अति पिछड़े वोटबैंक में सेंध लगा दी है। उधर, बसपा ने 9 अक्टूबर, 2025 को लखनऊ में कांशीराम पुण्यतिथि पर बड़ा जमावड़ा कर दलितों को एक बार फिर संदेश दे दिया था कि उनका हित कहां सुरक्षित है। सपा के पास कांग्रेस को छोड़कर एक भी मजबूत क्षेत्रीय दल नहीं है। बसपा ने लाखों की भीड़ जुटाकर जोश भरा बसपा को 2022 के विधानसभा में 13% वोट मिले थे। 2024 के लोकसभा में यह घटकर 10% से भी नीचे चला गया। मायावती ने भतीजे आकाश का कद बढ़ाकर एक बार फिर पार्टी को मजबूत करने की कोशिश की है। पहली बार खुद मुस्लिम भाईचारा कमेटी की बैठक ली। अर्से बाद 9 अक्टूबर, 2025 को कांशीराम की पुण्यतिथि पर लखनऊ में लाखों की भीड़ जुटाकर कार्यकर्ताओं में जोश भर चुकी हैं। बसपा ने पुराने स्टाइल में विधानसभा के 4 प्रत्याशी भी तय कर दिए हैं। जून तक पार्टी 100 से अधिक विधानसभा प्रत्याशियों के नाम तय करने की तैयारी में है। मायावती एक बार फिर दलित, ब्राह्मण, मुस्लिम और अति पिछड़ों का गठजोड़ खड़ा करने में जुटी हैं। चैलेंज- ओबीसी, मुस्लिम या सवर्ण का बड़ा चेहरा नहीं बसपा में प्रदेश अध्यक्ष विश्वनाथ पाल को छोड़ दें तो कोई बड़ा ओबीसी, मुस्लिम या सवर्ण चेहरा नहीं है। दलितों में भी पासी, कोरी, धोबी, वाल्मीकि पर उसकी पकड़ कमजोर हो चुकी है। पश्चिम में जहां पार्टी का मजबूत आधार हुआ करता था, वहां चंद्रशेखर की आजाद समाज पार्टी कोर जाटव वोटबैंक में सेंध लगा चुकी है। मायावती खुद बहुत सक्रिय नहीं हैं। वे बैठकों में तो शामिल होती हैं, लेकिन उनकी फील्ड की गतिविधियां पूरी तरह से बंद हैं। धरातल पर संघर्ष करती दिख रही कांग्रेस, लेकिन संगठन ही नहीं कांग्रेस को 2024 में सपा से गठबंधन के बाद यूपी में बड़ी संजीवनी मिली। जिस पार्टी के पास विधानसभा में सिर्फ 2 विधायक हैं, उसने लोकसभा में अपनी सीटों को तीन गुना बढ़ा लिया। 39 विधानसभा सीटों पर उसने बढ़त हासिल की थी। प्रदेश अध्यक्ष अजय राय राज्य में होने वाली हर छोटी घटना पर पीड़ित परिवार के साथ खड़े दिखते हैं। कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी है कि उसके पास संगठन ही नहीं है। बूथ स्तर तक उसके पास कार्यकर्ता ही नहीं हैं। किसी भी घटना पर कांग्रेस सक्रियता तो दिखाती है, लेकिन कार्यकर्ता न होने से उसे बड़े आंदोलन में तब्दील नहीं कर पा रही। इस वजह से आम वोटरों का भरोसा नहीं जीत पा रही। सपा के साथ गठबंधन में एक बड़ा फायदा ये होगा कि मुस्लिम वोटर कहीं बटेंगे नहीं। क्षेत्रिय दल रैली-सभा से दिखा रहे ताकत यूपी में वर्तमान में अपना दल (एस), आरएलडी, सुभासपा और निषाद पार्टी नाम से चार मजबूत क्षेत्रीय दल हैं। इसमें से निषाद और सुभासपा का जहां पूर्वांचल में दबदबा है। वहीं, आरएलडी की पश्चिम में मजबूत पकड़ है। अपना दल (एस) का जरूर पूर्वांचल, मध्य, बुंदेलखंड और रुहेलखंड में जनाधार है। चारों क्षेत्रीय दलों के पास मौजूदा समय में 33 विधायक हैं। सुभासपा और निषाद पार्टी लगातार रैली-सभा के जरिए जनाधार बढ़ाने में जुटी हैं। अपना दल (एस) खामोशी से अपने कुर्मी वोटबैंक के सहारे मजबूती से डटी है। इन दलों की कोशिश ताकत दिखाकर भाजपा से अधिक से अधिक सीट हासिल करने की है। ---------------------------- यह खबर भी पढ़ें - जया प्रदा विधानसभा चुनाव लड़ेंगी या संगठन में दिखेंगी, भाजपा के 2 बड़े चेहरों से मिलीं, प्रदेश अध्यक्ष से लंबी बात, अपर्णा के गले लगीं जया प्रदा 22 मार्च को लखनऊ में थीं। सिर्फ 6 घंटे के दरम्यान उन्होंने भाजपा के 2 बड़े चेहरों से मुलाकात की। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी और मुलायम सिंह यादव की छोटी बहू अपर्णा यादव से मुलाकात की फोटो शेयर कीं। आखिरी बार मार्च, 2024 में रामपुर में जया प्रदा MP-MLA कोर्ट में पेशी के दौरान दिखी थीं। लंबे अंतराल के बाद वह अचानक सियासी चेहरों के बीच दिखीं तो कयास लगाए जाने लगे कि क्या एक बार फिर यूपी की सियासत में सक्रिय होंगी? पढ़िए पूरी खबर…
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