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    Vishwakhabram: 4 साल से लड़ रहे Russia-Ukraine ने भी किया संघर्षविराम का ऐलान, Putin की 'दरियादिली' देख Zelensky हैरान!

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    भले यह अस्थायी संघर्षविराम हो, मगर एक ओर ईरान-अमेरिका-इजराइल टकराव में आई अस्थायी शांति और दूसरी ओर रूस तथा यूक्रेन के बीच घोषित बत्तीस घंटे का संघर्षविराम दुनिया के लिए कुछ पलों का सुकून लेकर आया है। हम आपको बता दें कि रूस और यूक्रेन के बीच यह युद्धविराम शनिवार शाम चार बजे से शुरू होकर रविवार रात तक प्रभावी रहेगा। क्रेमलिन ने साफ तौर पर अपने रक्षा मंत्री आंद्रेई बेलोसोव के माध्यम से सेना प्रमुख वालेरी गेरासिमोव को आदेश दिया है कि सभी दिशाओं में सैन्य कार्रवाई रोक दी जाए। लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया गया है कि किसी भी उकसावे या आक्रामक कदम का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए सैनिक पूरी तरह तैयार रहेंगे। यानी यह शांति उतनी ही नाजुक है जितनी बारूद के ढेर पर रखी एक चिंगारी।हम आपको याद दिला दें कि पिछले साल भी इसी तरह का तीस घंटे का संघर्षविराम देखा गया था, जो आरोप प्रत्यारोप के बीच दम तोड़ गया था। दोनों पक्षों ने एक दूसरे पर उल्लंघन के आरोप लगाए थे और भरोसे की खाई और गहरी हो गई थी। इस बार भी हालात ज्यादा अलग नहीं हैं क्योंकि चार साल से चल रहे इस युद्ध ने दोनों देशों के बीच विश्वास को लगभग खत्म कर दिया है।उधर, जेलेंस्की ने इस संघर्षविराम को मानवीय जरूरत बताते हुए कहा कि लोग बिना डर के ईस्टर मना सकें, इसलिए यह जरूरी है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि अगर रूस इस मौके को स्थायी शांति की दिशा में बदलता है, तो यह एक निर्णायक मोड़ हो सकता है। लेकिन उनके शब्दों में छिपा संशय भी साफ नजर आता है, क्योंकि इससे पहले भी उनके कई प्रस्तावों को रूस ने नजरअंदाज किया है।इस पूरे घटनाक्रम का एक बेहद अहम पहलू यह है कि यह ऐसे समय में सामने आया है जब अमेरिका की अगुवाई में चल रही शांति प्रक्रिया ठहराव का शिकार हो चुकी है। हालांकि रूस के विशेष दूत किरिल दिमित्रियेव का अमेरिका दौरा इस कहानी को एक नया मोड़ भी देता है। वहां वह अमेरिकी प्रशासन के अधिकारियों के साथ शांति समझौते और आर्थिक सहयोग पर चर्चा कर रहे हैं। यानि एक तरफ युद्ध के मैदान में गोलियां चल रही हैं, तो दूसरी तरफ बंद कमरों में कूटनीति की चालें भी उतनी ही तेजी से चल रही हैं।सामरिक नजरिए से देखें तो यह संघर्षविराम रूस के लिए कई स्तरों पर फायदेमंद हो सकता है। इससे उसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर खुद को जिम्मेदार और संयमित शक्ति के रूप में पेश करने का मौका मिलता है। साथ ही यह उसकी सेना को सांस लेने, पुनर्गठन करने और संसाधनों को मजबूत करने का समय देता है। इसके अलावा यह यूक्रेन की सैन्य तैयारी और प्रतिक्रिया को परखने का भी एक अवसर है। वैसे यह माना जा रहा है कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का यह कदम सिर्फ धार्मिक अवसर यानि ईस्टर पर लिया गया निर्णय नहीं, बल्कि एक बेहद सोची समझी रणनीतिक चाल है।वहीं यूक्रेन के लिए यह स्थिति बेहद पेचीदा है। अगर वह संघर्षविराम का पूरी तरह पालन करता है, तो वह नैतिक बढ़त हासिल करता है और अंतरराष्ट्रीय समर्थन मजबूत करता है। लेकिन अगर रूस इस दौरान अपनी स्थिति मजबूत करता है, तो यह यूक्रेन के लिए रणनीतिक नुकसान भी बन सकता है।हम आपको याद दिला दें कि जेलेंस्की ने पहले भी कई बार युद्ध रोकने की अपील की थी, खासकर ऊर्जा ढांचे पर हमले रोकने का प्रस्ताव दिया था। उन्होंने यह प्रस्ताव अमेरिका के माध्यम से भी रखा था, लेकिन रूस ने हर बार इसे ठुकराते हुए दीर्घकालिक समाधान की बात कही। अब जब रूस खुद संघर्षविराम की घोषणा करता है, तो यह सवाल फिर खड़ा हो जाता है कि क्या यह वास्तव में शांति की इच्छा है या एक और रणनीतिक दांव है?वैश्विक स्तर पर भी इसका असर गहरा है। मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और ईरान से जुड़ी गतिविधियों के बीच यह घटनाक्रम शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकता है। दुनिया की बड़ी ताकतें इस पर नजर गड़ाए हुए हैं कि क्या यह छोटा-सा विराम किसी बड़े समझौते का रास्ता खोलेगा या फिर यह भी इतिहास के पन्नों में एक असफल कोशिश बनकर रह जाएगा?बहरहाल, स्पष्ट है कि यह बत्तीस घंटे का संघर्षविराम सिर्फ एक समय सीमा नहीं, बल्कि रणनीति, मनोविज्ञान और वैश्विक राजनीति का एक जटिल खेल है। बंदूकें भले कुछ देर के लिए शांत हों, लेकिन असली जंग अब भी जारी है। सवाल अब भी वही है जो पूरी दुनिया को बेचैन कर रहा है कि क्या यह शांति की शुरुआत है या तूफान से पहले की खामोशी?
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