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    संत मलूक दास की 452वीं जयंती मनाई जाएगी:कौशांबी के कड़ा धाम में अनुयायी करेंगे विशेष आयोजन

    2 hours ago

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    संत मलूक दास का जन्म वर्ष 1574 में उत्तर प्रदेश के कौशांबी जिले के कड़ा धाम में कक्कड़ खत्री अरोड़ा परिवार में हुआ था। कड़ा में आज भी संत मलूक दास की गद्दी, गुफा और साधना केंद्र मौजूद है। यहां उनकी समाधि भी बनी हुई है। उनकी समाधि के बगल में फतेह खां की भी समाधि है। फतेह खां संत मलूक दास से प्रभावित होकर शाही दरबार छोड़कर उनकी सेवा में लग गए थे। आज भी मलूक दास की समाधि पर फूल चढ़ाने वाले लोग फतेह खां को भी याद करते हैं। बचपन से ही संत मलूक दास उदार और कोमल हृदय के थे तथा ईश्वर भक्ति में लीन रहते थे। प्रारंभ में वे सांसारिक कार्यों में संलग्न थे, लेकिन बाद में वैराग्य की ओर मुड़ गए और मुरारी स्वामी से दीक्षा ली। उन्होंने अजगर और पंछियों के उदाहरण से ईश्वर की सर्वव्यापकता समझाई कि ईश्वर ही सबका पालनहार है। उनका यह दोहा "अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम, दास मलूका कह गए, सबके दाता राम।" पूरे विश्व में उनकी पहचान बन गया है। मलूक दास आश्रम के वर्तमान 15वें उत्तराधिकारी शिवाकांत पांडेय ने बताया कि संत मलूक दास ने औरंगजेब के सामने चमत्कार दिखाए थे। इससे औरंगजेब भी उनका भक्त बन गया था और दोनों के बीच आपसी सम्मान का संबंध स्थापित हो गया था। संत मलूक दास की जयंती हर वर्ष वैशाख माह में मनाई जाती है। इस अवसर पर उनके परिवार के सदस्य, जो लखनऊ, दिल्ली और महाराष्ट्र में रहते हैं, आश्रम आते हैं। यहां पूजा-अर्चना की जाती है और एक विशाल भंडारे का आयोजन होता है, जिसमें देश भर से उनके अनुयायी शामिल होते हैं।
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