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    समिट बिल्डिंग में नीचे पुलिस चौकी, ऊपर फर्जी कॉल सेंटर:LIU को भी 7 माह तक नहीं लगी भनक, हवाला के जरिए भारत आता था पैसा

    11 hours ago

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    लखनऊ के विभूति खंड स्थित समिट बिल्डिंग में 7 माह से इंटरनेशनल ठगी का कॉल सेंटर चल रहा था। बिल्डिंग के नीचे स्थित समिट बिल्डिंग पुलिस चौकी में तैनात पुलिसकर्मियों को इसकी भनक तक नहीं लगी। लोकल इंटलीजेंस यूनिट को भी इसकी जानकारी नहीं हुई। 1 जुलाई की देर रात साइबर सेल और क्राइम ब्रांच ने इस फर्जी कॉल सेंटर का भंडाफोड़ किया। मौके से 27 युवतियों समेत 119 आरोपी गिरफ्तार किए गए। आरोपी अमेरिकी नागरिक को गोल्ड व गिफ्ट वाउचर देने का झांसा देकर ठगी करते थे। इससे स्थानीय पुलिस और एलआईयू की कार्यशैली पर सवाल खड़ा हो रहा है। अब घटना पढ़ लें… समिट बिल्डिंग की 11वीं मंजिल पर दो ऑफिस लेकर Solaris Solution नाम से ऑफिस चलता था। जिसमें बैठे कर्मचारी शाम 7 से रात 3 बजे तक एक्टिव रहते थे। इस दौरान वो अमेरिकी लोगों को कॉल करते थे। अलग-अलग तरीके से झांसे में लेकर मदद व रिफंड के बहाने उनको गिफ्ट वाउचर देकर उसे रिडीम करा लेते थे। जिन रुपयों को हवाला के जरिए भारत मंगाते थे। भारत में बैठे ऑपरेशन मैनेजर ललित खैराजानी और विक्रम सिंह परमार उन रुपयों से कर्मचारियों को कैश में सैलरी देते थे। पुलिस चौकी नीचे, ऊपर चलता था अंतराष्ट्रीय गिरोह जिस समिट बिल्डिंग में ऑफिस लेकर पूरा नेटवर्क चल रहा था। उसी बिल्डिंग से सटी पुलिस चौकी है। जिसमें बैठे जिम्मेदारों ने सुध तक नहीं ली। पिछली सात महीने से अमेरिका में बैठा सरगना लखनऊ से पूरे नेटवर्क को चलवा रहा था। इसके साथ ही एलआईयू (लोकल इंटेलीजेंस यूनिट) का भी पूरे मामले में फेल नजर आई। जबकि एलआईयू का काम ही लोकल स्तर पर चल रही अवैध गतिविधियों पर नजर रखना है। लेकिन पुलिस की नाक के नीचे ठगी का गिरोह चलता रहा और किसी को भनक नहीं लगी। पूरे मामले में लोकल थाने और चौकी की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए क्या सही में कोई जानकारी नहीं थी। बिना रजिस्ट्रेशन चल रहा था कॉल सेंटर शहर के पॉश इलाके में बिना रजिस्ट्रेशन और कर्मचारियों के सत्यापन के ठगी का कॉल सेंटर समिट बिल्डिंग चल रहा था। यहां के कर्मचारी भी शहर के विभिन्न पॉश इलाकों में किराए पर रह रहे थे। ब्रोकर ने बिना किसी एग्रीमेंट के इमारत में 11वें तल पर ठगी का काल सेंटर चलाने के लिए प्रोग्राम मैनेजर को जगह दिलवाई थी। पूरे मामले में विभूतिखंड थाना पुलिस की बड़ी लापरवाही उजागर हुई है। पुलिस को कॉल सेंटर में किसी नाम का बोर्ड अथवा सत्यापन के दस्तावेज नहीं मिले हैं। पुलिस को सिर्फ सॉलेरियस सल्यूशन नाम के कुछ दस्तावेज मिले हैं। मामले की विवेचना कर रही साइबर थाने की टीम अब बिंदु पर भी साक्ष्य संकलन कर रही है। पुलिस, इमारत और 11वें तल के मालिक व ब्रोकर प्रशांत की भूमिका की जांच कर रही है। अब पढ़िए कैसे बनाते शिकार… फर्जीवाड़ा करने के लिए तीन अलग-अलग लेयर्स में टीमों को बांटा गया था, जो बेहद शातिर तरीके से अमेरिकी नागरिकों को नामी कंपनियों और सरकारी एजेंसियों का अधिकारी बनकर अपने जाल में फंसाती थीं। सबसे पहले 'डायलर टीम' अमेरिकी नागरिकों से बात करती थी और उन्हें फ्रॉड मैसेजेस भेजकर डराती। डायलर टीम से बात होने के बाद इस कॉल को बैंकर टीम को फॉरवर्ड कर दिया जाता था। यह बैंकर टीम अमेरिकी नागरिकों को डराती थी कि उनका सोशल सिक्योरिटी नंबर (भारत के लिए आधार कार्ड) फ्रीज होने वाला है। इसके बाद डर चुके पीड़ित की कॉल को क्लोजर टीम को रेफर किया जाता था। यह टीम पीड़ित को झांसा देती थी कि वे इस बड़ी मुसीबत से कैसे बच सकते हैं। क्लोजर टीम उनसे कहती थी कि आपका अकाउंट सील होने वाला है, इसलिए उसमें जितना भी पैसा है उसे तुरंत निकाल लीजिए। इसके बाद पीड़ितों से गोल्ड व गिफ्ट वाउचर खरीदवाए जाते थे, जिन्हें बाद में यह शातिर गैंग रिडीम करा लेता था। इस पूरे फर्जीवाड़े के लिए इंटरनेट आधारित कॉलिंग प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल किया जाता। ठगी की रकम को कैश कराने के लिए यह गैंग गिफ्ट कार्ड और क्रिप्टोकरेंसी का इस्तेमाल करता, ताकि कोई इन्हें आसानी से ट्रैक न कर सके। अमेरिका में बैठी ऑफलाइन टीम इंडिया से पूरा नेटवर्क ऑनलाइन ठगी से जुड़ा हुआ था। वहीं अमेरिका में बैठी टीम गोल्ड व गिफ्ट वाइचर खरीदने वाले के घर पहुंच जाती। वहीं उनको कार्रवाई का डर दिखाकर सारे जारूरी दस्तावेज व वाउचर अपने कब्जे में ले लेते। कई बार लोग कम एमाउंट होने की वजह से और पुलिस कार्रवाई से बचने के लिए शिकायत नहीं करते थे। हवाला से जुड़े तार ठगी की इस रकम को ठिकाने लगाने के लिए सिर्फ गिफ्ट वाउचर ही नहीं, बल्कि क्रिप्टोकरेंसी का भी धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जाता था। इसके अलावा, यूपीएस (भारत में जैसे यूपीई काम करता है वैसे ही) माध्यम से डिजिटल पैसे को प्राप्त करके यह टीम उसे रिडीम करती थी और अंत में यह पूरा पैसा 'हवाला' के जरिए भारत आता था। अब सैलरी व अन्य चीजों के बारे में जानिए… रेड की सूचना मिलते ही एक कर्मचारी के घरवाले पहुंचे थे। उन्होंने कैमरे के सामने बोलने से मना किया, लेकिन बताया कि उनके लड़के ने 5 राउंड इंटरव्यू दिया था। ज्यादातर लड़के-लड़कियां 34 हजार से 40 हजार रुपए महीने की नौकरी पर रखे गए थे। लेकिन, अगर इनके जरिए किसी को ठग लिया गया, उस रकम का 10% इनसेंटिव मिलता था। हर कर्मचारी हर महीने 80 हजार से एक लाख रुपए तक कमा रहा था। इसके साथ ही काम करने वाले सभी कर्मचारियों को इसकी जानकारी थी कि वे लोग ठगी कर रहे हैं। सभी कर्मचारियों को सैलरी कैश में मिलती थी। इसके अलावा घर जाने का ट्रांसपोर्टेशन दिया जाता था। बिल्डिंग में किसी अन्य ऑफिस के कर्मचारियों से बात करने की अनुमति नहीं थी। इस साइबर ठगी से रोजाना 35 से 40 लाख की कमाई हो रही थी। --------------------- संबंधित खबर भी पढ़िए… लखनऊ की समिट बिल्डिंग में बैठकर 200 करोड़ की ठगी:देशभर की 27 लड़कियां पकड़ी गईं, 119 लोगों का स्टाफ; 3 करोड़ किराया लखनऊ में नॉर्थ-ईस्ट की लड़कियों वाला इंटरनेशनल कॉल सेंटर पकड़ा गया है। इस कॉल सेंटर की बिल्डिंग का किराया सभी खर्चों को मिलाकर करीब 3 करोड़ रुपए होता है। कॉल सेंटर में 5 राउंड इंटरव्यू के बाद सिलेक्शन होता था। पुलिस को जब भनक लगी कि यह कॉल सेंटर नहीं, बल्कि साइबर ठगी का अड्डा है तो यहां रेड मार दी। पूरी खबर पढ़ें
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