Search…

    Saved articles

    You have not yet added any article to your bookmarks!

    Browse articles

    GDPR Compliance

    We use cookies to ensure you get the best experience on our website. By continuing to use our site, you accept our use of cookies, Privacy Policies, and Terms of Service.

    Top trending News
    bharathunt
    bharathunt

    संडे जज्बात-कहां है भगवान? राधे-राधे करते मारे गए मेरे मम्मी-पापा:अगर भगवान के दर वृंदावन में नाव पलट जाती है, तो कौन जाएगा वहां?

    5 hours ago

    1

    0

    पहले मम्मी-पापा से बात करना कई बार टाल देता था, लेकिन अब वे बात करने के लिए इस दुनिया में ही नहीं रहे। मेरी सभी से गुजारिश है, अगर आप भी अपने मम्मी-पापा से बात करना टालते हैं, तो ऐसा न करें। मैं मोहित गुलाटी लुधियाना का रहने वाला हूं। जालंधर से आईटी की पढ़ाई पूरी करने के बाद पुणे की एक कंपनी में इंजीनियर हूं। जिंदगी पूरी रफ्तार से चल रही थी- वही रोज का काम, जिम्मेदारियां। लेकिन इस भाग-दौड़ के बीच मम्मी-पापा से बात होती रहती थी। कई बार काम के दबाव में उनका फोन नहीं उठा पाता था, तब अंदाजा नहीं था कि ये 'टालना' एक दिन उम्रभर का पछतावा बन जाएगा। वृंदावन में उस नाव हादसे ने मेरा सब कुछ छीन लिया। मेरे मम्मी-पापा भी उसी नाव पर सवार थे और उस हादसे ने उनकी जान ले ली। 10 अप्रैल को मैं ऑफिस में था… मेरे एक पड़ोसी ने फोन कर बताया कि- आपके मम्मी-पापा नहीं रहे। नाव हादसे में उनकी भी जान चली गई है। एक पल तो लगा यह सब झूठ है। इसी बीच, मेरी बहन दामिनी ने मुझे फोन किया। उसने रोते-रोते बताया- मम्मी-पापा नहीं रहे। मैंने तुरंत फोन काटा और अपने जीजा जी को फोन लगााया। कहा- ठीक से पता कर लीजिए, कोई गलतफहमी तो नहीं है। वो बोले- मरने वालों की लिस्ट में मम्मी-पापा का भी नाम है। इतना सुनते ही, मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई। दरअसल, उस हादसे में एक आंटी बच गई थीं, उन्होंने अपने बच्चों को फोन करके बताया। उसके बाद हादसे में मारे गए परिवारों को पता चला। मैं बदहवास ऑफिस से सीधे पुणे एयरपोर्ट पहुंचा। आंखों के सामने बार–बार मम्मी-पापा का चेहरा आ रहा था। लगा शरीर में जान ही नहीं है, अचानक एयरपोर्ट के अंदर गिर गया। एयरपोर्ट स्टाफ ने मुझे संभाला और पानी पिलाया। वहां से किसी तरह दिल्ली पहुंचा। वृंदावन जाना चाह रहा था, लेकिन पता लगा कि सभी शव दिल्ली लाए जा रहे हैं। वृंदावन के स्थानीय विधायक ने शवों को भेजने में बड़ी मदद की थी। जब मम्मी-पापा का शव दिल्ली आया तो बहुत रोया। उन्हें लेकर लुधियाना चल पड़ा। रास्तेभर मां की बातें, उनकी आवाज, उनकी हंसी याद आ रही थीं। सच कहूं तो, आज जब आपसे मम्मी-पापा की यादें साझा करने को तैयार हो रहा था, तो शब्द गले में अटक जा रहे थे। मुझमें हिम्मत नहीं थी कि आपसे बात करूं। मैंने अपनी बहन दामिनी से साफ कह दिया कि अकेले इंटरव्यू नहीं दे पाऊंगा। ‘बहन दामिनी ने जब कहा कि पत्रकार काफी दूर से आई हैं, तो मैंने खुद को संभाला। हमें लगा कि हमारी आपबीती के जरिए उन बच्चों तक एक संदेश पहुंचना चाहिए जो करियर की दौड़ में इतने मशरूफ हो गए हैं कि अपने मां-बाप कॉल तक नहीं उठा पाते। मेरी सबसे एक ही विनती है- कुछ भी करें, अपने मम्मी-पापा से रोज बात जरूर करें।’ मेरी मां मुझे हर दिन कई सारे वॉयस नोट्स यानी संदेश रिकॉर्ड करके भेजती थीं। अब मैं बार-बार उन्हें सुन रहा हूं। अब उनकी आवाज सुनने का बस यही जरिया बचा है। दरअसल, अपनी कंपनी में शाम से देर रात तक क्लाइंट्स की कॉल्स में उलझा रहता था। मां इस बात को अच्छे से समझती थीं, इसलिए उन्होंने एक रास्ता निकाला था। वे मुझे कॉल करके परेशान नहीं करना चाहती थीं, वॉयस नोट्स भेज दिया करती थीं। व्यस्त बेटे से जुड़े रहने का उन्होंने यह अपना एक तरीका बना लिया था। उन वॉयस नोट्स में मां की ममता गूंजती थी। वे बड़े प्यार से कहतीं- 'बेटा, जब भी काम से फुर्सत मिले तो एक बार फोन कर लेना।' वे अक्सर पूछतीं कि कहां हूं? क्या कर रहे हूं? खाना समय पर खाया या नहीं? और आखिर में हमेशा की तरह ढेर सारी दुआएं देना नहीं भूलतीं। अभी कुछ ही दिन पहले की बात है, मैं किसी काम की उलझन में फंसा हुआ था। उस वक्त मम्मी का फोन आया। मैं उठा नहीं पाया। उसके कुछ देर बाद उनका एक वॉयस नोट आया, जिसमें उन्होंने बड़े प्यार से कहा था- ‘जब मैं नहीं रहूंगी न, तो तरस जाएगा मेरी आवाज सुनने को।’ मां का वो वॉयस मैसेज सुनकर मेरा गला भर आया और मैं रो पड़ा। जब मैंने उन्हें वापस फोन किया, तो वो हंस पड़ीं। दिनभर में उनका तीन बार फोन आता था… पर अब मां का फोन कभी नहीं आएगा। एक झटके में मेरा सब कुछ उजड़ गया। मेरी छोटी बहन दामिनी बेंगलुरु में सीए है, हम दोनों के बीच सिर्फ दो साल का फर्क है। घर में मैं बड़ा हूं। हमारे पास मम्मी-पापा बारी बारी से आकर रहते थे। मम्मी जब भी हमारे पास आतीं तो हम खुश होते थे कि अब तरह-तरह के पराठे खाने को मिलेंगे। वह हमारे पास कभी अचार खत्म नहीं होने देती थीं। यहां तक कि आचार कूरिअर से भिजवा देतीं। मेरी बच्चे कहते नानी हाउस से अचार आया है। दरअसल, बहन के बच्चे नानी हाउस कहते थे, तो मेरे बच्चे भी वही सीख गए थे और वे भी नानी हाउस कहते। मेरे बच्चे मम्मी को दादी न कहकर नानी कहते थे। इस समय साथ में हमारे बच्चे भी आए हुए हैं। यहां उन्हें मम्मी के बिना बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा है। वे बार-बार कह रहे हैं कि नानी हाउस से वापस चलो। यहां नानी नहीं है। यह बस यही बार-बार सोच रहा हूं कि अगर भगवान के दर पर जाकर भी ऐसा हो सकता है, तो उनके यहां कौन जाएगा? भगवान भला इस तरह राधे-राधे जपने वाले अपने श्रद्धालु को कैसे मार सकते हैं? मम्मी-पापा पहली बार बांके बिहारी के दर्शन करने गए थे। बहन ने तो तय कर लिया था कि वह कभी भी वृंदावन नहीं जाएगी। इस दौरान हमारे घर लोग आते तो बहन वही बात दोहराती, तब वे कहते कि- परेशान मत हो। तुम्हारे मम्मी-पापा ने कितनी अच्छी जगह मौत पाई है। वे राधे-राधे करते हुए इस दुनिया से गए हैं, लेकिन हम उनकी बातों से सहमत नहीं हो पाते। आखिर भगवान जब अपने भक्त की रक्षा नहीं कर सकते फिर काहे का भगवान? लेकिन अब धीरे-धीरे मन शांत हो रहा है। मैंने दामिनी से बात की और तय किया है कम से कम एक बार उस घाट पर चलेंगे, जहां मम्मी-पापा आखिरी बार एक साथ थे। वहां चलकर एकांत में बैठेंगे और उन्हें महसूस करेंगे। आपको पता है कि पापा वृंदावन नहीं जा रहे थे। मम्मी उन्हें जबरदस्ती लेकर गई थीं। वह पापा से कह रही थीं कि साथ इसलिए चल रही हूं, ताकि वहां आपको रोटी-पानी दे सकूं। दरअसल, मम्मी पापा को बहुत प्यार करती थीं। उन्हें हमेशा लगता था कि पापा उनके बिना अकेले कैसे रहेंगे? कैसे खाना खाएंगे? इसलिए जहां भी पापा जाते, मम्मी साथ जाती थीं। उस दिन जब वे जा रहे थे तो मम्मी ने हमें बताया था कि मोहल्ले वालों के साथ बस से पापा को लेकर वृंदावन जा रही हूं। वृंदावन पहुंचकर मम्मी ने पापा का एक वीडियो भेजा था कि- देखो नाव में बैठकर तुम्हारे पापा कैसे राधे-राधे कर रहे हैं। पापा को पानी से बहुत डर लगता था। इसलिए वे कभी नदी वगैरह में नहीं जाते, न ही नाव में बैठते थे। इसलिए मम्मी वीडियो दिखाकर बताना चाह रही थीं कि- देखो तुम्हारे पापा नाव में बैठकर कैसे मस्ती में गा रहे हैं। उसके बाद नाव पलट गई थी। अब जिंदगी में बस दो चीजें रह गई हैं। एक अफसोस और दूसरे पापा जैसा बनने की तमन्ना। अफसोस इस बात का है कि उस दिन काश मम्मी-पाप लाइफ जैकेट पहने होते। काश, जो चार लोग दूसरी नाव में शिफ्ट किए गए थे, उसमें मेरे मम्मी-पापा भी होते। काश नाव पुल से टकराने से पहले घूम गई होती, जिससे हादसा टल जाता। काश मम्मी-पापा मेरे पास पुणे आ जाते, क्योंकि उन्हें पुणे आना था। हमने योजना बनाई थी कि पुणे से एक साथ उज्जैन और इंदौर घूमने चलेंगे। अब वो सारी बातें दिमाग में चल रही हैं। दूसरी चीज यह कि- पापा की तरह बनना चाहता हूं। पापा पूरे दिन लोगों की मदद करते थे। उनके काम करवाने में लगे रहते थे। यह जिस पार्क में बैठकर हम बात कर रहे हैं, इसे भी पापा ने बनवाया था। इसकी देखरेख भी वही करते थे। लोगों के लिए साल में एक बार जगराता करवाते थे। मोहल्ले में हजारों औरतें हैं, जिनकी पेंशन पापा ने लगवाई थी। दरअसल, हमारी सोसाइटी का नाम अर्बन स्टेट 2 है, जिसका मुखिया पापा को चुना गया था। मुझे याद है कि पिछले साल जब मम्मी-पापा के पास आया था तो अपना टिफिन भूल गया था। मैंने उन्हें फोन किया तो लगातार उनका फोन बिजी जा रहा था। जब बात हुई तो पता चला कि वह किसी का आधार कार्ड बनवाने साथ गए हुए थे। इस तरह पापा लोगों की मदद करने में लगे रहते। मम्मी-पापा कभी पैसे के पीछे नहीं भागते थे। हम शुरू से कोई बहुत अमीर नहीं थे। मुझे इंजीनियरिंग कराने और दामिनी को सीए बनाने के लिए मम्मी ने अपने गहने तक बेच दिए थे। मम्मी-पापा ने जैसे भी हो हम भाई-बहन को अच्छे स्कूल में पढ़ाया। पापा का बिजनेस बहुत अच्छा नहीं चल रहा था, तो हमारी फीस भरने के लिए मम्मी ने घर में बूटीक काम शुरू कर दिया था। घर पर ही कपड़े सिलतीं और बेचती थीं। मेरे सामने की बात है। एक बार मम्मी ने एक सूट सिला था। उसे बनाने में 275 रुपए लगे थे, लेकिन उन्होंने 300 में बेचा, क्योंकि उन्हें हमारी फीस भरनी थी। इस तरह मम्मी ने हमारे लिए बहुत मेहनत की थी। आखिर में मुझे सरकार से बहुत शिकायत है। कहना चाहता हूं कि वृंदावन जैसी धार्मिक जगहों पर हम सभी के माता-पिता जाते हैं। उनमें ज्यादातर बूढ़े होते हैं। कई बार वे मुसीबत में घबरा जाते हैं। सरकार ऐसी धार्मिक जगहों पर सख्त नियम बनाए। कम से कम वहां तो जरूर, जिन धार्मिक जगहों पर ज्यादा लोग जाते हैं। अगर आज हमारे मम्मी-पापा लाइफ जैकेट पहने होते तो बच जाते या नाव में सवार बच्चों का ख्याल रखा गया होता तो कम से कम वे जिंदा होते। (मोहित गुलाटी ने अपने ये जज्बात भास्कर रिपोर्टर मनीषा भल्ला से साझा किए) ---------------------------------- 1- संडे जज्बात-मैंने 20 अपनों को गोली मारी:अपनों पर गोली चलाना आसान नहीं था, लेकिन बम-धमाके में साथियों की मौत ने मुझे झकझोर दिया था मैं शरतचंद्र बुरुदा हूं, ओडिशा के मलकानगिरी जिले के सरपल्ली गांव का रहने वाला। एक रिटायर्ड पुलिस अधिकारी हूं। 1990 के दशक के आखिर में जब मैंने पुलिस की नौकरी जॉइन की, तब ओडिशा के दंडकारण्य इलाके में नक्सलवाद अपने चरम पर था। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें 2- संडे जज्बात-उन्होंने हेलिकॉप्टर से लाश भेजी, हम ट्रेनें भर देंगे:दिल्ली वालों ने पीट-पीटकर मार डाला मेरा बेटा, क्योंकि हमारी शक्ल अलग है मैं अरुणाचल प्रदेश के ईटानगर की रहने वाली मरीना नीडो हूं- नीडो तानिया की मां, जिसे दिल्ली में भीड़ ने पीट-पीटकर मार दिया। अगर ऐसी नफरत बढ़ती रही, तो किसी दिन हालात खतरनाक हो सकते हैं। हम बस इतना चाहते हैं कि- आप हमें समझिए। हम अलग दिखते हैं, लेकिन अलग नहीं हैं। हम भी इसी देश के हैं। मेरे बेटे को सिर्फ इसलिए मार दिया गया, क्योंकि उसका चेहरा आपसे अलग था। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें
    Click here to Read more
    Prev Article
    ईरान के साथ डील नहीं हुई तो क्या करेंगे ट्रंप? देखें US TOP-10
    Next Article
    गाजियाबाद में बच्ची से दरिंदगी करने वाले का एनकाउंटर:पुलिस के रोकने पर फायरिंग करके भाग रहा था, दोनों पैरों में गोली मारकर पकड़ा

    Related न्यूज Updates:

    Comments (0)

      Leave a Comment