Search…

    Saved articles

    You have not yet added any article to your bookmarks!

    Browse articles

    GDPR Compliance

    We use cookies to ensure you get the best experience on our website. By continuing to use our site, you accept our use of cookies, Privacy Policies, and Terms of Service.

    Top trending News
    bharathunt
    bharathunt

    Prabhasakshi NewsRoom: आधी से ज्यादा दुनिया संघर्ष में उलझी, India-China की दोस्ती परवान चढ़ रही, खुलने जा रहा है Lipulekh Pass Trade Route

    2 hours from now

    2

    0

    छह साल की लंबी ठंड के बाद हिमालय की ऊंचाइयों से एक बार फिर गरम हवाएं उठने जा रही हैं। हम आपको बता दें कि उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले से होकर गुजरने वाला लिपुलेख दर्रा इस साल जून में फिर से भारत चीन व्यापार का गवाह बनेगा। यह वही रास्ता है जिसे वैश्विक महामारी कोरोना के कारण वर्ष 2020 में बंद कर दिया गया था। अब जब इसे दोबारा खोलने की तैयारी तेज हो चुकी है तो यह केवल व्यापार की वापसी नहीं बल्कि एशिया की बदलती भू-राजनीति का बड़ा संकेत बनकर भी उभर रहा है।हम आपको बता दें कि भारतीय विदेश मंत्रालय की हरी झंडी मिलते ही पिथौरागढ़ प्रशासन हरकत में आ चुका है। जिला अधिकारी आशीष कुमार भटगाई ने साफ कर दिया है कि सभी विभागों को तैयारियों में जुटा दिया गया है। गुंजी में भारतीय व्यापार बाजार को फिर से सक्रिय करने के लिए बैंक, सीमा शुल्क, पुलिस और दूरसंचार से लेकर हर जरूरी व्यवस्था दुरुस्त की जा रही है। जून से सितंबर तक चलने वाला यह व्यापारिक सत्र इस बार पहले से कहीं अधिक सक्रिय रहने की उम्मीद है।इसे भी पढ़ें: अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच जारी युद्ध से तेल--गैस संकट गहराया, अंतर्राष्ट्रीय गठबंधनों पर सवालिया निशान लगा?दरअसल यह कोई साधारण रास्ता नहीं है। सत्रह हजार पांच सौ फुट की ऊंचाई पर स्थित लिपुलेख दर्रा सदियों से भारत और तिब्बत के बीच संपर्क का प्रमुख माध्यम रहा है। व्यापारी, साधु और कैलाश मानसरोवर यात्रा करने वाले यात्री इसी मार्ग से गुजरते रहे हैं। 1992 में इस मार्ग को फिर खोला गया था, लेकिन महामारी ने इसे बंद कर दिया था। अब इसका दोबारा खुलना उस ऐतिहासिक धड़कन की वापसी है जो लंबे समय से थमी हुई थी।लेकिन इस कहानी का दूसरा पहलू कहीं अधिक तीखा है। यह सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि शक्ति संतुलन की बिसात है। जब पश्चिम एशिया में संघर्ष ने पूरी दुनिया को उलझा रखा है, उसी समय भारत और चीन के रिश्तों में धीरे धीरे नरमी आना एक बड़ा संकेत है। सीमा विवादों के बावजूद व्यापारिक संपर्क बहाल करना इस बात का प्रमाण है कि दोनों देश टकराव और सहयोग के बीच नई रणनीति गढ़ रहे हैं। यह कदम बताता है कि भारत केवल सैन्य मोर्चे पर नहीं बल्कि आर्थिक गलियारों के जरिए भी अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है।इस मार्ग के खुलने से सबसे ज्यादा बेचैनी नेपाल को है। नेपाल लंबे समय से लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा क्षेत्रों पर अपना दावा जताता रहा है। वर्ष 2020 में जब भारत ने धारचूला से लिपुलेख तक अस्सी किलोमीटर लंबी सड़क का उद्घाटन किया था, तब काठमांडू ने तीखी आपत्ति जताई थी। नेपाल ने नया राजनीतिक नक्शा जारी कर इन क्षेत्रों को अपना हिस्सा बताया और यहां तक कि अपनी मुद्रा पर भी इसे छाप दिया था।नेपाल की आपत्ति केवल सीमा विवाद तक सीमित नहीं है। असल चिंता यह है कि इस व्यापार मार्ग के सक्रिय होने से भारत का सामरिक प्रभाव इस क्षेत्र में और मजबूत होगा। बेहतर सड़क संपर्क, तेज आवाजाही और बढ़ता व्यापार भारत को हिमालयी क्षेत्र में निर्णायक बढ़त देता है। नेपाल को डर है कि इससे उसका भूराजनीतिक महत्व घट सकता है और वह भारत चीन समीकरण में पीछे छूट सकता है।रणनीतिक नजर से देखें तो यह कदम कई स्तरों पर अहम है। एक तो यह सीमा क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे की मजबूती का संकेत है। पहले जहां सामान खच्चरों और भेड़ों के जरिए ले जाया जाता था, अब सड़क मार्ग ने पूरे समीकरण को बदल दिया है। समय घटेगा, लागत कम होगी और व्यापार की मात्रा कई गुना बढ़ेगी। इसके अलावा, यह भारत की उस नीति को दर्शाता है जिसमें सीमावर्ती क्षेत्रों को आर्थिक रूप से सक्रिय कर सुरक्षा को मजबूत किया जा रहा है।इसके अलावा, सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह कदम भारत चीन संबंधों में व्यावहारिकता का संकेत देता है। सीमा पर तनाव के बावजूद आर्थिक संपर्क बनाए रखना दोनों देशों के लिए फायदेमंद है। यह संदेश भी साफ है कि एशिया की राजनीति अब टकराव पर नहीं बल्कि नियंत्रित सहयोग पर आधारित होगी।उधर, नेपाल में हाल ही में हुए राजनीतिक बदलाव भी इस पूरे घटनाक्रम को नई दिशा दे सकते हैं। नई सरकार के सामने चुनौती होगी कि वह भारत और चीन के बीच संतुलन बनाए या फिर टकराव का रास्ता चुने। लेकिन फिलहाल यह साफ है कि लिपुलेख दर्रे से शुरू होने वाला व्यापार केवल माल का आवागमन नहीं, बल्कि शक्ति, रणनीति और प्रभाव का नया खेल है। हिमालय की बर्फीली चोटियों के बीच शुरू होने जा रहा यह व्यापारिक प्रवाह आने वाले समय में पूरे क्षेत्र की राजनीति को नई दिशा देगा। अब सवाल यह नहीं है कि व्यापार कितना बढ़ेगा, बल्कि यह है कि इस रास्ते से गुजरते हुए एशिया की ताकत का संतुलन किस दिशा में झुकेगा?
    Click here to Read more
    Prev Article
    ट्रंप का पर्ल हार्बर वाला जवाब, वो पल जब असहज हो गईं जापान की पीएम सानाए ताकाइची; देखें VIDEO
    Next Article
    India Energy Crisis | भारत सरकार का बड़ा कदम, तेल-गैस कंपनियों पर 'आवश्यक वस्तु अधिनियम' लागू- डेटा शेयरिंग अनिवार्य

    Related न्यूज Updates:

    Comments (0)

      Leave a Comment