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    POCSO Case: शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद को बड़ी राहत, Allahabad High Court से मिली अग्रिम जमानत

    3 hours from now

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     इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने यौन शोषण के मामले में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और उनके शिष्य मुकुंदानंद ब्रह्मचारी को बुधवार को अग्रिम जमानत दे दी। न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा ने अविमुक्तेश्वरानंद और मुकुंदानंद की जमानत याचिका पर यह फैसला सुनाया। हालांकि अदालत ने शिकायतकर्ता और याचिकाकर्ताओं दोनों को इस संबंध में मीडिया के समक्ष कोई बयान नहीं देने का निर्देश दिया। इससे पूर्व, अदालत ने 27 फरवरी को अविमुक्तेश्वरानंद की गिरफ्तारी पर अगले आदेश तक रोक लगा दी थी और कहा था कि नाबालिगों के कथित यौन उत्पीड़न मामले और प्रयागराज के झूंसी थाने में दर्ज मामले में अविमुक्तेश्वरानंद को गिरफ्तार नहीं किया जाएगा। अग्रिम जमानत देते हुए अदालत ने याचिकाकर्ताओं पर कई शर्ते लगाईं जैसे कि वे साक्ष्य से छेड़छाड़ नहीं करेंगे औरसुनवाई की तिथि पर संबंधित अदालत के समक्ष पेश होंगे। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता इस मामले के तथ्यों से परिचित किसी भी व्यक्ति को तथ्य छिपाने के लिए प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कोई लालच, धमकी नहीं देंगे और संबंधित अदालत की पूर्व अनुमति के बगैर विदेश नहीं जाएंगे। अदालत ने कहा, “याचिकाकर्ताओं, पीड़ितों और शिकायतकर्ता को जांच या मुकदमा लंबित रहने के दौरान मौजूदा मामले के संबंध में किसी मीडिया संस्थान को कोई बयान नहीं देने का भी निर्देश दिया जाता है। इन शर्तों में से किसी का भी उल्लंघन करने पर अभियोजक अग्रिम जमानत रद्द करने के लिए उचित आवेदन दाखिल करने के लिए स्वतंत्र होगा।” अग्रिम जमानत देते हुए अदालत ने कहा, “पीड़ितों ने कथित तौर पर इस घटना की जानकारी शिकायतकर्ता को 18 जनवरी, 2026 को दी, जबकि शिकायतकर्ता ने पुलिस को इसकी जानकारी 24 जनवरी, 2026 को दी। शिकायतकर्ता ने सूचना देने में छह दिन का विलंब का कारण पूजा और यज्ञ में व्यस्त होना बताया, जबकि 21 जनवरी को उसने कथित घटना के संबंध में आवेदन दाखिल किया था।” अदालत ने कहा, “पीड़ित शिकायतकर्ता के निरंतर संपर्क में रहे और उन्हें 25 फरवरी से पूर्व कोई उचित सुरक्षा नहीं दी गई। प्राथमिकी दर्ज होने के बाद पीड़ितों के बयान दर्ज किए गए और विभिन्न हिंदी समाचार चैनलों ने पॉक्सो और किशोर न्याय अधिनियम की स्थापित प्रक्रिया का उल्लंघन करकेपीड़ितों का साक्षात्कार किया।” अदालत ने कहा, “पीड़ितों ने इस घटना की जानकारी अपने अभिभावकों को न देकर शिकायतकर्ता को दी जोकि एक अपरिचित है। यह मानवीय आचरण एवं व्यवहार के सामान्य क्रम के अनुरूप भी नहीं है।” इसके अलावा, अदालत ने यह भी कहा, “डॉक्टर द्वारा तैयार मेडिकल रिपोर्ट में पीड़ितों को बाहरी चोट लगी होने की पुष्टि नहीं हुई। रिपोर्ट में कहा गया कि यौन उत्पीड़न की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। इसके बाद फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (एफएसएल) से रिपोर्ट मांगी गई है जिसमें साफ दिखा है कि डॉक्टर ने यौन उत्पीड़न के संबंध में निष्कर्ष नहीं दिया है। याचिकाकर्ताओं की मेडिकल जांच नहीं कराई गई है जोकि यौन उत्पीड़न के मामलों में आवश्यक होती है।” उल्लेखनीय है कि प्रयागराज के अपर सत्र न्यायाधीश (पॉक्सो अधिनियम) के 21 फरवरी के आदेश पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और उनके शिष्य के खिलाफ प्रयागराज के झूंसी थाना में मामला दर्ज किया गया था। शिकायतकर्ता आशुतोष महाराज ने आरोप लगाया था कि माघ मेले के दौरान जब वह अपने शिविर में बैठे थे, तो दो नाबालिग बच्चे उनके पास आए और स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के शिविर में यौन उत्पीड़न होने का आरोप लगाया। आशुतोष ने कहा था कि इससे क्षुब्ध होकर उन्होंने प्राथमिकी दर्ज कराने के लिए प्रयागराज के पुलिस अधिकारियों से संपर्क किया।
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