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    पूर्व बार अध्यक्ष सतीश शुक्ला का निष्कासन अवैध घोषित:बार काउंसिल ने बहाली के दिए आदेश, चुनाव लड़ने का किया ऐलान

    2 hours ago

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    उन्नाव में जिला बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष सतीश शुक्ला ने अपने निष्कासन को अवैध बताते हुए आगामी बार चुनाव लड़ने की घोषणा की है। उन्होंने वर्तमान अध्यक्ष पर गंभीर आरोप लगाए हैं। शुक्ला ने एक प्रेस वार्ता में बताया कि उन्हें वर्तमान अध्यक्ष द्वारा राजनीतिक विद्वेष के चलते गैरकानूनी तरीके से निष्कासित किया गया था। उनके प्रत्यावेदन पर बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश के चेयरमैन शिव किशोर गौर ने उनकी बहाली के आदेश जारी किए हैं। अध्यक्ष पर लगाए आरोप ये आदेश एक सप्ताह पहले जिला जज और जिलाधिकारी कार्यालय के माध्यम से बार एसोसिएशन को भेजे जा चुके हैं। हालांकि, शुक्ला ने आरोप लगाया कि इन आदेशों पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है और वर्तमान अध्यक्ष जानबूझकर इन्हें लागू नहीं कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह पूरा मामला व्यक्तिगत द्वेष से प्रेरित है। शुक्ला ने स्पष्ट किया कि वह एक बार फिर चुनाव लड़ेंगे और अधिवक्ताओं के समर्थन से जीत हासिल करेंगे। कहा- भवन निर्माण में कोई घोटाला नहीं हुआ निष्कासन के आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा कि उन पर अधिवक्ता भवनों के निर्माण में आर्थिक अनियमितता के आरोप पूरी तरह निराधार हैं। उन्होंने बताया कि परशुराम अधिवक्ता भवन, राजा राव रामबख्श सिंह अधिवक्ता भवन और चाणक्य अधिवक्ता भवन के निर्माण में कोई घोटाला नहीं हुआ है। ये सभी कार्य अधिवक्ताओं की सुविधा के लिए कराए गए थे। शुक्ला ने यह भी आरोप लगाया कि जांच निष्पक्ष नहीं कराई गई, बल्कि अपने लोगों के माध्यम से दबाव बनाकर तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया। उन्होंने कहा कि उन पर अप्रत्यक्ष रूप से दबाव बनाया गया, लेकिन उन्होंने कोई गलत बात स्वीकार नहीं की। नियमों की अनदेखी का आरोप लगाया उन्होंने नियमों की अनदेखी का आरोप लगाते हुए कहा कि बार एसोसिएशन के मॉडल बायलॉज के अनुसार निष्कासन की निर्धारित प्रक्रिया का पूरी तरह उल्लंघन किया गया है। बिना उचित प्रक्रिया अपनाए, मनमाने तरीके से उन्हें निष्कासित किया गया, जो पूरी तरह अवैध है। इसके अलावा उन्होंने बार एसोसिएशन में कार्यकाल दो वर्ष किए जाने के प्रस्ताव पर भी सवाल उठाए। उनका कहना है कि देशभर में बार एसोसिएशन का कार्यकाल एक वर्ष का होता है, लेकिन यहां व्यक्तिगत हितों के चलते इसे दो वर्ष कर दिया गया, ताकि उन्हें चुनाव लड़ने से रोका जा सके। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी नियम में संशोधन के लिए 2/3 बहुमत, रजिस्ट्रार सोसाइटी की मंजूरी और बार काउंसिल की स्वीकृति आवश्यक होती है, जिसका पालन नहीं किया गया।
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