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    नर्मदापुरम के पेट्रोल पंपों पर गाड़ियों की भीड़:3 पंप ड्राय, एक पर सादा पेट्रोल खत्म; खाद्य एवं आपूर्ति अधिकारी बोलीं- कोई किल्लत नहीं

    3 hours ago

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    नर्मदापुरम के पेट्रोल पंपों पर मंगलवार शाम को गाड़ियों की कतार लग गई। हालात ऐसे रहे कि दो-दो घंटे के इंतजार के बाद पेट्रोल-डीजल मिल सका। संचालकों का कहना है कि पेट्रोलियम कंपनी से सप्लाई कम होने के कारण ये हालात बने। नर्मदापुरम के भीतर और 3-4 किलोमीटर के दायरे में कुल 8 पंप हैं। शहर के पुलिस वेलफेयर पंप समेत 3 पंपों पर पिछले दो दिन से पेट्रोल और डीजल की सप्लाई बंद है। वहीं, मंगलवार शाम को भाजपा कार्यालय के पास बने भारत पेट्रोलियम पंप पर सादा पेट्रोल खत्म हो गया। हालांकि, शहर से बाहर मौजूद पेट्रोल पंपों पर तेल मौजूद है। नर्मदापुरम में सादे पेट्रोल की कीमत 114.67 रुपए जबकि स्पीड पेट्रोल की कीमत 124.05 रुपए प्रति लीटर है। ऐसे में वाहन मालिक करीब 10 रुपए प्रति लीटर महंगा स्पीड पेट्रोल डलवाने को मजबूर हो गए। दूसरी तरफ, जिला खाद्य एवं आपूर्ति अधिकारी नीता कोरी ने कहा- नर्मदापुरम में पेट्रोल-डीजल की किल्लत नहीं है। ऐसे में यह स्थिति क्यों बनी, इसकी जानकारी संचालकों से ली जा रही है। देखिए, तीन तस्वीरें… संचालक बोले- डिपो से नहीं आ रहीं गाड़ियां भारत पेट्रोलियम पंप पर प्रतिदिन की पेट्रोल की खपत 7 हजार लीटर है। इसके संचालक इकबाल अली ने कहा- रविवार को अवकाश होने के कारण डिपो से गाड़ी आने में देरी हुई। आज रात तक टैंकर आने की संभावना है। वहीं, पुलिस वेलफेयर पंप के स्टाफ ने कहा- डिपो से टैंकर समय पर नहीं पहुंच पा रहे हैं, जिसके कारण पेट्रोल और डीजल का स्टॉक खत्म हो गया है। केवल इमरजेंसी के लिए सीमित फ्यूल रखा गया है। टैंकर के कल सुबह तक पहुंचने की संभावना है। एक महीने में चार बार बढ़ चुके दाम तेल कंपनियों ने सोमवार को ही देशभर में पेट्रोल ₹2.61 प्रति लीटर और डीजल ₹2.71 प्रति लीटर महंगा किया है। इसके चलते मध्य प्रदेश में रेट 3 रुपए तक बढ़े हैं। इस महीने पहली बढ़ोतरी 15 मई को हुई थी। 25 मई की बढ़ोतरी के बाद यह चौथी बढ़ोतरी है। चारों बार में पेट्रोल-डीजल करीब 8 रुपए प्रति लीटर तक महंगा हो गया है। जानिए, इस महीने कब-कब बढ़े रेट डीजल महंगा होने के साइड इफेक्ट पेट्रोल-डीजल की कीमतों में क्यों हुई बढ़ोतरी? इस बढ़ोतरी की मुख्य वजह अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव है। ईरान-अमेरिका जंग से पहले क्रूड ऑयल 70 डॉलर प्रति बैरल था, जो अब 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया है। क्रूड की कीमतें बढ़ने से तेल कंपनियां दबाव में थीं। इसलिए कंपनियों ने घाटे की भरपाई के लिए यह कदम उठाया। अगर कच्चे तेल की कीमतों में लंबे समय तक तेजी बनी रही तो पेट्रोल-डीजल की कीमतें और बढ़ सकती हैं। बेस प्राइस से चार गुना तक बढ़ जाती है कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों और डॉलर के मुकाबले रुपए की स्थिति के आधार पर देश में ईंधन के दाम तय होते हैं। सरकारी तेल कंपनियां 'डेली प्राइस रिवीजन' यानी डायनेमिक प्राइसिंग सिस्टम के तहत हर दिन सुबह 6 बजे नए रेट अपडेट करती हैं। उपभोक्ता तक पहुंचने से पहले तेल की कीमतों में कई तरह के टैक्स और खर्च जुड़ते हैं। इसे आसान भाषा में ऐसे समझ सकते हैं: 1. कच्चे तेल की कीमत (बेस प्राइस): भारत अपनी जरूरत का करीब 90% क्रूड विदेशों से आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार से खरीदे गए बैरल के हिसाब से प्रति लीटर तेल की कीमत तय होती है। 2. रिफाइनिंग और कंपनियों का चार्ज: कच्चे तेल को रिफाइनरियों में साफ कर पेट्रोल-डीजल बनाया जाता है। इसमें रिफाइनिंग लागत और कंपनियों का मार्जिन शामिल होता है। 3. केंद्र सरकार की एक्साइज ड्यूटी: रिफाइनरी से निकलने के बाद केंद्र सरकार इस पर एक्साइज ड्यूटी और रोड सेस लगाती है। यह सभी राज्यों में समान होती है। 4. डीलर कमीशन: तेल कंपनियां जिस रेट पर पेट्रोल पंप मालिकों को ईंधन बेचती हैं, उसमें डीलर्स का निश्चित कमीशन जुड़ता है। यह पेट्रोल और डीजल के लिए अलग-अलग होता है। 5. राज्य सरकार का वैट (VAT): सबसे आखिर में राज्य सरकारें वैट या लोकल सेल्स टैक्स लगाती हैं। हर राज्य की वैट दरें अलग होने से दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और चेन्नई जैसे शहरों में ईंधन की कीमतें अलग होती हैं। मध्य प्रदेश में अन्य राज्यों की तुलना में वैट ज्यादा है। इसलिए सीमावर्ती उत्तरप्रदेश के जिलों में पेट्रोल-डीजल सस्ता, जबकि मध्य प्रदेश में महंगा मिल रहा है। 2024 से दाम नहीं बढ़े थे, चुनाव से पहले कटौती हुई थी देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतें मार्च 2024 से स्थिर थीं। लोकसभा चुनाव 2024 से पहले सरकार ने ₹2 प्रति लीटर की कटौती कर राहत दी थी। तकनीकी रूप से भारत में ईंधन की कीमतें विनियमित हैं। कंपनियां अंतरराष्ट्रीय क्रूड की 15 दिनों की औसत कीमत के आधार पर हर दिन रेट बदल सकती हैं, लेकिन राजनीतिक संवेदनशीलता के कारण इन्हें लंबे समय तक नहीं बदला गया। तेल कंपनियों को हर महीने 30 हजार करोड़ का घाटा सरकार के मुताबिक, इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम जैसी सरकारी कंपनियां कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के कारण घाटे में चल रही थीं। पेट्रोलियम मंत्रालय की जॉइंट सेक्रेटरी सुजाता शर्मा के अनुसार, कंपनियों को पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की बिक्री पर हर महीने करीब ₹30,000 करोड़ का नुकसान हो रहा है।
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