Search…

    Saved articles

    You have not yet added any article to your bookmarks!

    Browse articles

    GDPR Compliance

    We use cookies to ensure you get the best experience on our website. By continuing to use our site, you accept our use of cookies, Privacy Policies, and Terms of Service.

    Top trending News
    bharathunt
    bharathunt

    करियर की दौड़ में पिछड़ रही मातृत्व की खुशी:30 के बाद बांझपन का खतरा बढ़ा; जच्चा-बच्चा अस्पताल में एक साल में 4000 मामले आए

    13 hours ago

    2

    0

    आज की भागदौड़ भरी जिंदगी, करियर की प्रतिस्पर्धा और बदलती जीवनशैली का सबसे गहरा और बुरा असर हमारी प्रजनन क्षमता पर पड़ रहा है। जच्चा-बच्चा अस्पताल के स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग की विशेषज्ञ डॉ. सीमा द्विवेदी ने बांझपन के बढ़ते खतरों को लेकर डराने वाले आंकड़े साझा किए हैं। उनके अनुसार, समाज में बांझपन की समस्या अब एक साइलेंट महामारी का रूप ले रही है। अकेले एक अस्पताल के आंकड़े बताते हैं,कि साल भर में करीब 4000 बांझपन के मामले सामने आए हैं, जो समाज के लिए एक बड़ी चेतावनी है। करियर की चाहत और बढ़ती उम्र पड़ रही भारी डॉ. सीमा द्विवेदी का कहना है,कि बांझपन बढ़ने का सबसे प्रमुख और बुनियादी कारण शादियों का देरी से होना है। चिकित्सा विज्ञान के नजरिए से बच्चा पैदा करने के लिए जैविक रूप से सबसे उपयुक्त उम्र 20 से 30 साल के बीच मानी जाती है। हालांकि, आज के दौर में पढ़ाई और करियर को प्राथमिकता देने के चक्कर में युवा 30 साल की उम्र के बाद शादी का फैसला ले रहे हैं। उम्र के इस पड़ाव तक आते-आते शरीर में कई हार्मोनल बदलाव हो जाते हैं और प्रजनन क्षमता प्राकृतिक रूप से घटने लगती है, जिससे गर्भधारण में गंभीर बाधाएं उत्पन्न हो रही हैं। केवल महिलाएं नहीं, पुरुष भी बराबर के जिम्मेदार भारतीय समाज में अक्सर बांझपन के लिए केवल महिलाओं को ही कटघरे में खड़ा किया जाता है, लेकिन डॉ. द्विवेदी ने इस मिथक को सिरे से खारिज किया है। उनके अनुसार, वर्तमान में बांझपन की समस्या पुरुषों और महिलाओं दोनों में लगभग 50-50 प्रतिशत के समान अनुपात में देखी जा रही है। पुरुषों में बढ़ता वर्क स्ट्रेस, अनियमित खान-पान और खराब जीवनशैली उनके पिता बनने की क्षमता को सीधे तौर पर प्रभावित कर रही है। बदलती लाइफस्टाइल और बीमारियां बनीं ‘विलेन’ प्रजनन क्षमता घटने के पीछे केवल उम्र ही नहीं, बल्कि कई अन्य चिकित्सकीय कारण भी जुड़ गए हैं। डॉ.सीमा द्विवेदी के मुताबिक, हार्मोनल असंतुलन का बढ़ना, एसटीडी (यौन संचारित रोग) और महिलाओं में एंडोमेट्रियोसिस व पीसीओएस (PCOS) जैसी बीमारियों ने इस संकट को और गहरा कर दिया है। इसके साथ ही, हमारे पर्यावरण में बढ़ता प्रदूषण और खाद्य पदार्थों में इस्तेमाल होने वाले खतरनाक कीटनाशक सीधे तौर पर शरीर के भीतर जहर घोल रहे हैं, जिसका असर स्पर्म काउंट और अंडों की गुणवत्ता पर पड़ रहा है। अस्पतालों में बढ़ रही भीड़, हर महीने 400 मामलों की दस्तक बांझपन की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अस्पतालों में प्रतिदिन औसतन 7 से 15 नए मामले पहुंच रहे हैं। आंकड़ों का गणित देखें तो एक महीने में करीब 300 से 400 दंपति इस समस्या के इलाज के लिए अस्पताल की चौखट पर दस्तक दे रहे हैं। यह स्थिति दर्शाती है कि बांझपन अब किसी विशेष वर्ग तक सीमित न रहकर एक व्यापक सामाजिक समस्या बन चुका है। स्वस्थ जीवनशैली और सही समय पर निर्णय डॉ.सीमा द्विवेदी ने इस समस्या से निपटने के लिए सरकार और समाज दोनों को मिलकर प्रयास करने का सुझाव दिया है। उनका कहना है कि सरकारी अस्पतालों में बांझपन के इलाज के लिए और अधिक विशेष सुविधाएं उपलब्ध होनी चाहिए। साथ ही, समाज में यह संदेश जाना जरूरी है कि परिवार नियोजन के लिए 20 से 30 साल की उम्र को ही प्राथमिकता दी जाए। एक ऐसे स्वस्थ समाज की आवश्यकता है जहां तनाव कम हो और लोग एक-दूसरे के प्रति समर्पित हों। यदि हम अपनी जीवनशैली को प्राकृतिक रखते हैं और पर्यावरण को प्रदूषण मुक्त बनाने का संकल्प लेते हैं, तो आधी से ज्यादा शारीरिक और सामाजिक बीमारियां अपने आप दूर हो सकती हैं।
    Click here to Read more
    Prev Article
    ग्रेटर नोएडा में हजारों लीटर अवैध शराब नष्ट:रोड रोलर से कुचलकर मिट्टी में दबाया गया, न्यायालय के आदेश पर हुई कार्रवाई
    Next Article
    एटा में युवक ने फांसी लगाकर जान दी:पत्नी से चल रहा था विवाद, एक साथ पहले छोड़कर चली गई थी

    Related न्यूज Updates:

    Comments (0)

      Leave a Comment