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    जयपुर में 2 करोड़ का रोबोट करा रहा एक्सरसाइज:मरीज के मूवमेंट पर बारीकी से रख रहा नजर, SMS हॉस्पिटल में शुरुआत

    13 hours ago

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    बीमारी की वजह से खुद एक्सरसाइज न कर पाने वाले मरीजों को रोबोट एक्सरसाइज करा रहा है। इसके लिए सवाई मान सिंह (SMS) हॉस्पिटल के रीजनल रिहैबिलिटेशन सेंटर में करीब 2 करोड़ रुपए की लागत से रोबोटिक फिजियोथेरेपी की शुरुआत हो चुकी है। दावा किया जा रहा है कि यह फिजियोथेरेपी पैरालाइसिस, स्पाइनल इंजरी, ब्रेन इंजरी जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रहे मरीजों के लिए मददगार साबित हो रही है। इसकी खास बात यह है कि एक बार तय एक्सरसाइज का कमांड देने के बाद जितने चाहो उतने मूवमेंट कराए जा सकते हैं। पढ़िए यह खास रिपोर्ट… एक्सपट्‌र्स का कहना है कि पैरालाइसिस, स्पाइनल इंजरी, ब्रेन इंजरी जैसी बीमारियों में फिजियोथेरेपिस्ट द्वारा मरीजों को लगातार एक्सरसाइज कराना चुनौती भरा होता है। लकवा या स्पाइनल इंजरी के मरीजों को रोजाना एक्सरसाइज कराना जरूरी होता है, ताकि शरीर का मूवमेंट बना रहे। वे रिकवर कर सकें। इसके लिए रोबोटिक फिजियोथैरेपी गेम चेंजर साबित हो रही है। रोबोट की सबसे बड़ी विशेषता इसकी प्रोग्रामिंग क्षमता है। फिजियोथेरेपिस्ट को केवल एक बार मरीज की स्थिति और आवश्यकता के अनुसार डेटा सेट करनी पड़ती है। इसके बाद यह मशीन खुद-ब-खुद तय मानकों के अनुसार मरीज को एक्सरसाइज कराती है। मशीन यह सुनिश्चित करती है कि हर मूवमेंट बिल्कुल सटीक हो। इससे मरीज की रिकवरी तेज गति से होती है। रोबोट के जरिए एक्सरसाइज कर रहे मरीज मनोज ने बताया कि छत से नीचे गिरने के बाद हाथ और पैरों ने काम करना बंद कर दिया था। अब रोबोट के जरिए एक्सरसाइज कराने से कुछ फायदा हो रहा है। हाथ–पैर में धीरे धीरे मूवमेंट होने लगी है। चुनौती : मरीजों के हिसाब से 1 रोबोट नाकाफी रीजनल रिहैबिलिटेशन सेंटर की ओपीडी में रोजाना 300-350 मरीज आते हैं, जबकि आईपीडी में 60 मरीज होते हैं। एक मरीज की थेरेपी में करीब 45 मिनट लगते हैं। जिस अनुपात में मरीज आते हैं, उस हिसाब से तो सिर्फ 1 रोबोट नाकाफी है। अस्पताल प्रबंधन का कहना है कि ये शुरुआत है, भविष्य में और बढ़ाए जा सकते हैं। रोबोट से किस मरीज की थेरेपी होगी, यह डॉक्टर तय करते हैं। आसानी से कराई जा सकती है एक्सरसाइज : डॉ. जोशी SMS हॉस्पिटल के अधीक्षक डॉ. मृणाल जोशी बताते हैं- रोबोट से अपर और लोवर लिम्ब की एक्सरसाइज बड़ी आसानी से कराई जा सकती है। इससे उन मरीजों को फायदा होगा, जो बिल्कुल भी मूवमेंट नहीं कर सकते हैं। इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि एक सामान्य इंसान जिसे कोई काम करना है तो सबसे पहले ब्रेन एक्टिव होता है। फिर बॉडी तय करती है कि कौन-कौन सी मांसपेशियां इसमें काम करेंगी। फिर पूरे कॉर्डिनेशन के साथ बॉडी रेस्पॉन्ड करती है। किसी को स्ट्रोक, ब्रेन इंजरी या कोई अन्य गंभीर बीमारी होती है तो ये कॉर्डिनेशन बिगड़ जाता है। ऐसे मामलों में लगातार मूवमेंट से ये कॉर्डिनेशन रोबोट के जरिए हो सकेगा। इससे न सिर्फ मांसपेशियों में सुधार हो सकता है बल्कि मांसपेशियों और ब्रेन का कॉर्डिनेशन भी बेहतर हो सकता है। रोबोट मरीज के मूवमेंट पर बारीकी से नजर रखता है और जरूरत के अनुसार उसे नियंत्रित करता है।
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