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    Jan Gan Man: क्या वाकई मुस्लिमों के मन में जहर घोल रही है Madrasa Education?

    11 hours ago

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    पश्चिम बंगाल से लेकर उत्तराखंड, बिहार और उत्तर प्रदेश तक अब मदरसों की व्यवस्था पर जिस तरह से सख्त निगरानी और कार्रवाई शुरू हुई है, वह देश की सुरक्षा, सामाजिक संतुलन और शिक्षा व्यवस्था को बचाने का अभियान बन चुका है। वर्षों तक वोट बैंक की राजनीति के कारण जिन संस्थानों पर सवाल उठाना भी राजनीतिक जोखिम माना जाता था, आज उन्हीं मदरसों की मान्यता, वित्तीय पारदर्शिता, सुरक्षा व्यवस्था और शिक्षा स्तर की जांच हो रही है। यह बदलाव बताता है कि अब सरकारें आंखें मूंदकर नहीं बैठना चाहतीं।पश्चिम बंगाल में नई सरकार ने पूरे राज्य के मदरसों का व्यापक सर्वे शुरू कर दिया है। जिला अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि वह हर मदरसे की स्थापना, पंजीकरण, कानूनी स्थिति, शिक्षकों की संख्या, छात्रावास व्यवस्था और पाठ्यक्रम तक की जानकारी जुटाएं। यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि लंबे समय से राज्य में मदरसों की संख्या तो तेजी से बढ़ती रही, लेकिन उनके संचालन और गतिविधियों पर प्रभावी निगरानी नहीं थी। सरकार अब यह जानना चाहती है कि कितने संस्थान नियमों के तहत चल रहे हैं और कितने केवल धार्मिक कट्टरता या संदिग्ध गतिविधियों के अड्डे बन चुके हैं। यही नहीं, राज्य सरकार ने मदरसों में वंदे मातरम अनिवार्य कर यह स्पष्ट संदेश दिया है कि देश से ऊपर कोई संस्था नहीं हो सकती।इसे भी पढ़ें: Bengal में अब नहीं बचेगा कोई घुसपैठिया, Suvendu Adhikari सरकार ने Bangladeshi Infiltrators के खिलाफ छेड़ दिया आर-पार का अभियानउत्तराखंड ने तो इससे भी बड़ा और ऐतिहासिक कदम उठाया है। समान नागरिक संहिता लागू करने के बाद राज्य सरकार ने मदरसा शिक्षा व्यवस्था की गहराई से समीक्षा की। अध्ययन में सामने आया कि बड़ी संख्या में मदरसे बिना मान्यता के चल रहे थे। जहां मान्यता थी भी, वहां शिक्षा का स्तर बेहद कमजोर था। अनेक संस्थानों में योग्य शिक्षक तक नहीं थे। सबसे गंभीर बात यह सामने आई कि आधुनिक शिक्षा से दूर रखे गए बच्चे आगे चलकर समाज को प्रगतिशील दिशा देने की बजाय कट्टर सोच के वाहक बन रहे थे। इसीलिए राज्य सरकार ने पुराने मदरसा कानून समाप्त कर नया अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान कानून लागू किया। अब किसी भी संस्था को मान्यता तभी मिलेगी जब वह आधुनिक शिक्षा, पारदर्शी वित्तीय व्यवस्था, योग्य शिक्षकों और सामाजिक सौहार्द के नियमों का पालन करेगी।यह फैसला केवल शिक्षा सुधार नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा कदम है। जम्मू-कश्मीर और सीमा क्षेत्रों में काम कर चुके अधिकारियों के अनुभवों के आधार पर यह निष्कर्ष निकला कि बिना सुधार के मदरसा व्यवस्था सामाजिक समरसता के लिए खतरा बन सकती है। देखा जाये तो सवाल सीधा है कि देश को भविष्य में वैज्ञानिक, चिकित्सक, प्रशासनिक अधिकारी और आधुनिक सोच वाले नागरिक चाहिए या फिर ऐसे कट्टरपंथी तत्व जो समाज में विभाजन और घृणा फैलाएं। जब शिक्षा का केंद्र आधुनिक ज्ञान की बजाय केवल संकीर्ण धार्मिक सोच बन जाए, तब वह व्यवस्था राष्ट्र निर्माण नहीं बल्कि राष्ट्र विघटन का माध्यम बन जाती है।बिहार सरकार ने भी इसी दिशा में कठोर कदम उठाते हुए सभी सरकारी सहायता प्राप्त मदरसों और संस्कृत विद्यालयों का राज्यव्यापी लेखा परीक्षण शुरू कर दिया है। सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि जो संस्थान फर्जी तरीके से चल रहे हैं या सरकारी धन का दुरुपयोग कर रहे हैं, उन्हें बंद कर दिया जाएगा। विपक्ष इसे राजनीति बताकर विरोध कर रहा है, लेकिन सच यह है कि यदि कोई संस्था सरकारी सहायता लेती है तो उसे जवाबदेह भी होना होगा। शिक्षा मंत्री ने साफ कहा कि उद्देश्य गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करना है। यह तर्क पूरी तरह उचित है, क्योंकि शिक्षा के नाम पर चल रहे किसी भी संस्थान को कानून से ऊपर नहीं माना जा सकता।वहीं उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में अवैध मदरसे को सील किए जाने की घटना ने स्थिति की गंभीरता को और उजागर कर दिया। जांच में सामने आया कि मदरसा बिना पंजीकरण के चल रहा था। अग्नि सुरक्षा और विद्युत सुरक्षा प्रमाणपत्र तक नहीं थे। छात्रावास में बच्चों के लिए मूलभूत सुविधाओं का अभाव था। यह साफतौर पर बच्चों की जिंदगी के साथ खिलवाड़ था। ऐसे संस्थानों में बच्चों को किस तरह की शिक्षा और मानसिकता दी जा रही होगी, इसका अंदाजा लगाना कठिन नहीं है। प्रशासन ने सख्त कार्रवाई कर स्पष्ट कर दिया कि अब अवैध ढांचे और गैर मान्यता प्राप्त संस्थानों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि कई मामलों में मदरसों के आसपास कट्टरपंथ, अवैध गतिविधियों और सामाजिक तनाव की घटनाएं सामने आती रही हैं। जब किसी संस्था की वित्तीय व्यवस्था, पाठ्यक्रम, शिक्षकों और गतिविधियों पर निगरानी नहीं होती, तब वह राष्ट्रविरोधी तत्वों के लिए सुरक्षित ठिकाना बन सकती है। यही कारण है कि अब केवल सर्वे या औपचारिक जांच काफी नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि हर मदरसे को आधुनिक शिक्षा, संविधान, राष्ट्रीय एकता और वैज्ञानिक सोच के दायरे में लाया जाए। जो संस्थान ऐसा करने को तैयार नहीं, उन्हें बंद कर देना ही देशहित में होगा।देखा जाये तो राज्य सरकारों की मौजूदा कार्रवाई इसलिए सराहनीय है क्योंकि उन्होंने वर्षों से चले आ रहे राजनीतिक तुष्टीकरण के बजाय राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता दी है। शिक्षा के नाम पर कट्टरता, अवैध गतिविधियों और अलगाववादी सोच को बढ़ावा देने वाले संस्थानों पर कठोर कार्रवाई ही मजबूत भारत की दिशा में निर्णायक कदम साबित होगी। देश का कानून, संविधान और राष्ट्रीय सुरक्षा किसी भी धार्मिक या राजनीतिक दबाव से ऊपर है, और अब सरकारें यही संदेश पूरे देश को दे रही हैं।बहरहाल, इस मुद्दे पर उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता और भारत के पीआईएल मैन के रूप में विख्यात अश्विनी उपाध्याय का कहना है कि भारत हो या पाकिस्तान, मदरसा तालीम एक समान है इसलिए अगर मदरसा बंद नहीं हुआ तो देश बर्बाद हो जाएगा।
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