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    Israel ने चेताया तो Pakistan तुरंत घुटने पर आया, Khawaja Asif प्रकरण ने इस्लामाबाद का जमकर मजाक उड़वाया

    3 hours from now

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    मध्य पूर्व में भड़के भीषण संघर्ष के बीच पाकिस्तान की कूटनीतिक हेकड़ी जिस तरह से धड़ाम से जमीन पर गिरी है, उसने पूरी दुनिया को यह दिखा दिया है कि बयानबाजी और हकीकत के बीच कितना बड़ा फर्क होता है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ का आक्रामक बयान, फिर इजराइल की सख्त प्रतिक्रिया और उसके बाद अचानक ट्वीट डिलीट करना, यह पूरी कहानी पाकिस्तान की कमजोर पड़ती साख की सबसे बड़ी मिसाल बन गई है।शुरुआत हुई तब, जब पाकिस्तान के बड़बोले रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने इजराइल को मानवता के लिए अभिशाप बताते हुए बेहद जहरीली टिप्पणी कर दी। उन्होंने गाजा, ईरान और लेबनान में खूनखराबे का आरोप लगाते हुए ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया जिसने अंतरराष्ट्रीय मंच पर हलचल मचा दी। लेकिन यह हेकड़ी ज्यादा देर टिक नहीं पाई। जैसे ही इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कड़ा रुख अपनाया, पाकिस्तान की पूरी आक्रामकता हवा हो गई। नेतन्याहू ने साफ शब्दों में कहा कि इस तरह की भाषा किसी भी सरकार के लिए अस्वीकार्य है। इजराइल के विदेश मंत्री ने भी इसे खतरनाक और नफरत फैलाने वाला बताया। बस यहीं से पाकिस्तान की बैकफुट पर वापसी शुरू हो गई।इजराइल के प्रधानमंत्री के गर्म तेवर देखते ही ख्वाजा आसिफ के पसीने छूटने लगे। जिस बयान को उन्होंने बड़े जोश में दुनिया के सामने रखा था, वही उनके लिए संकट बन गया। नतीजा यह हुआ कि उन्होंने बिना समय गंवाए अपना ट्वीट डिलीट कर दिया। हम आपको यह भी बता दें कि यह पहली बार नहीं है जब पाकिस्तान के नेताओं ने ऐसा किया हो। उनकी आदत बन चुकी है कि पहले धमकी भरे बयान दो, कूटनीतिक गलती करो, दुनिया में विवाद खड़ा करो और फिर जब सामने से सख्त जवाब मिले तो चुपचाप पोस्ट हटाकर पीछे हट जाओ। इस रवैये ने पाकिस्तान की विश्वसनीयता को गहरी चोट पहुंचाई है।उधर, लेबनान में जमीनी हालात कहीं ज्यादा खतरनाक होते जा रहे हैं। इजराइल ने लेबनान पर अब तक के सबसे भीषण हमले किए हैं, जिनमें तीन सौ से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और हजारों घायल हैं। यह हमला ऐसे समय में हुआ जब अमेरिका और ईरान के बीच दो हफ्ते का युद्धविराम लागू हुआ था। लेकिन इजराइल और अमेरिका ने साफ कर दिया कि लेबनान इस समझौते का हिस्सा नहीं है, जबकि पाकिस्तान और ईरान इसके उलट दावा करते रहे। यही वह बिंदु है जहां पाकिस्तान की कूटनीतिक पोल खुलती नजर आई।इसी बीच नेतन्याहू ने एक और बड़ा दांव खेलते हुए ऐलान कर दिया कि इजराइल लेबनान के साथ सीधे वार्ता के लिए तैयार है। उन्होंने अपने मंत्रिमंडल को निर्देश दिया कि जल्द से जल्द बातचीत शुरू की जाए, जिसका मुख्य उद्देश्य हिजबुल्ला को निशस्त्र करना और शांति स्थापित करना होगा। यह बयान पाकिस्तान के उस दावे पर सीधा प्रहार है जिसमें वह खुद को मध्यस्थ के रूप में पेश कर रहा था। हम आपको यह भी बता दें कि इजराइल के प्रधानमंत्री के रुख में यह परिवर्तन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से वार्ता के बाद आया।उधर, लेबनान के भीतर भी हालात बेहद तनावपूर्ण हैं। सरकार ने साफ कर दिया है कि हथियार सिर्फ राज्य के पास रहेंगे और हिजबुल्ला जैसे संगठनों पर दबाव बढ़ाया जा रहा है। हालांकि हिजबुल्ला ने इजराइल के साथ किसी भी सीधे संवाद को खारिज कर दिया है और युद्धविराम को पहली शर्त बताया है। इस बीच, जमीन पर संघर्ष लगातार जारी है, हमले हो रहे हैं, लोग पलायन कर रहे हैं और पूरा क्षेत्र भय और अनिश्चितता में डूबा हुआ है।देखा जाये तो इस पूरे घटनाक्रम ने पाकिस्तान की भूमिका पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। एक तरफ वह खुद को शांति दूत बताने की कोशिश करता है, दूसरी तरफ उसके नेता ऐसे बयान देते हैं जो हालात को और बिगाड़ देते हैं। ऊपर से जब सख्त प्रतिक्रिया मिलती है तो वही नेता अपने शब्दों से पीछे हट जाते हैं।बहरहाल, यह साफ है कि मध्य पूर्व में जारी इस संकट ने सिर्फ युद्ध की भयावहता ही नहीं दिखाई, बल्कि यह भी उजागर कर दिया कि कौन-सा देश वास्तव में कूटनीति निभाने में सक्षम है और कौन सिर्फ बयानबाजी तक सीमित है।
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