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    चंद्रकांता के क्रूरसिंह 5-दिनों से काशी का कर रहे भ्रमण:बोले-1930 में धार्मिक फिल्म में उर्दू का प्रयोग ज्यादा हुआ, तब भी समान ने विरोध किया

    2 hours ago

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    90 के दशक के बेहद लोकप्रिय धारावाहिक 'चंद्रकांता' में अपने खौफनाक मगर दिलचस्प किरदार 'क्रूर सिंह' और उसके ट्रेडमार्क संवाद 'यकू' से देश-दुनिया में अपनी छाप छोड़ने वाले मशहूर बॉलीवुड अभिनेता अखिलेंद्र मिश्रा इन दिनों भगवान शिव की नगरी काशी में हैं। अपनी आध्यात्मिक यात्रा के पांचवें दिन उन्होंने मीडिया से बातचीत के दौरान न केवल अपने अभिनय के अनुभवों को साझा किया, बल्कि समाज, सिनेमा और विज्ञान के बदलते दौर पर भी बेबाकी से अपनी राय रखी। बाबा के दरबार में आध्यात्मिक शांति की खोज अखिलेंद्र मिश्रा ने अपनी यात्रा के दौरान काशी के प्रमुख देवालयों में मत्था टेका। उन्होंने श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के गर्भगृह में करीब एक घंटे तक बैठकर महादेव की आराधना की और शिव स्तुति का पाठ किया। इसके बाद उन्होंने काल भैरव मंदिर जाकर 'काशी के कोतवाल' का आशीर्वाद लिया। उन्होंने कहा, “मैं यहाँ किसी मांग के साथ नहीं, बल्कि आध्यात्मिक शांति की तलाश में आया था। काशी आकर मन को जो अद्भुत शांति मिली है, उसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है। शहर का स्वरूप अब पहले से काफी सुधरा है और श्रद्धालुओं के लिए सुविधाएं विश्वस्तरीय हो गई हैं।” अखिलेंद्र ने बताया इंजीनियरिंग में असफलता और नियति का खेल अपनी निजी जिंदगी का एक दिलचस्प किस्सा साझा करते हुए अखिलेंद्र मिश्रा भावुक हो गए। उन्होंने बताया कि उनकी माँ उन्हें इंजीनियर बनते देखना चाहती थीं। उन्होंने आईआईटी और बीवीआईटी जैसी प्रवेश परीक्षाओं में हिस्सा लिया, लेकिन वे सफल नहीं हो पाए। उन्होंने कहा,उस समय माँ उदास थीं, लेकिन शायद भोलेनाथ ने मेरे लिए कुछ और ही तय कर रखा था। मैं पढ़ाई में हमेशा प्रथम श्रेणी में रहा चाहे मैट्रिक हो, इंटर या फिजिक्स ऑनर्स। अगर मैं एमएससी कर लेता, तो आज किसी कॉलेज में लेक्चरर होता, लेकिन अभिनय का जुनून मुझे थिएटर की ओर ले गया। 'यकू' का जन्म और रसों का समावेश - अभिनेता अखिलेंद्र मिश्रा ने बताया कि उनके द्वारा निभाए गए क्रूर सिंह के किरदार को अमर बनाने वाला शब्द 'यकू' दरअसल एक 'ध्वनि' थी। उन्होंने निर्देशक निजा गुलेरी से एक तकिया कलाम इस्तेमाल करने की अनुमति मांगी थी। उन्होंने इस ध्वनि का प्रयोग 'नौ रसों' में किया चाहे वह चंद्रकांता के प्रति प्रेम का प्रदर्शन (शृंगार रस) हो, गुस्सा (रौद्र रस) हो या फिर रोना (करुण रस)। उन्होंने कहा, “बच्चों ने उस ध्वनि को 'यकू' बना दिया और मुझे 'यकू अंकल' कहने लगे। आज 30-35 साल बाद भी लोग मुझे इसी नाम से पहचानते हैं, यही एक कलाकार का असली पुरस्कार है।” समाज, भाषा और सिनेमा का अंतर्संबंध सिनेमा में बढ़ते विरोध और भाषा के सवाल पर उन्होंने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए कहा कि 1930 और 40 के दशक में जब धार्मिक फिल्मों के संवाद उर्दू में लिखे जाने लगे थे, तब समाज ने उसका कड़ा विरोध किया था, जिसके बाद संवाद शुद्ध हिंदी और संस्कृतनिष्ठ हिंदी में वापस आए। उन्होंने युवाओं को संदेश देते हुए कहा “समाज से बढ़कर कुछ नहीं है। जैसा समाज होगा, देश वैसा ही उन्नत होगा। आज के दौर में अगर कोई फिल्म गलत बनती है, तो समाज उसका विरोध करता है क्योंकि सिनेमा समाज की ही देन है।” AI ने लाया डिजिटल क्रांति - अभिनेता आज के दौर में एआई और चैट जीपीटी जैसे तकनीकी बदलावों पर उन्होंने कहा कि विज्ञान की रफ्तार तेज है और दुनिया सिमट गई है, लेकिन एक अभिनेता की ट्रेनिंग और उसकी ईमानदारी तकनीकी पर भारी पड़ती है। उन्होंने कहा,"हम पुराने स्कूल के कलाकार हैं। डिजिटल कितना भी आगे बढ़ जाए, हम अपने परफॉर्मेंस का स्तर वही रखते हैं ताकि हमारे दर्शक कभी यह न कहें कि अब हममें वह बात नहीं रही।
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