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    बुद्ध के कदमों की छाप समेटे है कानपुर:कभी अरौल में बिताया था चातुर्मास, काकूपुर में अशोक ने बनवाया था 200 फीट ऊंचा स्तूप

    2 hours ago

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    औद्योगिक नगरी के रूप में मशहूर कानपुर का इतिहास केवल कारखानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जिला बौद्ध धर्म का एक बड़ा केंद्र रहा है। इतिहास के पन्ने पलटें तो पता चलता है कि महात्मा बुद्ध न केवल यहाँ आए थे, बल्कि उन्होंने यहां प्रवास भी किया था। प्राचीन काल में कानपुर जनपद का एक बड़ा हिस्सा 'दक्षिण पंचाल' का भाग था, जहाँ के कण-कण में बौद्ध संस्कृति के अवशेष आज भी दबे हुए हैं। अरौल में महात्मा बुद्ध का 'चातुर्मास' प्रवास कानपुर इतिहास समिति के महासचिव अनूप कुमार शुक्ला ने बताया कि, प्रसिद्ध बौद्ध विद्वान राहुल सांकृत्यायन के दस्तावेजों के मुताबिक, मकनपुर के पास स्थित अरौल को बौद्ध काल में 'अलम्बिकापुरी' के नाम से जाना जाता था। यह स्थान बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए बेहद खास है क्योंकि स्वयं महात्मा गौतम बुद्ध ने यहाँ एक बार 'चातुर्मास' (वर्षा ऋतु का प्रवास) व्यतीत किया था। मकनपुर और अरौल के बीच स्थित हरपुरा गांव में मिली प्राचीन पत्थर की मूर्तियाँ इस बात को प्रमाणित करती हैं कि प्राचीन काल में यहाँ भव्य बौद्ध मठ और विहार मौजूद थे। काकूपुर जहाँ सम्राट अशोक ने बनवाया था विशाल स्तूप अनूप कुमार ने बताया कि,कानपुर का काकूपुर क्षेत्र पुरातत्व की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। सुप्रसिद्ध इतिहासविद् कनिंघम ने इसकी पहचान प्राचीन 'आयुतो' राज्य के रूप में की है। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपनी भारत यात्रा के दौरान यहां 100 से ज्यादा बौद्ध विहार (संघाराम) देखे थे, जिनमें करीब 3,000 भिक्षु निवास करते थे। ह्वेनसांग के वृत्तांत बताते हैं,कि काकूपुर में गंगा के किनारे सम्राट अशोक ने एक 200 फीट ऊंचा विशाल स्तूप बनवाया था। यह स्तूप ठीक उसी स्थान पर खड़ा किया गया था जहाँ बुद्ध ने स्वयं खड़े होकर जनमानस को उपदेश दिए थे। काकूपुर को तिब्बती बौद्ध ग्रंथों में 'बागुड़' के नाम से भी संबोधित किया गया है। विद्वानों की कर्मस्थली,यहीं लिखे गए महान ग्रंथ काकूपुर केवल स्तूपों का शहर नहीं था, बल्कि यह दर्शन और ज्ञान की प्रयोगशाला भी था। बौद्ध दर्शन के महान आचार्य बसुबंधु ने यहीं रहकर हीनयान और महायान संप्रदायों के कई महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की थी। उनके बड़े भाई असंग ने भी इसी धरती पर विद्या अध्ययन किया और योगाचार शास्त्र जैसे ग्रंथों को आकार दिया। इतिहास में जिक्र मिलता है कि नगर के दक्षिण-पश्चिम में स्थित एक आम्र उद्यान में दोनों भाई एक लंबे अरसे के बाद मिले थे, जिसकी स्मृति में वहां एक विशेष स्तूप का निर्माण कराया गया था। जाजमऊ से भीतरगांव तक बिखरा है बौद्ध वैभव कानपुर के पुरावैभव की झलक पूरे जिले में देखने को मिलती है। जाजमऊ, जिसे प्राचीन काल में 'अग्गलपुर' कहा जाता था, वहां से महात्मा बुद्ध की एक सुंदर प्रस्तर प्रतिमा मिली है। वहीं भीतरगांव के ऐतिहासिक क्षेत्र से 'मैत्रेय बुद्ध' की प्रतिमा प्राप्त हुई है, जो कानपुर की प्राचीन विरासत को और समृद्ध करती है। इसके अलावा मूसानगर, चंदनेपुर, उम्मरगढ़, काटर, फत्तेपुर और अमरौधा शाहपुर जैसे इलाके भी प्रमुख बौद्ध तीर्थों के रूप में दर्ज हैं। आज जरूरत इन ऐतिहासिक साक्ष्यों को आधुनिक पहचान दिलाने की है।
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