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    शंकराचार्य बोले-काशी में तो मृत्यु भी महोत्सव है:कहा- गो रक्षा के मामले में सरकारें गंभीर नहीं हैं, वर्षों पुरानी मंदिर का किया प्राण प्रतिष्ठा

    2 hours ago

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    देव विग्रहों से कभी खिलवाड़ नहीं करना चाहिए। चाहे उसकी प्राण-प्रतिष्ठा के विधान हों अथवा उसके बाद राग-भोग सेवा का नियम हो। दोनों का अनुपालन शास्त्रीय दिशानिर्देशों के अनुरूप होना चाहिए अन्यथा परिणाम विकट होंगे। यह कहना है श्रीगोवर्धन पीठ के जगद्‌गुरु शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती का। वह असि स्थित दक्षिणामूर्ति मठ परिसर में नवनिर्मित मंदिर में दक्षिणामूर्ति भगवान के विग्रह की प्राण-प्रतिष्ठा अनुष्ठान की पूर्णाहुति से पूर्व देशभर से जुटे आस्थावानों को संबोधित कर रहे थे। इस सत्र में पुरी पीठाधीश्वर ने कहा कि यदि किसी विग्रह की प्राण-प्रतिष्ठा में शास्त्रीय विधानों का पूर्ण पालन नहीं किया गया हो अथवा किसी दृष्टि से विग्रह खंडित हो गया हो। उसके संबंध में निर्दिष्ट व्यवस्था का अनुपालन संभव न हो पा रहा हो तो ऐसे विग्रह का दर्शन-पूजन कदापि नहीं करना चाहिए। देव विग्रह अथवा व्यवस्था के खंडित होते ही उस देवस्थान का तेज समाप्त हो जाता है। इसे उस स्थान पर देवत्व का लोप भी कह सकते हैं। ऐसी स्थित में विग्रह में भूत-पिशाच का वास हो जाता है। विग्रह पूजा का कुफल प्राप्त होता है। ऐसे स्थान पर जाने से भी बचना चाहिए। शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने असि स्थित दक्षिणामूर्ति मठ परिसर में भक्तों को संबोधित किया। शंकराचार्य ने सरकारों पर किया तंज शंकराचार्य ने कहा कि संस्कृत का प्रचार होना चाहिए। यह हमें सुसंस्कृत बनाती है। गो रक्षा के मामले में सरकारें गंभीर नहीं हैं। उस मुद्दे पर गंभीरता पूर्वक विचार करके गो रक्षा करनी होगी। मनमोहन सिंह की जब सरकार केंद्र में थी तब नरेंद्र मोदी ने कहा था कि गो हत्या बंद हो। वे गायों की रक्षा के लिए पीएम बने, लेकिन अब कहते हैं कि गो रक्षक गुंडे हैं। राजनेताओं को राजा कहकर चुटकी लेते हुए कहा कि आज राजनेताओं के राजा ही राजगुरु हो गए हैं। एक प्रश्न के उत्तर में भक्त की परिभाषा, लक्षण के बारे में बताया। कहा कि ज्ञानी को भी भक्त कहा गया है। नारायण प्रथम गुरु थे। नहीं करना चाहिए मृत्यु का शोकः शंकराचार्य एक प्रश्न पर उन्होंने कहा कि मृत्यु अटल सत्य है। जन्म के साथ ही यह सुनिश्चित हो जाती है। कलिकाल में मनुष्य को शतायु माना गया गया है। यदि कोई इसके आसपास भी पहुंच कर शरीर त्याग करता है तो वह सामान्य मृत्यु मानी जाती है। यदि बहुत कम उम्र में शरीर छूट जाए तो वह अकाल मृत्यु की श्रेणी में आता है। मृत्यु का शोक नहीं करना चाहिए। काशी में तो मृत्यु को भी महोत्सव की संज्ञा प्राप्त है। किसी स्वजन की मृत्यु के बाद हमें शोक घेर लेता है, इसका अर्थ यह कि उससे हमारा स्वार्थ का संबंध रहा है। जहां स्वार्थ का संबंध नहीं होगा वहां मृत्यु शोकाकुल नहीं करेगी अपितु स्वाभाविक लगेगी।
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