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    संकटमोचन में कलाकरों को प्रस्तुति के बदले मिलती है पिटारी:मंदिर परिसर के पूर्वोत्तर कोने में ‘चित्रकूट’ भी बसा, जीवंत हुआ लखनऊ घराने का कथक

    3 hours ago

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    संकट मोचन संगीत समारोह का 103वां वर्ष अपने समापन की तरफ है। इस आयोजन ने अब बड़ा रूप ले लिया है जिसमें शास्त्रीय संगीत के गायन वादन नृत्य के साथ-साथ कला दीर्घा बनाई गई है जिसमें 300 से अधिक कलाकारों ने मिलकर पवन पुत्र हनुमान के बालकांड से लेकर लंका कांड तक के दृश्य को पेंटिंग के माध्यम से दिखाया है जिसको देखने के लिए प्रतिदिन 5 से 6 हजार श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। वही, मंच के सामने श्रोताओं की तादाद जितनी दिख रही है उससे कहीं अधिक लोग मंदिर परिसर में फैले हैं। इस निशा में ‘चित्रकूट’ से चाय की दुकान तक संगीत अपने रसिकों को कभी लुभता रहा तो कभी टहलाता रहा। ऐसा कैसे हुआ आइय आप को शब्दचित्रों से दिखा रहे हैं। संगीत समारोह में कलाकरों को प्रस्तुति के बदले मिलती है पिटारी संगीत समारोह में कलाकारों को उनकी प्रस्तुति के बदले एक विशेष ‘पिटारी’ भेंट करने की अनोखी परंपरा निभाई जाती है। यह पिटारी मूलतः ग्रामीण संस्कृति में नववधू के आगमन पर शगुन के रूप में दी जाती थी, जिसे अब इस समारोह ने अपने सम्मान-प्रतीक के रूप में अपनाया है। पिछले 103 वर्षों से यह परंपरा निरंतर जारी है। बीएचयू हिंदी विभाग के प्रोफेसर शिव प्रकाश शुक्ला के अनुसार, इस मंच पर कोई भी कलाकार अपनी प्रस्तुति के लिए पारिश्रमिक नहीं लेता। ऐसे में सम्मान और आभार स्वरूप उन्हें यह पिटारी भेंट की जाती है। उन्होंने यह भी बताया कि पहले यह पिटारी केवल कलाकारों को दी जाती थी, लेकिन कार्यक्रम की बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए अब कलाकारों के साथ आने वाले सहयोगियों को भी यह सम्मान दिया जाने लगा है। 'साहित्य मंच' पर 'काशी में भक्ति' विषय पर हुई परिचर्चा साहित्य मंच पर आज पुस्तकों का विमोचन हुआ जिसमें डॉ. प्रीति त्रिपाठी ने कहा कि काशी में ज्ञान और भक्ति के आद्य आचार्य भगवान शिव स्वयं विद्यमान हैं और उनके ही अनुग्रह से काशी भक्ति की नगरी रही है। यहाँ आकर तमाम भक्ति की परम्पराओं का ऐक्य हो जाता है, आदि शंकराचार्य ने भक्ति में अद्वैत साधना के सूत्र काशी में आकर ही खोजे। कालांतर में इसी भाव को कबीर और तुलसी ने इसी भाव की भक्ति की परम्परा को आगे बढ़ाया। काशी में राम, सीता, शिव, शक्ति आदि सबका ऐक्य भक्ति में कर लेता है। डॉ. विंध्याचल यादव ने कहा कि भक्ति की बात जब ही होगी तो बनारस की चर्चा न्यूक्लियस के रूप में होगी। भक्ति की चर्चा में हर व्यक्ति के अंदर स्थापित मनुष्यत्व और देवत्व की खोजने का यत्न करता है और वास्तव में भक्ति अपने स्वरूप में मनुष्यत्व, देवत्व का संधान ही है। बनारस में भक्ति की चर्चा ज़्यादा महत्त्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि यहाँ पर विरोधी और असहमत रहने वाले विचारों के बीच संवाद के बीज तत्व स्थापित मिलेंगे। अब जानिए आज के कार्यक्रम की प्रस्तुति संकट मोचन संगीत समारोह की पांचवीं निशा का शुभारंभ शुक्रवार को लखनऊ घराने के वरिष्ठ नृत्य साधक पं.राममोहन महाराज के कथक नृत्य से हुआ। उन्होंने अपने घराने के साथ ही साथ बनारस घराने की खूबियों के दर्शन भी कराए। ख्यात तबला वादक पं.संजू सहाय के साथ उन्होंने नृत्य की शुरुआत ही बनारसी उठान से ही। इसके बाद थाट में खड़े होने के कई अंदाज दिखाए। मंच पर श्रीकृष्ण-राधा की नोकझोंक तबला-घुंघरू के माध्यम से दर्शकों तक पहुंचाई गई। नृत्य के भावों और भंगिमाओं ने उसे पूर्णता प्रदान की। गितनी वाली तिहाईयों से उन्होंने सभी को आनंदित कर दिया। दुगुन में एक से शुरू होकर 12 मात्राओं तक जाना और चौगुन में फिर नीचे की ओर गिरना विशेष रहा। बिंदादीन महाराज की ठुमरी लखनवी अंदाज में बैठकर पेश की। इसके बोल थे ‘डगर चलत देखो श्याम करत...।’ इसमें अभिनय का पक्ष प्रधान रहा। नृत्य के अंतिम चरण में पं.राममोहन महाराज ने तालियों के ताल पर तत्कार से महौल ही बदल दिया। अंत में उन्होंने घूंघट के पांच अंदाज दिखाए। सरोद और तबले की दिखी जुगलबंदी दूसरी प्रस्तुति पं.तेजेंद्र नारायण मजुमदार के सरोद वादन की रही। उन्होंने दो वर्ष के अंतराल पर संकट मोचन के दरबार में हाजिरी लगाई। उन्होंने राग नंद की अवतारणा की। इस राग में आलाप और जोड़ में स्वरों को समुचित विस्तार दिया। खनकदार ध्वनि कुछ विशेष स्वरों के प्राकृतिक एवं स्वाभाविक स्वरूप से थोड़ा हटकर रही। इसके बाद उन्होंने गत का यादबार वादन किया। विलंबित तीन ताल, मध्यलय झप ताल के बाद द्रुतलय तीन ताल में वादन के दौरान तबला पर पं.कुमार बोस ने भी जबरदस्त लयकारी दिखाई। बनारस घराने के तबले का तेवर दिखाते हुए पं.कुमार बोस ने अपना विशेष प्रभाव छोड़ा।
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