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    नोएडा में 47 साल के मरीज का कांप्लेक्स किडनी ट्रांसप्लांट:सड़क दुर्घटना में कट गया था एक पैर, बाएं ओर के पैर की ब्लड वैसल्स से जोड़ी किडनी

    2 hours ago

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    मेदांता हॉस्पिटल में एक 47 साल के सुमित त्यागी का एक कॉम्प्लेक्स किडनी ट्रांसप्लांट सफलतापूर्वक किया। त्यागी पहले सड़क दुर्घटना में अपना दायां पैर खो चुके थे, जिसके कारण यह सर्जरी और भी चुनौतीपूर्ण हो गई थी। उनकी मेडिकल हिस्ट्री और शारीरिक परिस्थितियों को देखते हुए यह ट्रांसप्लांट बेहद कॉम्प्लेक्स था। वर्तमान में त्यागी पूरी तरह स्वस्थ जीवन जी रहे हैं और क्रॉनिक किडनी डिजीज की समस्याओं से मुक्त हैं। डॉ. दुष्यंत नाडार, डायरेक्टर, यूरोलॉजी एवं किडनी ट्रांसप्लांट व डॉ. मनोज कुमार सिंघल, डायरेक्टर, नेफ्रोलॉजी एवं किडनी ट्रांसप्लांट की टीम ने इस सर्जरी को अंजाम दिया। सुमित ने बताया कि उनका जीवन 2003 में एक गंभीर सड़क दुर्घटना के बाद बदल गया। जिसमें उनका दायां पैर ऐम्प्युटेट करना पड़ा। इस शारीरिक और मानसिक चुनौती के बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और सामान्य जीवन जीने का प्रयास जारी रखा। हालांकि पिछले 4-5 सालों में उन्हें क्रॉनिक किडनी डिजीज का पता चला, जो धीरे-धीरे गंभीर होती गई। जब स्थिति और बिगड़ी तो डॉक्टरों ने किडनी ट्रांसप्लांट को ही एकमात्र विकल्प बताया। 62 साल की मां ने डोनेट की किडनी ऐसे में उनकी 62 साल की मां ने अपनी किडनी दान करने का निर्णय लिया। डॉ. दुष्यंत नाडार, डायरेक्टर, यूरोलॉजी एवं किडनी ट्रांसप्लांट ने कहा, “यह ट्रांसप्लांट बेहद चुनौतीपूर्ण था क्योंकि मरीज का पहले ही गंभीर सड़क दुर्घटना के बाद एक पैर काटा जा चुका था। सामान्यतः डोनर किडनी को दाईं ओर निचले पेट में ट्रांसप्लांट किया जाता है और इसे दाएं पैर की ब्लड वेसल्स से जोड़ा जाता है। लेकिन इस मामले में ऐसा संभव नहीं था। हमें बाईं ओर सर्जरी की योजना बनानी पड़ी और यह सुनिश्चित करना था कि किडनी को उस पैर की ब्लड वेसल्स से जोड़ा जाए जो उनके शरीर में एकमात्र कार्यशील पैर है। इस तरह के मामलों में बेहद सूक्ष्म योजना और सटीक सर्जरी की आवश्यकता होती है। कम नहीं थी चुनौती ट्रांसप्लांट के लिए सभी कम्पैटिबिलिटी पैरामीटर्स मेल खा रहे थे, लेकिन सर्जरी की कॉम्प्लीकेशन यहीं खत्म नहीं हुई। डोनर किडनी में डबल रीनल आर्टरी और डबल यूरेटर्स होने के कारण सर्जरी और चुनौतीपूर्ण हो गई। इस स्थिति में सर्जिकल टीम का नेतृत्व कर रहे डॉ. मनोज कुमार सिंघल के साथ डॉ. राहुल गुप्ता, डॉ. अभिनव वीरवाल ने आर्टरीज को सटीक रूप से जोड़ते हुए ब्लड फ्लो सुनिश्चित किया। दोनों यूरेटर्स को सावधानीपूर्वक यूरिनरी ब्लैडर से जोड़ा, ताकि ट्रांसप्लांट की गई किडनी सही तरीके से कार्य कर सके। तेजी से हो रही रिकवरी सर्जरी के बाद मरीज ने तेजी से रिकवरी की और अब वह बिना किडनी रोग के बोझ के सामान्य जीवन जी रहे हैं। यह केस न केवल ट्रांसप्लांट सर्जरी में हो रही प्रगति को दर्शाता है, बल्कि कॉम्प्लेक्स और हाई-रिस्क मामलों को सफलतापूर्वक संभालने में मेडिकल टीम की प्रतिबद्धता को भी उजागर करता है।
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