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    हरदोई सांसद बोले- नगर में 40 साल में विकास नहीं:होली मिलन समारोह में बोले- लखनऊ से घुसते ही गड्ढे; ‘कुर्ता लंबा-छोटा’ विवाद पर भी दिया सियासी जवाब

    3 hours ago

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    हरदोई के सांसद जयप्रकाश रावत ने हरदोई नगर के विकास को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि पिछले 40 सालों में नगर में विकास का एक भी ठोस काम बता पाना मुश्किल है। सांसद ने यह बात हरदोई सदर विधानसभा क्षेत्र के पूरा बहादुर गांव में आयोजित होली मिलन समारोह में कही। उन्होंने कहा कि जब विपक्षी दलों के नेता उनसे हरदोई नगर में हुए विकास कार्यों के बारे में पूछते हैं तो उन्हें शर्मिंदगी महसूस होती है। सांसद ने यह भी कहा कि उनकी अपनी पार्टी के लोग भी 40 सालों में हरदोई नगर में हुए काम गिना नहीं पाते हैं। ‘मुझे किसी ने नहीं, भाजपा की ताकत ने जिताया’ सांसद जयप्रकाश रावत ने कार्यक्रम के दौरान कहा कि कुछ लोगों को यह घमंड है कि उन्होंने उन्हें जिताया है, जबकि सच्चाई यह है कि भारतीय जनता पार्टी की ताकत की वजह से वे सातवीं बार सांसद बने हैं। उनका यह बयान पार्टी के अंदर चल रही खींचतान के संदर्भ में अहम माना जा रहा है। उन्होंने मंच से साफ संकेत दिया कि उनकी राजनीतिक ताकत किसी एक व्यक्ति या गुट की देन नहीं है। शाहाबाद-सवायजपुर की तारीफ, हरदोई नगर पर नाराजगी सांसद ने शाहाबाद और सवायजपुर विधानसभा क्षेत्रों में हुए विकास कार्यों की तारीफ की, लेकिन हरदोई नगर की स्थिति पर नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि हरदोई नगर की हालत जिले के अन्य मुख्यालयों की तुलना में सबसे खराब है। जयप्रकाश रावत ने कहा कि लखनऊ से हरदोई में प्रवेश करते ही बड़े-बड़े गड्ढे मिलते हैं, जिससे रास्ता तय करना मुश्किल हो जाता है। उन्होंने इसे नगर की बदहाल बुनियादी सुविधाओं का प्रतीक बताया। 77 करोड़ की सड़क परियोजना का भी जिक्र सांसद ने बताया कि तीन साल पहले उन्होंने लखनऊ रोड से पिहानी चुंगी तक सड़क को बेहतर बनाने का संकल्प लिया था। इसके लिए 77 करोड़ रुपए स्वीकृत कराए गए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि काम कराने की पहल किसी और ने की, लेकिन उसका श्रेय लेने की कोशिश कोई और कर रहा है। उनके इस बयान को भी स्थानीय राजनीतिक खेमेबाजी से जोड़कर देखा जा रहा है। ‘कुर्ता लंबा-छोटा’ विवाद पर भी दिया जवाब पूरा बहादुर गांव का यह होली मिलन कार्यक्रम सिर्फ सामाजिक आयोजन नहीं रहा, बल्कि सियासी बयानबाजी का मंच बन गया। सांसद जयप्रकाश रावत ने मंच से ‘लंबा कुर्ता-छोटा कुर्ता’ विवाद पर भी तीखा जवाब दिया। उन्होंने अपने समर्थकों को संबोधित करते हुए कहा- “जो हमसे जुड़े हैं, वो अपना कुर्ता एक-दो इंच लंबा कर लें, छोटा कतई न करें।” इस बयान को उन्होंने एक तरह से राजनीतिक दबाव और धमकियों के खिलाफ संदेश के रूप में पेश किया। उन्होंने समर्थकों से कहा कि घबराने की जरूरत नहीं है। बिना नाम लिए कसा तंज सांसद यहीं नहीं रुके। उन्होंने पंचतंत्र की कहानियों का जिक्र करते हुए बिना नाम लिए राजनीतिक तंज भी कसा। उन्होंने कहा कि अब वह दौर नहीं रहा जब बंदर-शेर या कछुआ-खरगोश जैसी कहानियों से जनता को समझाया जाता था। उनका इशारा साफ तौर पर मौजूदा सियासी माहौल और विरोधियों की रणनीति की ओर माना गया। मंच से उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की कि आज की राजनीति में नेतृत्व और प्रभाव ही निर्णायक है। क्या है ‘कुर्ता विवाद’ इस सियासी विवाद की शुरुआत 22 मार्च को हुई थी। उस दिन आबकारी मंत्री नितिन अग्रवाल ने बाबा मंदिर पुलिस चौकी के उद्घाटन समारोह में ‘कुर्ता लंबा-छोटा’ बयान दिया था। उन्होंने कहा था कि जो चुनाव में साथ नहीं देते और जो विरोध करेंगे, उन्हें “उसी भाषा में जवाब देना” आता है। साथ ही यह भी कहा था कि “कुर्ता लंबा करना भी जानते हैं और छोटा करना भी।” इस बयान को सीधे तौर पर राजनीतिक चेतावनी के रूप में देखा गया था। इसके बाद भाजपा के भीतर खेमेबाजी और अंदरूनी टकराव की चर्चाओं ने जोर पकड़ लिया था। दो साल से जारी है राजनीतिक गतिरोध सांसद जयप्रकाश रावत और आबकारी मंत्री नितिन अग्रवाल के बीच पिछले करीब दो साल से राजनीतिक गतिरोध बना हुआ है। दोनों नेताओं के बीच सार्वजनिक मंचों पर दूरी कई बार सामने आ चुकी है। हालांकि 14 मार्च को श्रीश चंद्र बारात घर में आयोजित एक होली मिलन कार्यक्रम में नितिन अग्रवाल ने मंच से जयप्रकाश रावत के साथ मतभेद खत्म करने की पेशकश की थी। उन्होंने यहां तक कहा था कि यदि उनसे कोई गलती हुई हो तो वह माफी मांगने को भी तैयार हैं। सुलह की कोशिश हुई, लेकिन बयानबाजी से फिर बढ़ी दूरी पूर्व सांसद नरेश अग्रवाल ने भी उसी कार्यक्रम में दोनों नेताओं से सुलह की अपील की थी, जिसे जयप्रकाश रावत ने स्वीकार भी किया था। उस समय यह माना जा रहा था कि दोनों गुटों के बीच तनाव कम हो सकता है। लेकिन अब हालिया बयानबाजी ने साफ कर दिया है कि ‘कुर्ता विवाद’ सिर्फ शब्दों का विवाद नहीं रह गया है। यह भाजपा के अंदरूनी समीकरणों और शक्ति संघर्ष की नई जंग के रूप में सामने आ चुका है। फिलहाल दोनों पक्षों के बीच सुलह के आसार धुंधले नजर आ रहे हैं।
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