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    हमीरपुर की 'सिल्वर फिश' के दुनियाभर में खरीदार:महारानी विक्टोरिया भी चौंक गई थीं, 400 साल पुरानी कला बचा रहा एक परिवार

    19 hours ago

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    बुंदेलखंड की पहचान रही चांदी की मछली की कारीगरी आज अस्तित्व के संकट से जूझ रही है। कभी देश-विदेश में अपनी चमक बिखेरने वाली यह कला अब सुविधाओं, सरकारी सहयोग और बाजार की कमी के चलते धीरे-धीरे खत्म होती नजर आ रही है। हमीरपुर जिले के मौदहा कस्बे के उपरौश मोहल्ले में रहने वाला सोनी परिवार इस परंपरा को किसी तरह जिंदा रखे हुए है, लेकिन हालात बेहद चुनौतीपूर्ण हैं। जानिए कैसे बनती है चांदी की मछली कारीगर बताते हैं कि चांदी के तार को खींचकर पट्टियों में बदला जाता है, फिर उन्हें पीट-पीटकर महीन जालियां बनाई जाती हैं। यही बारीकी इस मछली को लचक और जीवंत रूप देती है। मशीन से ऐसी कारीगरी असंभव है। कारीगरों की सबसे बड़ी शिकायत है कि मांग कम और लागत ज्यादा होने से अब उनकी रोजी-रोटी भी नहीं निकल रही। देखिए कुछ तस्वीरें… चंदेल काल से जुड़ी मानी जाती है परंपरा करीब 400 साल पुरानी इस कला की जड़ें चंदेल शासनकाल से जुड़ी मानी जाती हैं। परिवार की वंशावली के अनुसार नवल सोनी के बेटे मोहनलाल और उनके बेटे तुलसीदास सोनी ने वर्ष 1738 में चांदी की मछली को मूर्त रूप दिया था। यानी यह परिवार करीब सात पीढ़ियों से इस हस्तकला को जीवित रखे हुए है। इतिहासकार राममनोहर सोनी बताते हैं कि यह कला मुगलकाल और अंग्रेजी शासनकाल दोनों में चर्चित रही, लेकिन इसकी मौलिक पहचान बुंदेलखंड की धरोहर के रूप में है। महारानी विक्टोरिया भी रह गई थीं चकित परिवार के अनुसार अंग्रेजी शासनकाल में जब यह चांदी की मछली लंदन प्रदर्शनी में पहुंची, तो उसकी बारीकी, लचक और आकृति देखकर महारानी विक्टोरिया भी इसे असली मछली समझ बैठीं। प्रभावित होकर उन्होंने तुलसीदास सोनी को मेडल और सिक्का देकर सम्मानित किया था। यह सम्मान आज भी परिवार के पास सुरक्षित है। राजेंद्र सोनी बताते हैं - “हमारे पूर्वजों को अंग्रेजों के समय सम्मान मिला था। उसी गौरव को बचाने के लिए हम घाटे में भी इस काम को जारी रखे हैं।” यूपी सरकार ने भी किया था सम्मानित परिवार के अनुसार वर्ष 1981 में तत्कालीन मुख्यमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने जागेश्वर प्रसाद सोनी को तांबे की शील्ड और अंगवस्त्र देकर सम्मानित किया था। आज जागेश्वर सोनी के चार बेटे—राजेंद्र कुमार, राजकुमार, राकेश और कमलेश—मिलकर इस परंपरा को संभाले हुए हैं। संयुक्त परिवार में कुल 18 सदस्य हैं। कारीगर बताते हैं कि पहले शादियों, त्योहारों और शुभ अवसरों पर चांदी की मछली की भारी मांग रहती थी। दिल्ली, मुंबई समेत यूरोप तक के व्यापारी मौदहा आकर ऑर्डर देते थे। उस समय कई परिवार इस काम से जुड़े थे। लेकिन अब चांदी के दाम आसमान छूने लगे हैं और मांग घट गई है। पहले जहां 2 से 3 परिवार यह काम करते थे, अब केवल एक परिवार ही बचा है। लागत ज्यादा, कमाई कम राजेंद्र सोनी बताते हैं कि वर्तमान में महीने में दो से ढाई लाख रुपए तक की बिक्री हो जाती है, लेकिन इसमें शुद्ध आमदनी केवल 20 से 30 हजार रुपए ही बचती है। उन्होंने कहा, “पहले चांदी सस्ती थी तो चार-पांच लाख तक बिक्री होती थी। अब लागत ज्यादा है और मार्जिन बहुत कम।” कारीगरों का कहना है कि मेहनत ज्यादा और मुनाफा बेहद कम होने से युवा पीढ़ी इस धंधे में नहीं आना चाहती। परिवार के कई सदस्य नौकरी और दूसरे व्यवसायों की ओर जा चुके हैं। राजेंद्र सोनी के बेटे राजेश संविदा पर सहायक नेत्र चिकित्सक हैं, जबकि रवि व्यापार में हाथ बंटाते हैं। राजकुमार का बेटा रोहित एमबीए कर लखनऊ में निजी नौकरी कर रहा है। कितने की मिलती है चांदी की मछली स्थानीय सर्राफ बताते हैं कि यह मछली खोखली और बेहद नाजुक होती है, इसलिए ऑनलाइन बाजार में उपलब्ध नहीं है। खरीदार सीधे मौदहा आकर या शोरूम से खरीदते हैं। 5 ग्राम की मछली करीब 900 रुपए में मिलती है। 2 किलो की मछली की कीमत करीब 2.80 लाख रुपए तक जाती है। GI टैग और बिना ब्याज लोन की मांग कारीगरों की सबसे बड़ी शिकायत है कि आज तक इस कला को GI टैग नहीं मिला और न ही इसे एक जिला एक उत्पाद (ODOP) योजना में शामिल किया गया। राजेंद्र सोनी ने मांग की अगर सरकार हमें 0% ब्याज पर 10 किलो चांदी का लोन दे दे, तो हम इस धरोहर को बचा सकते हैं। वरना आने वाली पीढ़ियां इसे सिर्फ किताबों में पढ़ेंगी। जनप्रतिनिधियों का आश्वासन मौदहा की चांदी की मछली कला को बचाने और कारीगरों को सहारा देने के लिए जनप्रतिनिधियों व प्रशासन ने सहयोग का भरोसा दिया है। अधिकारियों का कहना है कि शासन योजनाओं का लाभ लेने के लिए कारीगरों को पंजीकरण कराना जरूरी है। धरोहर बचाने की जरूरत पानी की कमी, बेरोजगारी, पलायन और विकास की चुनौतियों से जूझ रहे बुंदेलखंड की यह कला आज खुद संरक्षण मांग रही है। अगर समय रहते सरकार, समाज और बाजार का सहयोग नहीं मिला, तो चांदी की मछली इतिहास बनकर रह जाएगी।
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