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    फर्जी DIG और प्रोफेसर ने व्यापारियों से वसूले 1.09 करोड़:जेल का डर दिखाकर दो पीढ़ियों को ठगा; हाईटेक ऑफिस, लग्जरी गाड़ी से दिखाया रौब

    8 hours ago

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    वर्दी असली नहीं थी, लेकिन उसका रौब असली था। एफआईआर फर्जी थी, लेकिन उसका डर असली था। इसी डर के दम पर एक रिटायर्ड प्रोफेसर और फर्जी डीआईजी ने दतिया के सर्राफा कारोबारी परिवार से 10 महीने में एक करोड़ 9 लाख 50 हजार रुपए वसूल लिए। कारोबारी परिवार को लंबे समय तक यकीन ही नहीं हुआ कि जिसके सामने वे झुक रहे हैं, वह असली अधिकारी नहीं, बल्कि फर्जी है। दैनिक भास्कर की पड़ताल में सामने आया कि कैसे पुरानी पहचान, फर्जी रसूख और वर्दी के रौब को करोड़ों की वसूली का हथियार बनाया गया। पढ़िए, रिपोर्ट… भरोसे की नींव पर खड़ी की ठगी की इमारत दतिया के सर्राफा कारोबारी अरविंद अग्रवाल और उनके दिवंगत भाई रोहित अग्रवाल का परिवार वर्षों से सोने-चांदी के कारोबार से जुड़ा है। शहर में अच्छी साख रही है। इसी परिवार से रिटायर्ड प्रोफेसर अशोक कुमार गुप्ता की पुरानी पहचान थी। परिजन के अनुसार, प्रोफेसर गुप्ता की रोहित अग्रवाल से गहरी दोस्ती थी। वह कई बार जरूरत पड़ने पर दुकान पर आते थे और अपने सोने के आभूषण गिरवी रखकर रकम लेते थे। यही पुराना विश्वास बाद में ठगी की सबसे मजबूत कड़ी बन गया। प्रोफेसर गुप्ता की पहचान मनीष कुमार गुबरेले से भी थी, जिसकी कद-काठी, व्यक्तित्व और बोलने का अंदाज किसी पुलिस अधिकारी जैसा था। रोहित के निधन के बाद दोनों ने मिलकर परिवार की परिस्थितियों और अपनी पुरानी पहचान का फायदा उठाने की योजना बनाई। फर्जी डीआईजी बनकर दुकान में पहुंचा मनीष अक्टूबर 2024 की एक दोपहर अरविंद अग्रवाल अपनी सर्राफा दुकान पर बैठे थे, तभी तीन स्टार लगी वर्दी पहने मनीष वहां पहुंचा। उसने खुद को एंटी करप्शन एंड क्राइम कंट्रोल फोर्स (ACCF) का डीआईजी बताया। उसने आते ही रौबदार अंदाज में बातचीत शुरू की और कुछ दस्तावेज सामने रख दिए। ये दस्तावेज कथित तौर पर किसी सरकारी कार्रवाई से जुड़े हुए थे। आरोप है कि उनमें फर्जी शिकायत और फर्जी एफआईआर का मसौदा शामिल था। मनीष ने अरविंद को बताया कि उनके खिलाफ अवैध लेनदेन की गंभीर शिकायतें मिली हैं। किसी भी समय केस दर्ज हो सकता है। कार्रवाई हुई तो पूरा परिवार जेल जाएगा और सालों की कमाई हुई प्रतिष्ठा खत्म हो जाएगी। कानूनी कार्रवाई और बदनामी के डर ने व्यापारी परिवार को मानसिक रूप से तोड़ दिया। यहीं से शुरू हुआ करोड़ों की वसूली का सिलसिला। 10 किस्तों में 60 लाख, फिर 20 लाख का 'समझौता' पुलिस के अनुसार, केस का डर दिखाकर अक्टूबर 2024 से फरवरी 2025 के बीच अरविंद अग्रवाल से 10 अलग-अलग किस्तों में 60 लाख रुपए वसूले। इनमें 24 अक्टूबर को 5 लाख, 27 अक्टूबर को 5 लाख, 30 अक्टूबर को 2 लाख, 6 दिसंबर को 9 लाख, 15 दिसंबर को 5 लाख, 18 दिसंबर को 5 लाख, 3 जनवरी को 5 लाख, 16 जनवरी को 10 लाख, 6 फरवरी को 8 लाख और 12 फरवरी को 6 लाख रुपए दिए गए। इसके बाद भी मामला खत्म नहीं हुआ। मार्च 2025 में आरोपियों ने एक और मांग रखी। कहा गया कि केस को हमेशा के लिए बंद कराने के लिए 20 लाख रुपए देने होंगे। डर के कारण व्यापारी ने यह रकम भी दे दी। इस तरह अकेले अरविंद अग्रवाल से कुल 80 लाख रुपए वसूले गए। फिर परिवार की दूसरी पीढ़ी को बनाया निशाना अरविंद अग्रवाल से मोटी रकम हासिल करने के बाद आरोपियों ने परिवार के दूसरे हिस्से को निशाना बनाया। जून 2025 में मनीष नए किरदार में सामने आया। इस बार उसने खुद को झांसी एंटी करप्शन ब्यूरो का इंस्पेक्टर बताया। वह रोहित अग्रवाल के बेटे प्रियांश सिंघल की दुकान पर पहुंचा। उसने दावा किया कि प्रोफेसर अशोक गुप्ता का 100 ग्राम सोना रोहित अग्रवाल पर बकाया था। इस संबंध में शिकायत दर्ज कराई गई है। उसने प्रियांश को भी कानूनी कार्रवाई और गिरफ्तारी का डर दिखाया। पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, जून से अगस्त 2025 के बीच प्रियांश से 6 किस्तों में 29.5 लाख रुपए वसूले गए। इनमें पांच किस्तें 5-5 लाख रुपए की थीं जबकि आखिरी किस्त 4.5 लाख रुपए की बताई गई है। यहीं से कुल वसूली का आंकड़ा 1 करोड़ 9 लाख 50 हजार रुपए तक पहुंच गया। वर्दी पहनने के बाद पुलिस वाले भी समझते थे अफसर मनीष कुमार हमेशा सफेद रंग की लग्जरी एसयूवी से चलता था। इससे लोगों को लगता था कि वह किसी विशेष एजेंसी या उच्च पदस्थ अधिकारी से जुड़ा है। झांसी के एक पॉश इलाके में उसका अत्याधुनिक सुविधाओं वाला ऑफिस भी था। बाहर से देखने पर यह किसी कॉर्पोरेट फर्म या सरकारी जांच एजेंसी जैसा लगता था। स्थानीय लोगों के अनुसार, जब वह वर्दी पहनकर निकलता था तो पुलिसकर्मी भी उसे अधिकारी समझते थे। इसका फायदा उठाकर वह लोगों पर दबाव बनाता था। पुलिस को यह भी जानकारी मिली है कि वसूली की रकम से उसने झांसी के पास एक गांव में जमीन और लग्जरी कार भी खरीदी थी। कलेक्ट्रेट में मुलाकात बनी खुलासे का टर्निंग पॉइंट आरोपी मनीष कुमार की लगातार पैसों की मांग से परेशान प्रियांश सिंघल की मुलाकात एक दिन कलेक्ट्रेट में प्रोफेसर अशोक गुप्ता से हो गई। बातचीत के दौरान प्रियांश ने उनसे सीधे सवाल कर दिया कि जब उनका पूरा हिसाब-किताब चुकता कर दिया गया है, तो मनीष अब भी क्यों परेशान कर रहा है? यह सवाल सुनकर प्रोफेसर गुप्ता असहज हो गए। उन्होंने कहा कि वे मनीष नाम के किसी व्यक्ति को जानते ही नहीं हैं। इस मुलाकात के बाद प्रियांश ने खुद जानकारी जुटानी शुरू की। वह झांसी पहुंचा और उन दफ्तरों में पड़ताल की, जिनका नाम लेकर मनीष खुद को अधिकारी बताता था। पता चला कि वहां मनीष कुमार नाम का कोई अधिकारी पदस्थ ही नहीं है। इसके बाद परिवार ने पुलिस से संपर्क किया। पुलिस ने योजना बनाकर 10 जून को मनीष को पैसे देने के बहाने बुलाया। जैसे ही वह रकम लेने पहुंचा, पहले से मौजूद सादे कपड़ों में पुलिसकर्मियों ने उसे दबोच लिया। गिरफ्तारी के बाद उसने खुद को बचाने की कोशिश की। मामला खत्म कराने के लिए पूरी रकम लौटाने की पेशकश भी की। पुलिस को और पीड़ितों के सामने आने का इंतजार टीआई धीरेंद्र मिश्रा का कहना है कि हाल ही में पुलिस टीम झांसी स्थित मनीष के कार्यालय भी पहुंची, जहां ताला लगा मिला। पुलिस को संदेह है कि ऑफिस के भीतर फर्जी दस्तावेज, पहचान पत्र, सील-सिक्के और अन्य लोगों को ब्लैकमेल करने से जुड़े रिकॉर्ड मिल सकते हैं। जांच में सामने आया कि जिस एंटी करप्शन एंड क्राइम कंट्रोल फोर्स का नाम लेकर मनीष रौब दिखाता था, वह मूल रूप से एक ट्रस्ट से जुड़ी संस्था है। अब पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि संस्था के नाम और पद का इस्तेमाल किस सीमा तक किया गया। आशंका है कि कई अन्य लोग भी इसी तरह के दबाव और ब्लैकमेलिंग का शिकार हुए होंगे, लेकिन बदनामी के डर से सामने नहीं आए। फिलहाल मनीष गिरफ्तार है जबकि रिटायर्ड प्रोफेसर अशोक कुमार गुप्ता जांच एजेंसियों के रडार पर है। उसके खिलाफ मामला दर्ज किया जा चुका है। अब पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि यह खेल सिर्फ दो लोगों तक सीमित था या इसके पीछे कोई बड़ा नेटवर्क भी काम कर रहा था। मामले से जुड़ी ये खबर भी पढे़ं… दतिया में फर्जी DIG ने सर्राफा कारोबारी से की वसूली दतिया में एंटी करप्शन एंड क्राइम कंट्रोल फोर्स का फर्जी डीआईजी बनकर लोगों को डराने-धमकाने वाला गिरोह पकड़ाया है। शहर के सर्राफा कारोबारी अरविंद अग्रवाल ने कोतवाली पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है। उन्होंने आरोप लगाया है कि फर्जी डीआईजी मनीष कुमार गुबरेले और उसके सहयोगी एके गुप्ता ने गिरफ्तारी, एफआईआर और कार्रवाई का भय दिखाकर उनसे करीब 80 लाख रुपए वसूल लिए। पढे़ं पूरी खबर…
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